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उत्तर बंगाल में आदिवासियों के लिए ज़मीन से जुड़ी जानकारी और जागरूकता के लिए कैंप शुरू

हाल के दिनों में कई आदिवासी संगठनों ने आरोप लगाया है कि उत्तर बंगाल में आदिवासियों की ज़मीन पैसे का लालच देकर दूसरों के हाथों में चली गई है.

पश्चिम बंगाल ट्राइबल डेवलपमेंट कोऑपरेटिव कॉर्पोरेशन (WBTDCC) ने उत्तर बंगाल के कुछ हिस्सों में “ज़मीन से जुड़ी जानकारी” (लैंड लिटरेसी) देने वाले कैंप शुरू किए हैं.

यह कदम आदिवासी संगठनों की उन शिकायतों के बाद उठाया गया है जिनमें कहा गया है कि चाय बागानों, रिसॉर्ट्स, होमस्टे और दूसरे कामों के लिए उनके समुदाय के लोगों की ज़मीन पर कब्ज़ा किया गया है.

पिछले मंगलवार को शुरू हुई इस पहल का मकसद आदिवासी समुदायों को उनकी ज़मीन से जुड़े कानूनी अधिकारों के बारे में जानकारी देना है.

यह कदम जलपाईगुड़ी, अलीपुरद्वार, दार्जिलिंग, कलिम्पोंग, तराई के कुछ हिस्सों और दार्जिलिंग के सिलीगुड़ी सब-डिविजन में आदिवासी संगठनों की बार-बार की जा रही शिकायतों के बाद उठाया गया है.

इन शिकायतों में कहा गया है कि उनकी ज़मीन पर कब्ज़ा किया जा रहा है.

अधिकारियों ने बताया कि कई आदिवासियों को यह नहीं पता था कि बंगाल में आदिवासियों की ज़मीन गैर-आदिवासियों को ट्रांसफर करने पर सख़्त पाबंदियां हैं.

WBTDCC के रीजनल मैनेजर सांगय डुकपा (Sangay Dukpa) ने कहा कि राज्य सरकार आदिवासियों में उनके ज़मीन के अधिकारों के बारे में जागरूकता बढ़ाना चाहती है.

डुकपा ने कहा, “अलग-अलग ज़िलों में बड़ी मल्टीपर्पस कोऑपरेटिव सोसायटियों के ज़रिए, हमने इस हफ़्ते से चुने हुए आदिवासी पुरुषों और महिलाओं को ज़मीन से जुड़ी जानकारी देने के लिए ट्रेनिंग देना शुरू किया हैय ट्रेनिंग पाए ये लोग आदिवासी समुदायों में जाकर जागरूकता फैलाएंगे और इन मामलों के बारे में समझाएंगे.”

आर्थिक प्रलोभन देकर जमीन हस्तांतरण का आरोप

हाल के दिनों में कई आदिवासी संगठनों ने आरोप लगाया है कि उत्तर बंगाल में आदिवासियों की ज़मीन पैसे का लालच देकर दूसरों के हाथों में चली गई है और बाद में उसका इस्तेमाल चाय बागानों, घरों, बाज़ारों, रिसॉर्ट्स और होमस्टे के लिए किया गया है.

आदिवासी संगठन ‘प्रोग्रेसिव टी वर्कर्स यूनियन’ के जलपाईगुड़ी ज़िला जनरल सेक्रेटरी बबलू माझी ने जून में लिखित शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें ज़िले में आदिवासियों की ज़मीन पर कब्ज़े का आरोप लगाया गया था.

एक और संगठन, ‘अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद’ ने हाल के वर्षों में तराई और डुआर्स में आदिवासियों की ज़मीन पर कथित कब्ज़े को लेकर ज़मीन विभागों में लिखित शिकायतें दी हैं.

परिषद की राज्य समिति के कार्यकारी अध्यक्ष तेज कुमार टोप्पो ने कहा, “छोटी और बड़ी चाय बागानों से लेकर प्राइवेट कॉटेज, रिसॉर्ट्स और होमस्टे बनाने के लिए आदिवासियों की ज़मीनें हड़प ली गई हैं.”

आदिवासी संगठन के नागराकाटा ब्लॉक सेक्रेटरी, बिकास बरला ने कहा, “खायरकाटा में ऐसी घटनाओं के बारे में ज़मीन विभाग को जानकारी दी गई है जहां गैर-आदिवासी लोग आदिवासियों की ज़मीन पर कब्ज़ा कर रहे हैं. लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है.”

बरला ने आगे कहा, “ज़मीन विभाग ने आदिवासियों की ज़मीन वापस पाने के लिए अब तक किए गए प्रशासनिक हस्तक्षेप के बारे में कोई जानकारी नहीं दी है.”

एक आदिवासी नेता ने सवाल किया कि गैर-आदिवासियों को आदिवासियों की ज़मीन पर कब्ज़ा करने से रोकने के लिए कड़े नियम होने के बावजूद, ज़मीन के ऐसे हस्तांतरण क्यों हुए.

उन्होंने कहा कि हम उन अधिकारियों की भूमिका की जांच चाहते हैं जिन्होंने अवैध कब्ज़ों को नज़रअंदाज़ किया या मूकदर्शक बने रहे.

आदिवासी महिलाओं ने पहल का स्वागत किया

लैंड लिटरेसी कैंप में हिस्सा लेने वाली आदिवासी महिलाओं ने इस पहल का स्वागत किया.

जलपाईगुड़ी जिले के अंगराबाशा की रहने वाली युवा आदिवासी महिला शिलाबती टोपनो ने कहा, “हम चाहते हैं कि आदिवासी जमीन आदिवासी लोगों के पास ही रहे. अब तक किसी ने इस विषय पर विशेष ध्यान नहीं दिया था, भूमि-साक्षरता की यह पहल बिल्कुल सही समय पर शुरू की गई है.”

अलीपुरद्वार ज़िले के समुक्तला की एक आदिवासी महिला, सुखमनी टुडू ने कहा कि ज़मीन के इन अवैध हस्तांतरणों में गरीबी और जानकारी की कमी की बड़ी भूमिका रही है.

उन्होंने कहा, “बहुत से लोगों ने हमें थोड़े से पैसे का लालच देकर हमारी ज़मीन छीन ली है. अगर हमें अपने ज़मीन के अधिकारों के बारे में पता होगा तो ये चीज़ें अपने आप बंद हो जाएंगी.”

शुरुआत में 18 शिविर लगाए गए

WBTDCC के सूत्रों ने बताया कि उन्होंने शुरू में तय किए गए इलाके में आदिवासी समुदायों के लिए 18 ज़मीन साक्षरता शिविर शुरू किए थे.

एक सूत्र ने कहा, “लोगों का अच्छा रिस्पॉन्स मिला है. आने वाले दिनों में ज़रूरत के हिसाब से ऐसे शिविरों की संख्या बढ़ाई जाएगी.”

ज़मीन साक्षरता शिविर सितंबर के तीसरे हफ़्ते तक जारी रहेंगे.

इस पहल का मुख्य उद्देश्य आदिवासी समुदायों को यह समझाना है कि उनकी भूमि के संबंध में कौन-कौन से कानूनी अधिकार और सुरक्षा प्रावधान लागू हैं. सरकार का मानना है कि भूमि अधिकारों के बारे में जानकारी बढ़ने से आदिवासी लोगों को आर्थिक लालच, धोखाधड़ी और अवैध भूमि हस्तांतरण से बचाने में मदद मिल सकती है.

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