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100 साल से अंधेर में जी रहे आदिवासी के लिए चुनाव का क्या मतलब?

असम के चाय बागानों में आदिवासी जिन हालातों में जीते हैं उनमें टीबी जैसी बीमारी साथ पलती है.

असम विधान सभा चुनाव में एक बार फिर चाय बागानों में रहने वाले आदिवासियों की चर्चा हो रही है. बीजेपी पिछले दो विधान सभा चुनाव (2016, 2021) में इन समुदायों को राज्य की अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने का वाद करके मुकर चुकी है.

इस चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने चाय बागानों के आदिवासियों को भरोसा दिया है कि अगर वह सत्ता में आए तो चाय बागानों के आदिवासियों को ST का दर्जा ज़रुर दिया जाएगा.

इस बीच में झारखंड में सत्ताधारी पार्टी JMM ने भी अपने प्रत्याशी उतार कर, चाय बागानों के वोटों पर दावा ठोक दिया है.

इन बातों से यह तो साफ़ है कि चाय बागानों के श्रमिकों या आदिवासियों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है. यह बताया जाता है कि राज्य की कुल 126 सीटों में से कम से कम 40 सीटों पर चाय बागानों के आदिवासी प्रभाव रखते हैं.

जब वर्तमान सरकार इन समुदायों के उत्थान का दावा कर रही है और विपक्ष उनकी तरक्की और पहचान का वादा तो हमने यह सही समझा कि क्यों ना चाय बागानों में जी रहे लोगों के हालातों को समझा जाए.

इससे सत्ताधारी के दावे और विपक्ष की चुनौती दोनों को समझने में आसानी होगी.

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