HomePVTGओडिशा के सबसे कमजोर आदिवासी सरकारी योजनाओं से वंचित: CAG रिपोर्ट

ओडिशा के सबसे कमजोर आदिवासी सरकारी योजनाओं से वंचित: CAG रिपोर्ट

CAG की रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि ओडिशा में आदिवासी कल्याण योजनाओं पर भारी खर्च के बावजूद जमीनी स्तर पर लाभ नहीं पहुंच पा रहा है.

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की एक ऑडिट रिपोर्ट में ओडिशा के आदिवासी कल्याण कार्यक्रमों में गंभीर खामियों का खुलासा हुआ है.

CAG द्वारा किए गए एक परफॉर्मेंस ऑडिट से पता चला है कि राज्य के ‘विशेष रूप से कमज़ोर आदिवासी समूहों’ (PVTGs) में से आधे से ज़्यादा यानि करीब 54 फीसदी लोग अब भी सरकार प्रमुख योजनाओं से वंचित हैं.

वहीं ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना’ (MGNREGS) 90 फीसदी परिवारों को अनिवार्य 100 दिनों का काम देने में नाकाम रही है.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य विधानसभा में पेश की गई रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद, PVTG आबादी का 54 फीसदी हिस्सा यानी करीब 1.60 लाख लोग कल्याणकारी योजनाओं के दायरे से बाहर रह गए.

इसकी वजह यह थी कि ‘माइक्रो प्रोजेक्ट एजेंसियां’, जो इन समुदायों के विकास के लिए जिम्मेदार हैं वो 13 PVTG समुदायों के लोगों द्वारा बसाई गई नई अधिसूचित बस्तियों तक बुनियादी सेवाएं पहुंचाने में नाकाम रहीं.

रिपोर्ट के अनुसार, 2018–19 में किए गए एक बेसलाइन सर्वे में 1,138 ऐसे नए गाँव पहचाने गए जहां PVTG समुदाय के लोग रहते थे. लेकिन ये इलाके ‘ओडिशा PVTG सशक्तिकरण और आजीविका सुधार कार्यक्रम’ की पहुंच से बाहर ही रहे.

इन वंचित परिवारों में से 18 फीसदी को तो साफ पीने का पानी उपलब्ध था लेकिन गैस कनेक्शन की सुविधा केवल 34 फीसदी परिवारों तक ही पहुंच पाई.

जांच में पाया गया कि 55 फीसदी पेयजल परियोजनाएं बंद पड़ी मिलीं. इसी तरह 58 प्रतिशत सिंचाई परियोजनाएं खराब या निष्क्रिय पाई गईं. कई परियोजनाएं रखरखाव के अभाव में जल्दी खराब हो गईं.

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कुछ मामलों में बिरहोर  जैसे पूरे के पूरे समुदाय, जिन्हें 1986 में PVTG के रूप में मान्यता दी गई थी, वो सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित रह गए.  इसकी वजह यह थी कि इन योजनाओं को लागू करने के लिए नियुक्त की गई एजेंसी अभी तक पूरी तरह से काम करना शुरू नहीं कर पाई थी.

एक गांव में 2022 में पूरी हुई एक सौर ऊर्जा सिंचाई परियोजना 2024 तक आते-आते बंद पाई गई.

कुपोषण से निपटने के लिए राज्य ने 116 पोषण संसाधन केंद्र स्थापित किए फिर भी 3.59 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित इन इकाइयों में से 55 बेकार पड़ी मिलीं क्योंकि विभाग उनके संचालन खर्चों की योजना बनाने में विफल रहा था.

राज्य ने आदिवासियों की आय बढ़ाने के लिए 229 प्रोसेसिंग यूनिटों (जैसे तेल निकालने और दाल मिलों) पर 48.29 करोड़ खर्च किए. हालांकि, ऑडिट में पाया गया कि इनमें से 46 फीसदी यूनिटें काम नहीं कर रही थीं. जिसका मुख्य कारण बिजली या योजना की गलत तैयारियां थी.

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (MGNREGS) का ऑडिट किया गया. यह एक केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसे हर साल 100 दिनों के काम की कानूनी “गारंटी” देने के लिए बनाया गया है.

लेकिन ऑडिट में पाया गया कि 2019-24 की अवधि के दौरान, जिन परिवारों ने काम की मांग की थी, उनमें से केवल 6.24 फीसदी से 11.26 फीसदी परिवारों को ही वास्तव में पूरे 100 दिनों का रोज़गार मिल पाया. कुछ ज़िलों में तो यह आंकड़ा गिरकर 0.20% तक पहुंच गया.

इसके अलावा जिन ज़िलों की जांच की गई, वहां 1.22 लाख परिवारों को काम देने से पूरी तरह मना कर दिया गया.

इसके बावजूद, राज्य सरकार उस अनिवार्य “बेरोज़गारी भत्ता” का भुगतान करने में नाकाम रही, जो इस कानून के तहत देना ज़रूरी है.

इस योजना के तहत कुछ ज़िलों में परिवारों की औसत सालाना आय महज़ 7,256 थी और उन्हें सिर्फ़ 34 दिनों का काम मिला.

लाभार्थियों ने बताया कि इस योजना में उनकी दिलचस्पी कम हो गई है क्योंकि इसमें मिलने वाली मज़दूरी राज्य की न्यूनतम मज़दूरी से काफ़ी कम है और भुगतान में भी लगातार देरी होती रहती है.

CAG रिपोर्ट में कहा गया है कि मलकानगिरी जिले के कालीमेला और चित्रकोंडा ब्लॉक में चार मृत लाभार्थियों के नाम पर कुल 37,380 रुपये का भुगतान किया गया था. उनकी मृत्यु की दर्ज तारीखों के बाद चार साल तक उन्हें शारीरिक श्रम में लगे हुए दिखाया गया था.

शुरू किए गए 36.99 लाख कार्यों में से 35 फीसदी (12.96 लाख परियोजनाएं) 9,898.70 करोड़ के व्यय के बावजूद मार्च 2024 तक अधूरे रहे.

राज्य ने मनरेगा निधि के 14.42 करोड़ को “ई-लाइब्रेरी” और “स्कूल परिवेश” परियोजनाओं जैसे कामों के लिए खर्च किया, जिसे केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने स्पष्ट रूप से अनुमति नहीं दी.

ऑडिर्ट्स ने पाया कि आदिवासी कल्याण निधि में 61.35 करोड़ बैंक खातों में पड़े हैं, जबकि लक्षित आबादी में बुनियादी सुविधाओं का अभाव बना हुआ है.

ऑडिट में ग्राम रोजगार सेवकों (ग्राम रोजगार सहायकों) के 54% पद खाली पाए गए. इससे रोजगार रिकॉर्ड और जॉब के सत्यापन के लिए जिम्मेदार प्रमुख अधिकारी हैं.

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