क्यों छीना गया गोवारी आदिवासियों का आरक्षण

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2018 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र के गोवारी आदिवासियों को जनजाति का दर्जा दिए जाने का फ़ैसला दिया था. इस फ़ैसले के बाद इन आदिवासियों को भी शिक्षा, नौकरी और राजनीति में आरक्षण का लाभ मिल सकता था. लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुनाते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के फ़ैसले को ग़लत ठहराया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी आदिवासी समूह को जनजाति का दर्जा देने का हक़ किसी अदालत को है ही नहीं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 342 में यह बिलकुल स्पष्ट है कि यह अधिकार सिर्फ़ संसद का है. यानि जब तक संसद क़ानून पास नहीं करती गोवारी आदिवासियों को जनजाति के लोग नहीं माना जा सकता है. इस मसले पर मैं भी भारत ने गढ़चिरौली में काम करने वाले आदिवासी नेता रमेशकुमार बाबूरावजी गजबे से बातचीत की. इस बातचीत में रमेशकुमार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला सही है. लेकिन गोवारी आदिवासियों को आरक्षण मिलना ही चाहिए और उनके साथ नाइंसाफ़ी हो रही है. उन्होंने कहा कि यह नाइंसाफ़ी राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी की वजह से होता रहा है.

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