राजस्थान के आदिवासी-बहुल बांसवाड़ा में कुपोषण से जंग का दावा

इस अभियान से एक बड़ी बात जो सामने आई है, वो यह है कि बाजरा, सब्जियां, अंकुरित अनाज, रागी और तिल के लड्डू, और समा खीर जैसे स्थानीय खाद्य पदार्थों के अलावा घर पर किचन गार्डन वाले परिवार अपने लिए सही पोषण का स्तर बनाए रखने में सफ़ल रहे हैं.

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राजस्थान के आदिवासी बहुल बांसवाड़ा ज़िले के 750 गांवों में बच्चों और युवाओं को कुपोषण के चक्र से उबारने के लिए पोषण स्वराज अभियान चलाया जा रहा है.

इस अभियान के तहत इन्हें हर रोज़ पौष्टिक भोजन दिया जा रहा है, ताकि कोविड-19 महामारी की तीसरी लहर आने से पहले उनका स्वास्थ्य मज़बूत किया जा सके. अभियान का मुख्य उद्देश्य कुपोषित बच्चों में भी सबसे कमज़ोर बच्चों की रक्षा करना है.

बांसवाड़ा स्थित वागधारा संस्था, जो आदिवासी आजीविका के मुद्दों पर काम करती है, ज़िला प्रशासन और एकीकृत बाल विकास सेवा (Integrated Child Development Services – ICDS) के सहयोग से यह अभियान चला रहा है.

पिछले हफ़्ते अभियान की शुरुआत में ज़िले के पांच पंचायत समिति क्षेत्रों में रहने वाले लगभग 67,000 बच्चों की जांच की गई.

कुपोषण के स्तर को कम करने के प्रयास में बच्चों की पहचान की गई, और उन्हें विशेष पोषण और कंसल्टेशन शिविरों में पौष्टिक भोजन दिया गया. इस भोजन को बनाने के लिए स्थानीय खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल किया जा रहा है.

वागधारा के सचिव जयेश जोशी ने द हिंदु को बताया कि यह पोषण कैंप शिविर एक प्लैन्ड तरीक़े से, पहले से निर्धारित लक्ष्यों के साथ आयोजित किए गए हैं. इन कैंपों का एक बड़ा मक़सद भाग लेने वाले परिवारों को पोषण के बारे सिखाना भी है.

कैंपों में भोजन बनाने के लिए स्थानीय खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है

फ़िलहाल यह अभियान बांसवाड़ा ज़िले के घाटोल, आनंदपुरी, सज्जनगढ़, कुशलगढ़ और गंगाड़तलाई पंचायत समितियों में चल रहा है. कैंपों में आदिवासी महिलाओं और बच्चों के साथ चर्चा के लिए हर रोज़ एक विषय चुना जाता है.

मध्यम और गंभीर कुपोषण वाले बच्चों की पहचान उनके वज़न और हाथ के ऊपरी हिस्से की परिधि के मापी गई है. गंभीर रूप से कुपोषित 13 बच्चों को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, और दो को ज़िला अस्पताल के कुपोषण उपचार केंद्रों में रेफ़र भी किया गया है.

इस अभियान से एक बड़ी बात जो सामने आई है, वो यह है कि बाजरा, सब्जियां, अंकुरित अनाज, रागी और तिल के लड्डू, और समा खीर जैसे स्थानीय खाद्य पदार्थों के अलावा घर पर किचन गार्डन वाले परिवार अपने लिए सही पोषण का स्तर बनाए रखने में सफ़ल रहे हैं.

उम्मीद है कि ऐसे परिवारों के बच्चे कोविड की तीसरी लहर का सामना करने के लिए पूरी तरह से तैयार होंगे.

ज़िले के कुपोषित बच्चों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है. उनकी एक मोबाइल ऐप के ज़रिए ट्रैकिंग भी की जा रही है. इसके लिए आंगनबाडी कार्यकर्ता पहचान किए गए बच्चों की जानकारी नियमित रूप से ऐप में अपलोड करते हैं. डाटा का विश्लेषण कर अभियान को आगे जारी रखने के बारे में फैसला लिया जाएगा.

पोषण स्वारज अभियान, जिसमें अब तक 16,909 बच्चे कुपोषित पाए गए हैं, ने आदिवासी बहुल क्षेत्रों में उगाई जाने वाली पारंपरिक खाद्य फ़सलों पर जोर दिया है.

अभियान चलाने वाले लोगों का मानना है कि पारंपरिक फ़सलें स्थानीय समुदायों की खाद्य और पोषण सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं.

आदिवासियों के खानपान में मुख्य रुप से जंगल, ज़मीन से मिलने वाले खाद्य पदार्थ शामिल होते हैं. आदिवासी समुदाय खाद्य पौधों सहित अन्य पौधों की 9,000 से अधिक प्रजातियों के इस्तेमाल से परिचित हैं.

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