HomeMain Bhi Bharatपिठोरा पेंटिंग्स: आस्था, कला और दुनिया को देखने का आदिवासी नज़रिया

पिठोरा पेंटिंग्स: आस्था, कला और दुनिया को देखने का आदिवासी नज़रिया

पिठोरा पेंटिंग्स (Pithora Painting) आदिवासी धार्मिक आस्थाओं से जुड़ी हैं. इन पेंटिंग्स को एक बड़े उत्सव में घर की दिवारों पर बनाया जाता है. ये चित्र अडिग धार्मिक आस्थाओं के साथ साथ दुनिया में आ रहे बदलावों को दर्ज करते हैं.

पिठोरा बाबा या पाणगा का आयोजन आमतौर पर कोई परिवार किसी मन्नत के पूरा होने पर, वंश, परिवार या गांव को बीमारियों या अन्य मुसीबतों से रक्षा या फिर अच्छी फसल और आर्थिक संपन्नता के लिए करता है.

यह देवों को प्रसन्न करने और धन्यवाद देने के लिए किया जाता है. 

पिठोरा देव की पूजा तीन दिन का उत्सव होता है. इन तीन दिनों तक परिवार परंपरा के अनुसार रीति-रिवाज और नियमों का पालन करते हुए पुरखों के आगमन की तैयारी करता है.

पिठोरा बाबा से जुड़े सभी कार्य गांव के बड़वा की देखरेख में होते है. बड़वा भिलाला या राठवा समुदाय में धार्मिक कार्य की ज़िम्मेदारी संभालता है.

इस आयोजन में मुख्य रुप से घर को तीन हिस्से में बांटा जाता है. इस व्यवस्था के अनुसार घर की सीमा पर जातर की स्थापना होती है. 

पिठोरा पेंटिंग्स गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले भील, भीलाला और राठवा आदिवासी समुदायों की दुनिया की तस्वीर पेश करता है.

ये आदिवासी समुदाय ऐसे परिवारों का समूह है जो एक जैसा  विश्वास रखते हैं, एक ही क्षेत्र में रहते हैं और इनकी भाषा में भी समानता मिलती है, जिसकी अपनी कोई लिपि (script) नहीं होती.

ऐसा माना जाता है कि भारत की आदिवासी कला ने अपनी खुद की तकनीक और शैली विकसित की है. यह कला पूरी तरह से उनके पारंपरिक विश्वासों, प्रकृति और आत्माओं यानि पुरखों से जुड़ी हुई है.

मुख्यधारा कहे जाने वाले समाज की तरह जनजातीय समुदायों में कलाकारों का कोई अलग या विशेष वर्ग नहीं होता. अक्सर खेती किसानी या मज़दूरी करने वाले आम लोग ही पिथौरा बाबा की पेंटिंग्स बनाते आए हैं.

उनकी कला पूरी तरह से उनके रीति-रिवाजों, विश्वासों और देवी-देवताओं से गुंथी हुई है. उनके आस-पास का माहौल, समाज और भौगोलिक परिस्थितियाँ उनकी कला में एक बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. 

गुजरात के छोटा उदयपुर में रहने वाले प्रोफेसर अर्जुन राठवा कहते हैं,”पिठोरा को हम पिठोरा बाबा बोलते हैं. घर का जो मेन पार्ट होता है उसकी तीन दीवारों पर Paintings का एक collection होता है. सभी paintings में एक स्टोरी होती है. उसको आप writings कह सकते हैं. क्योंकि जो उन्हें बनाते हैं उन्हें हम पेंटर नहीं लखारा बोलते हैं. तो यह एक pictorial writing है, जो आदिवासी इतिहास, आदिवासी दृष्टिकोण या फिर इस एरिया का इतिहास या दृष्टिकोण कह सकते हैं. यह कब से हो रहा है, यह हमें नहीं पता है”.

एक वक़्त था जब पिथौरा बाबा की पेंटिग्स बनाने के लिए परिवार घर की दिवारों को तैयार करने में कई दिन मेहनत करता था. लेकिन वक़्त के साथ जब परिवारों की आर्थिक हालात बदले और मकान पक्के होने लगे तो आयोजन 3 दिन तक सिमट गया.

पिठोरा बाबा के उत्सव में घर के आंगन में गाड़ने के लिए जंगल से पेड़ की डाल लाई जाती है. इन डालों को जंगल से लाने वालों का परिवार के लोग स्वागत-सत्कार करते हैं.

स्थानीय भाषा में इन डालों को कलम डाल कहा जाता है, जो शायद साल के पेड़ की होती हैं. आदिवासी समुदायों में ऐसा विश्वास है कि उनके देव, पुरखे या प्रेत इस पेड़ की डाल पर ही रहते हैं.

इसलिए पिठोरा बाबा के साथ साथ उनको भी इस उत्सव में आमंत्रित किया जाता है. 

पिठोरा देव के उत्सव के लिए परिवार अपने रिश्तेदारों और मित्रों को आमंत्रित करता है. ये रिश्तेदार अपने साथ खाने-पीने का सामान भी लाते हैं.

एक तरह से पिथौरा बाबा के उत्सव में यह परिवार के ख़र्च में सहयोग होता है. आजकल मोबाइल फ़ोन का दौर है और यातायात के साधन उपलब्ध हैं तो लगभग सभी रिश्तेदार पिथौरा देव के उत्सव में शामिल होने पहुंच ही जाते हैं.

लेकिन परंपरा ऐसी भी है कि कुछ रिश्तेदार पिथौरा बाबा के उत्सव के कई दिनों बाद आते रहते हैं. परिवार गांव के लोगों के साथ मिलकर इन रिश्तेदारों की आवभगत करता है. 

पिठोरा देव की पेंटिंग्स में दीवार पर आकृतियों को लिखने का तरीका बहुत ही दिलचस्प होता है. यह देखा जाता है कि सतह पर बनी सभी आकृतियां ऐसी लगती हैं मानो वे हवा में तैर रही हैं.

उनके नीचे कोई लाइन या धरातल नहीं बनाया जाता है. इन चित्रों में दूरी (perspective) और सही नाप-तौल (proportions) पर ध्यान नहीं दिया जाता.मसलन आधुनिक paintings में किसी चीज़ को दूर दिखाने के लिए उसे छोटा बनाया जाता है और करीब दिखाने के लिए आकृति को बड़ा कर दिया जाता है.

आधुनिक रूप से प्रशिक्षित कलाकारों की तरह, पिठोरा पेंटिंग्स बनाने वाले लोग इन नियमों, चित्रों की बनावट के कायदों, light and shades यानि रोशनी और परछाई जैसी चीजों को महत्व नहीं देते.

पिठोरा देव की तीन दीवारों में से जो मुख्य दिवार होती है, उसके चित्र अनुभवी और माहिर कलाकार ही बनाते हैं. लेकिन आने वाले समय के लिए अन्य लोगों को तैयार करने के लिए बाकी दो दिवारों पर नए कलाकारों को मौका दिया जाता है.

पिठोरा पेंटिंग्स को ध्यान से देखेंग तो आदिवासियों का परिवेश कैसे बदला है और उनकी ज़िंदगी में क्या नया  शामिल हुआ है या क्या पीछे छूट गया है…वो समझा जा सकता है.

आदिवासी समुदाय में बड़वा वह व्यक्ति माना जाता है जिसे देव यानि उनके पुरखे गांव और परिवार से संवाद के लिए चुनते हैं. पिठोरा देव के उत्सव में बड़वा डमरु बजा कर देवों का गायणा करता है.

इसके ज़रिए वह देवों को उस घर में पधारने का आह्वान करता है. ऐसा माना जाता है कि देव बड़वा के शरीर में प्रवेश करके गांव या परिवार के सदस्यों से बात करते हैं.

इस बातचीत में वे गांव के भले-बुरे के बारे में बताते हैं. पिठोरा देव की पूजा में बड़वा के माध्यम से पुरखे या देव दिवारों पर बने चित्रों की सटीकता भी बताता है.

बदलाव प्रकृति का नियम है. यह बदलाव आदिवासी कला और उत्सवों में भी दर्ज हो रहा है. आदिवासी समुदायों के आधुनिक और मशीनी दुनिया के साथ रिश्तों का असर उनके चित्रों में भी साफ दिखाई देता है.

यही वजह है कि अब उनकी दीवारों पर पारंपरिक चित्रों के साथ-साथ हवाई जहाज़, ट्रेन, लॉरी और कारों जैसी आधुनिक चीजों की आकृतियां भी दिखाई देने लगी हैं.

पिठोरा बाबा के उत्सव से कई ज़रूरी बातें पता चलती हैं. इन बातों में पहली बात ये है कि वे प्रकृति और पुरखों में ही विश्वास करते हैं. उनकी धार्मिक आस्थाओं में ईश्वर की वैसी धारणा नहीं है जैसी दुनिया के मुख्यधारा के धर्मों में होती है.

इसके साथ ही पिठोरा बाबा के चित्रों मे दर्ज बदलावों से यह पता चलता है कि आदिवासी के धार्मिक विश्वास जड़ नहीं है. उसमें दुनिया में आ रहे बदलाव जुड़ते जाते हैं. 

पिठोरा उत्सव का समापन तीसरे दिन होता है. यह दावत का दिन होता है. रिश्तेदार और मेहमान जो बकरे लाते हैं,  उन्हे पकाया जाता है. जब तक खाना तैयार होता है, महुआ, शराब या ताड़ी का वितरण चलता रहता है. दरअसल, पिथौरा देव के उत्सव में पहले दिन सबसे पहले रसोई की ही स्थापना की जाती है. यह कार्य भी बड़वा ही करवाता है.

पिथौरा पेंटिंग्स के भविष्य को लेकर अभी कोई ख़तरा नज़र नहीं आता है. बल्कि यह देखा जा रहा है कि भील, भिलाला और राठवा समुदायों में पिथौरा बाबा के उत्सव के आयोजन बढ़ रहे हैं.

एक अच्छी ख़बर है कि पिठोरा बाबा को मानने वाले आदिवासी समुदाय अपनी आदिवासियत की दावेदारी को मजबूत करने के लिए इन पेंटिग्स को जि़ंदा रखना चाहते हैं.

लेकिन क्या वार्ली पेंटिंग्स की तरह ही पिठोरा बाबा की पेंटिंग्स भी अब कैनवास या कपड़ों पर उतरनी चाहिएं. क्या ऐसा प्रयास इस कला को दुनिया के सामने पेश कर सकता है.

इसके अलावा क्या इस तरह की कोशिश नई पीढ़ी को इस कला को सीखने और उसमें प्रयोग करने के लिए प्रेरित कर सकती है. या फिर यह माना जाए कि ये पेंटिंग्स आदिवासी धार्मिक आस्थाओं से जुड़ी हैं और इसकी पवित्रता को बरक़रार रखा जाना चाहिए?

ठीक क्या है यह एक ऐसी बहस से ही तय हो सकता है जसमें मेन Stake Holder वे आदिवासी समुदाय हों जो पिथोरा बाबा को पूजते हैं. 

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