महासागर में भाले से मछली मारते निकोबारी बच्चे और पर्यावरण संतुलन

इस छोटी से नाम में बैठे विशाल समंदर के बीच एक हल्का सा डर मन में था कि यह लगातार डोल रही नाव अगर पलट गई तो क्या होगा. वहीं छोटे छोटे निकोबारी बच्चे इस असीमित सागर में होड़ी लिए खेल रहे थे.

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निकोबार द्वीप समूह में कुल 24 टापूओं में से जिन 12 टापूओं पर इंसानी आबादी है उनमें से एक है ननकौड़ी द्वीप. यह द्वीप सैंट्रल निकोबार का हिस्सा है.

इस द्वीप की आबादी क़रीब 40 हज़ार बताई जाती है. ज़ाहिर है चारों तरफ़ समुद्र से घिरे इस द्वीप पर लोगों के खाने में मछली मुख्य आहार है.

निकोबारियों को मछली पकड़ने का हुनर अपने पुरखों से विरासत में मिला है. खुले समुद्र में मछली पकड़ना आसान काम नहीं है.

लेकिन निकोबारी समुदाय को इस हुनर में इस कदर महारत हासिल है कि छोटे छोटे बच्चे खुले समुद्र में नाव ले कर उतर जाते हैं और मछली का शिकार करते हैं.

मछली मारने के लिए निकोबारी आदिवासी समुदाय कई तरह की तकनीक का इस्तेमाल करता है. इनमें से एक है हारपून फ़िशिंग यान भाले से मछली का शिकार. 

निकोबारी समुद्र में शिकार के लिए एक छोटी नाव का इस्तेमाल करते हैं जिसे होड़ी कहा जाता है. होड़ी नाव बनाने की एक पुरातन विधि है जिसमें बैलेंस बनाने के लिए नाव के बराबर में तीन डंडों का इस्तेमाल किया जाता है.

बेशक होड़ी और हारपून यानि भाले का इस्तेमाल कर मछली मारने की कला पुरातन है. लेकिन आज के ज़माने के लड़के लड़कियाँ मछली मारने के लिए इस पुरातन तकनीक में आधुनिक गियर्स का इस्तेमाल भी करते हैं.

ये लोग समुद्र में तैरने और डाईविंग के लिए इस्तेमाल होने वाले गियर यानि उपकरण का इस्तेमाल करते हैं. 

ये लड़के आज ख़ासतौर से हमें निकोबारी समुदाय का हुनर दिखाने के लिए आए हैं. हमने देखा कि ये दोनों लड़के पानी की सतह पर तैरते रहते हैं और मछली की तलाश करते हैं.

जैसे ही उन्हें कोई मछली नज़र आती है…ये तेज़ी से उस दिशा में गोता लगाते हैं और मछली पर वार कर देते हैं. 

हम इन दो लड़कों के साथ खुले समुद्र में कई घंटे रहे, बेशक हमें पता था कि हम जिस नाम में सवार हैं उसे चलाने वाला और मछली पकड़ रहे लड़के क़हर के तैराक़ और गोताखोर हैं.

लेकिन इस छोटी से नाम में बैठे विशाल समंदर के बीच एक हल्का सा डर मन में था कि यह लगातार डोल रही नाव अगर पलट गई तो क्या होगा. वहीं छोटे छोटे निकोबारी बच्चे इस असीमित सागर में होड़ी लिए खेल रहे थे. 

बेशक आज की तारीख़ में निकोबारियों की हारपून फ़िशिंग बहुत प्रासंगिक नज़र नहीं आती है. यह ज़रूरत से ज़्यादा एक शौक़ या खेल दिखता है. लेकिन इसका एक अहम पहलू भी है.

आज इंसान ने अपनी बड़ती आबादी की भूख को शांत करने के लिए समुद्र से मछली पकड़ने की आधुनिक तकनीक तैयार कर ली है…जिससे लाखों टन मछली एक दिन में पकड़ी जाती है.

लेकिन अगर आप आदिवासी जीवन शैली को समझेंगे तो पाएँगे कि इन समुदायों ने प्रकृति का ज़रूरत से ज़्यादा दोहन कभी नहीं किया.

इंसान की ज़रूरत और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन एक बड़ा गूढ़ विषय है जिस पर दुनिया माथापच्ची कर रही है. लेकिन आदिवासी सभ्यताओं का इंसान की दुनिया में यह योगदान मानना ही पड़ेगा.

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