आदिवासी ढाक की थाप सुन कर देवता झूमता है

खेत हो या जंगल, घर में फ़सल के इस्तेमाल से पहले इस फ़सल का भोग प्रकृति अपने देवी देवताओं और पुरखों को लगाया जाता है. उसके बाद ही परिवार नई फ़सल का इस्तेमाल कर सकता है. नवाखानी में ये आदिवासी बेशक अपने घर में बने चूल्हे पर फ़सल का पहला फल चढ़ाते हैं और फिर घर के अलग अलग हिस्सों में भी अपने देवताओं और पुरखों के नाम पर भोग लगाते हैं. लेकिन पर्व की शुरुआत गाँव में सामूहिक रूप से ही होती है.

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मैं भी भारत की टीम मध्यप्रदेश के बड़वानी ज़िले में कई दिन रही. इस दौरान हमारी टीम को यहाँ के कई गाँवों के आदिवासियों से मिली. इस सिलसिले में ही हम मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा पर बसे बारेला आदिवासी समुदाय के एक छोटे से गाँव में भी गए.

चिचबा नाम के इस गाँव के लोग आज कुदरत यानि धरती, नदी, पहाड़ और जंगल का शुक्रिया अदा कर रहे हैं. अपनी परंपरा के अनुसार ये आदिवासी प्रकृति के साथ साथ अपने पुरखों को भी याद करते हैं और उन्हें भी धन्यवाद कर रहे हैं.

धन्यवाद करने के लिए महुआ से बनाई गई देसी शराब धरती पर चुआ दी जाती है. चिचबा बारेला आदिवासियों का छोटा सा गाँव हैं और बारेला भील आदिवासी समुदाय का ही एक समूह है.

यह जो त्योहार मनाया जा रहा है इसे नवाखानी कहा जाता है. नवाखानी मतलब खेत और जंगल में नई फ़सल का आना और उसे खाने में इस्तेमाल करना.

नवाखानी को यहाँ पर नोवाई या नवाई भी बोलते हैं. बल्कि इस इलाक़े में इस त्योहार को इसी नाम से जाना जाता है.

लेकिन खेत हो या जंगल, घर में फ़सल के इस्तेमाल से पहले इस फ़सल का भोग प्रकृति अपने देवी देवताओं और पुरखों को लगाया जाता है. उसके बाद ही परिवार नई फ़सल का इस्तेमाल कर सकता है. 

नवाखानी भारत में एक ऐसी परंपरा या त्योहार है जिसे लगभग हर आदिवासी समुदाय में मनाया और निभाया जाता है. हाँ यह ज़रूर है कि अलग अलग इलाक़ों और समुदायों में इस पर्व के नाम में फ़र्क़ मिलेगा.

झारखंड में इस कर्मा कहा जाता है तो ओडिशा में बाह पर्व कहा जाता है जो नई फ़सल और जंगल में नए फूल फलों से जुड़ा है. आदिवासी जीवनशैली की सामूहिकता इनके त्योहारों में भी मिलती है.

नवाखानी में ये आदिवासी बेशक अपने घर में बने चूल्हे पर फ़सल का पहला फल चढ़ाते हैं और फिर घर के अलग अलग हिस्सों में भी अपने देवताओं और पुरखों के नाम पर भोग लगाते हैं. लेकिन पर्व की शुरुआत गाँव में सामूहिक रूप से ही होती है.

इसके लिए  गाँव के सभी लोग मिल कर एक बकरे की बलि का इंतज़ाम करते हैं. बलि के बकरे को गाँव के हर परिवार में बराबर बाँटा जाता है. उसके बाद नाच-गाने का कार्यक्रम शुरू होता है जो रात-रात भर चलता है. 

इस के अलावा यहाँ हमने भील समुदाय का मशहूर ढोल भी देखा और सुना. इस ढोल को उठाने में दो आदमियों को भी मिल कर काफ़ी ज़ोर लगाना पड़ता है. इसका वजन 50 किलो से 70-80 किलो तक हो सकता है.

यह ढोल भील आदिवासियों की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा हुआ है.

इस ढोल के साथ थाली और मांदल बजाया जाता है. अब आप यह सुन कर हैरान रह जाएँगे कि इस ढोल को ये आदिवासी कंधों से टांग कर पूरा पूरा दिन बजाते रहते हैं.

इस ढोल की थाप पर ये आदिवासी झूमते रहते हैं. इस नाच में शामिल लड़कियों के हाथों में रंगीन रूमाल रहते हैं….आपने भील आदिवासियों के त्योहार भगोरिया के बारे में ज़रूर सुना होगा.

भगोरिया के समय धार, झाबुआ, खरगोन, आलीराजपुर, करड़ावद के हाट-बाजार मेले का रूप ले लेते हैं और हर तरफ फागुन और प्यार का रंग बिखरा नजर आता है. 

जीप, छोटे ट्रक, दुपहिया वाहन, बैलगाड़ी पर दूरस्थ गांव के रहने वाले लोग इस हाट में सज-धज के जाते हैं. 

4-5 भुट्टे भून कर पहले बैलों को खिलाया दिया जाता है. घर में चावल बनाए जाते हैं, उसके बाद हमारा बड़वा यानि पुजारी आता है. ककड़ी को कई टुकड़ों में काट लिया जाता है.

फिर इन टुकड़ों को घर के अलग अलग हिस्सों और गाड़ी आदि पर रख दिया जाता है. फिर इसके बाद नई फ़सल का फल हम लोग खाना चालू कर सकते हैं. 

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