HomeIdentity & Lifeचेन्चू जनजाति कैसे, कहां और क्यों गायब हो रहे हैं

चेन्चू जनजाति कैसे, कहां और क्यों गायब हो रहे हैं

फ़िलहाल जब देश में एकबार फिर जनगणना चल रही है तो क्या PVTG समुदायों की गिनती सही सही नहीं की जानी चाहिए? क्या इस बात की तहकीकात नहीं होनी चाहिए कि इन जनजाति समुदायों के लोग कब, कैसे, कहां और क्यों ग़ायब हो रहे हैं?

चेन्चू आदिवासियों (Chenchu Tribe) को चेन्चूबारू के नाम से भी जाना जाता है. इन आदिवासियों का यह नाम कैसे पड़ा इस बारे में दो थ्योरी हैं – पहली थ्योरी के अनुसार चेन्चू का मतलब होता है चेत्तू यानि पेड़ के नीचे रहने वाले लोग.

इसका मतलब ये हुआ कि ये आदिवासी आमतौर पर स्थाई घर नहीं बनाते हैं. इनके घर घासफूस से बने बहुत कामचलाऊ होते हैं. इनका ज़्यादातर समय खुले जंगल में ही कटता है.

इनके नाम से जुड़ी दूसरी थ्योरी ये है कि इनका नाम चेन्चू इसलिए पड़ा क्योंकि ये चूहे खाते हैं. चूहों या छछुंदर जैसे प्राणियों को कई इलाकों में चुन्चु भी कहा जाता है.

चेन्चु आदिवासी मूल रुप से आंध्रप्रदेश के मध्य पहाड़ी क्षेत्रों के रहने वाले बताए जाते हैं. अविभाजित आंध्र प्रदेश में ये आदिवासी महबूबनगर, कुरनूल और गुंटूर में बसे हैं.

इसके अलावा, चेन्चू आदिवासी ओडिशा के कई ज़िलों में भी रहते हैं। चेन्चू आदिवासियों को आदिम जनजाति (primitive tribe) की सूची में रखा गया है. जिसे PVTG भी कहा जाता है.

इस आदिवासी समुदाय के बारे में अब मैं जो जानकारी आपके सामने रखने वाला हूँ उसे थोड़ा ध्यान से देखिएगा, आदिम जनजातियों की घटती जनसंख्या एक चिंता की बात है, इस पर तो हम कई बार बात करते रहे हैं, चेंन्चू आदिवासियों के बारे में भी यह बात बिलकुल सही है.

लेकिन इनकी जनसंख्या के आंकड़े कुछ ऐसे हैं जिन्हें देखकर आपका सिर चकरा जाएगा.

साल 1961 से, ओडिशा में इस साल चेन्चू आदिवासियों की कुल जनसंख्या दर्ज हुई 52, सन 1971 में फिर जनगणना हुई और चेन्चू आदिवासियों की जनसंख्या रह गई सिर्फ़ 8 यानि उनकी जनसंख्या singal digit में पहुंच गई.

लेकिन अगल दो दशक में कोई चमत्कार हुआ और 1991 की जनगणना में चेन्चू आबादी बढ़ कर 275 हो गई, 2001 में देश भर में एकबार फिर लोगों की गिनती की गई और इस बार चेन्चू आदिवासी जनसंख्या दर्ज की गई सिर्फ़ 28.

इसके बाद साल 2011 में यानि एक दशक बाद यह जनसंख्या और कम हो गई और इस जनगणना में चेनचू आदिवासियों की जनसंख्या रह गई 13 जिसमें 6 पुरूष और 7 महिलाएं शामिल थीं.

तो बताइए क्या समझ में आया, इस आदिम जनजाति समूह की जनसंख्या के आंकड़ों में इस झोल को जस्टिफ़ाई करने के लिए एक ही कारण दिया गया है – कहा गया है कि यह एक घुमंतु जनजाति है यानि भोजन की तलाश में यह जनजाति जंगल में एक जगह से दूसरी जगह जा कर बस जाते हैं.

लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि जब जनगणना के आंकड़े एक आदिवासी समुदाय में इस तरह के उतार-चढ़ाव दिखा रहा है तो यह ज़रूरी हो जाता है कि इस उतार-चढ़ाव की वजह या वजहों को सही सही समझा जाए…वरना जनगणना का मकसद ही क्या है?

दावा तो यही किया जाता है ना कि जनगणना के आंकड़े देश के लोगों की आर्थिक – सामाजिक स्थिति को समझने के लिए ज़रूरी हैं.

इसके अलावा अगर किसी PVTG समुदाय की सही सही जनसंख्या ही नहीं पता है तो फिर PM JANMAN जैसी योजनाओं को कैसे लागू किया जाता है.

PM JANMAN 2023 में शुरू की गई 23000 करोड़ की एक स्कीम थी जिसका मकसद सीधा PVTG समुदायों की बस्तियों का विकास करना था और मैं आपको अपने अनुभव से यह बता सकता हूं की सिर्फ चेन्चू नहीं बल्कि देश के कई आदिम जनजाति समूहों की हालत यही है.

क्योंकि ये समूह लोकतंत्र में कोई बड़ा दबाव समूह नहीं बन पाए हैं तो ऐसा लगता है किसी को इनकी गिनती की चिंता ख़ास है भी नहीं.

फ़िलहाल जब देश में एकबार फिर जनगणना चल रही है तो क्या PVTG समुदायों की गिनती सही सही नहीं की जानी चाहिए? क्या इस बात की तहकीकात नहीं होनी चाहिए कि इन जनजाति समुदायों के लोग कब, कैसे, कहां और क्यों ग़ायब हो रहे हैं?

इसके कारण प्राकृतिक हैं, आर्थिक या सामाजिक हैं? क्या सचमुच में वे आज भी हंटर-गदर्र यानि भोजन की तलाश में जंगल जंगल भटकने वाले आदिवासी समूह हैं या फिर अन्य कारणों से वे पलायन कर जाते हैं?

जब वे पलायन करके कहीं और चले जाते हैं तो वहां उनकी गिनती क्यों नहीं होती है?

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