असम में कुल 126 सीटों में से कम से कम 40 ऐसी सीटें हैं जिन पर चाय बागानों में काम करने वाले श्रमिक और आदिवासी निर्णायक होते हैं. यह उम्मदी की जा रही थी इस बार चाय बागानों का मतदाता कांग्रेस पार्टी की तरफ़ झुक सकता है.
वैसे चाय बागानों में अब कांग्रेस का वह दबदबा नहीं है जो एक ज़माने में होता था. बीजेपी काफ़ी हद तक कांग्रेस वर्चस्व को तोड़ चुकी है. लेकिन फिर भी उपरी असम (Upper Assam) में यह माना जाता है कि कांग्रेस अभी भी एक बड़ी और मजबूत पार्टी है.
लेकिन जब मैं असम पहुंचा तो कांग्रेस पार्टी चिंता और मायूसी में डूबे हुए लोगों का समूह नज़र आया. इसकी कई वजहें हमें बताई गईं. मसलन पार्टी के पास चुनाव में ख़र्च करने के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध नहीं है. हांलाकि पार्टी के एक रणनीतिकार ने यह दावा किया कि जनवरी महीने में पार्टी के जो हालात थे, अब काफ़ी बेहतर हो चुके हैं.
उन्होंने हम से बात करते हुए कहा कि कांग्रेस पार्टी की संभावनाएं लगातार बेहतर हो रही हैं. लेकिन उनकी बातों में कोई ख़ास आत्मविश्वास नहीं था.
दरअसल पार्टी की नींद उड़ी हुई है क्योंकि हेमंत सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चा यहां के आदिवासी संगठनों के राजनीतिक फ्रंट जय भारत पार्टी के साथ मिलकर कुल 21 सीटों पर चुनाव लड़ रहा है.
कांग्रेस पार्टी को चिंता खा रही है कि हेमंत सोरेन की पार्टी को जो वोट मिलेगा वह कांग्रेस के खाते से जा रहा है. इस सिलसिले में झारखंड में कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष और आदिवासी नेता बंधु तिर्की से मेरी लंबी बातचीत हुई. इस बातचीत में उन्होंने यह दावा किया कि झारखंड मुक्ति मोर्चा यहां चुनाव जीतने की स्थिति में नहीं है.
बंधु तिर्की से हमारी यह बातचीत गुवाहाटी में हुई थे जहां वो काफ़ी समय से डेरा डाले हैं. कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें सीनियर ऑब्ज़र्वर नियुक्त किया है.
गुवाहाटी से निकलकर हम अपर असम के चाय बागानों में गए और वहां करीब एक सप्ताह का समय बिताया. इस दौरान हमने लोगों से बात करते हुए दो बातों पर फोकस किया – क्या चाय बागानों में भी बीजेपी का लाभार्थी वोट बैंक बना है और दूसरा झारखंड मुक्ति मोर्चा के चुनाव मैदान में उतरने से कांग्रेस को कितना नुकसान होने की आशंका होनी चाहिए.
इन दोनों ही सवालों के जवाब सीधे सीधे देना मुश्किल है, लेकिन फिर भी यह कहा जा सकता है कि इस चुनाव में चाय बागानों के वोट को लेकर जितनी चिंता कांग्रेस को हो रही है उससे ज़्यादा चिंता बीजेपी को करनी चाहिए.
यह बात बिलकुल सही है कि चाय बागानों में बीजेपी सरकार की योजनाओं के लाभार्थी खुश हैं. लेकिन चाय बागानों में हेमंत सोरेन की लोकप्रियता शिखर पर है. इसके अलावा कई विधान सभा क्षेत्रों में पिछले दस साल में मूलभूत सुविधाओं पर कोई काम ना होने से लोग पार्टी से नाराज़ हैं.
असम में भी बीजेपी ने कई अन्य राज्यों की तरह इस तरह की नाराज़गी को काउंटर करने के लिए कई विधायकों का टिकट काट दिया है. लेकिन फिर भी इन इलाकों में पार्टी को जीत के लिए कठिन मेहनत करनी होगी.
मसलन डिब्रुगढ़ से करीब 50 किलोमीटर की दूरी पर बसी दुलियाजान सीट पर पार्टी ने पुराने धुरंधर रामेश्वर तेली को उतारा है. रामेश्वर तेली एक दिन में 12-15 छोटी छोटी सभाएं कर रहे हैं. हमने उनके साथ चाय बागानों में पूरा एक दिन बिताया और देखा कि वे एक एक वोटर तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं.
मैरे साथ बातचीत में रामेश्वर तेली झारखंड मुक्ति मोर्चा की उपस्थिति को बहुत महत्व नहीं दे रहे थे. लेकिन वह भी जानते हैं कि उनकी पार्टी पुराने विधायक तेराश गोवाला से लोग बहुत नाराज़ हैं.
हमने चाय बागानों में ख़ासतौर से महिला वोटर्स से बातचीत की. इस बातचीत में हमें यह अहसास हुआ कि बड़ी संख्या में महिलाओं को बीजेपी सरकार की योजनाओं मे कैश बेनिफ़िट हुआ है. लेकिन इसके बावजूद वे हेमंत सोरेन को वोट करना चाहती हैं.
उपरी असम के डिब्रूगढ़, दुलियाजान और सोनारी के इलाके में कई दिन बिताने के बाद हमें तो यही लगा कि ऐसा ना हो की कांग्रेस की बजाए हेमंत सोरेन बीजेपी को ही ज़्यादा नुकसान कर दे.

