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मध्य प्रदेश के बालाघाट में 24 आदिवासी बच्चों की मौत, सर्व आदिवासी समाज ने निकाली रैली

राज्य सरकार इतने बच्चों की मौत के बाद दावा कर रही है कि उन्होंने प्रभावित इलाकों में स्वास्थ्य निगरानी बढ़ा दी है. लेकिन सवाल ये है कि आखिर राज्य हेल्थकेयर सिस्टम इन गांवों तक तब क्यों पहुंचा, जब बच्चों की मौतें शुरू हो चुकी थीं.

मध्य प्रदेश के बालाघाट ज़िले के के बिरसा ब्लॉक में जून से अगस्त के बीच ‘विशेष तौर पर कमज़ोर आदिवासी समूह’ (PVTG) बैगा समुदाय के 20 से ज्यादा बच्चों की मौत हो गई है.  

जबकि दूर-दराज़ के गांवों के एक समूह में 200 से ज़्यादा लोगों के बीमार होने की खबर है

ये मौतें खसरा, मलेरिया और कुपोषण जैसी बीमारियों के फैलने के कारण हुई हैं, जिससे दूर-दराज़ के आदिवासी इलाके में स्वास्थ्य सेवाओं की हालत को लेकर चिंता बढ़ गई है.

स्थानीय आदिवासी प्रतिनिधियों का दावा है कि प्रभावित गांवों में 24 बच्चों की मौत हुई है.

वहीं ज़िला प्रशासन ने जून के बाद से हुई आठ मौतों को मौसमी बीमारियों से जोड़ा है. अधिकारियों का कहना है कि मलेरिया और खसरा मुख्य वजहों में शामिल थे, जबकि कुछ अन्य मौतें जेनेटिक या बीमारी से अलग दूसरी मेडिकल वजहों से हुईं.

सर्व आदिवासी समाज ने निकाली रैली

इन मौतों के विरोध में रविवार शाम ‘सर्व आदिवासी समाज’ के सदस्यों ने एक रैली निकाली और स्वास्थ्य सुविधाओं और बीमारी की रोकथाम में लापरवाही के लिए ज़िम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की.

उन्होंने मारे गए बच्चों के परिवारों के लिए तुरंत आर्थिक मदद की मांग की और कहा कि कई प्रभावित गांवों में हालात गंभीर बने हुए हैं.

आदिवासी महिला प्रतिनिधि संदेश सैयाम (Sandesh Saiyam) ने कहा कि आदिवासियों के कल्याण के लिए काफी फंड दिया गया था फिर भी दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले समुदायों को विकास और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी का सामना करना पड़ रहा है.

बिरसा डेवलपमेंट ब्लॉक में अडोरी, मछुरदा, लालपुर, घुम्मुर और अन्य ग्राम पंचायतों के गांवों से ये मौतें सामने आई हैं.

प्रभावित बच्चे ज़्यादातर बैगा परिवारों से थे जो दूर-दराज के जंगली इलाकों में रहते हैं, जहां से स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंचना मुश्किल है.

हाल की रिपोर्टों में सरकारी आंकड़ों से पोषण से जुड़ी चिंताएं भी सामने आई हैं. जुलाई में प्रभावित इलाके के 28 आंगनवाड़ी केंद्रों में छह साल से कम उम्र के 1,149 बच्चों का वज़न किया गया, जिनमें से 213 का वज़न सामान्य से कम और 18 का वज़न बहुत कम पाया  गया.

अधिकारियों ने बताया कि 125 प्रभावित बच्चे ठीक होकर घर जा चुके हैं, जबकि कई अन्य का इलाज चल रहा है.

राज्य सरकार के मुताबिक, उन्होंने इस इलाके में स्वास्थ्य निगरानी बढ़ा दी है. वरिष्ठ अधिकारियों ने बिरसा और बैहर ब्लॉक के प्रभावित गांवों का दौरा किया और पोषण, साफ़-सफ़ाई और स्वास्थ्य सुविधाओं का जायज़ा लिया.

अधिकारियों को कुपोषित बच्चों पर नज़र रखने, नियमित स्वास्थ्य जांच को मज़बूत करने और पीने का साफ़ पानी व साफ़-सफ़ाई सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए गए हैं.

प्रभावित गांवों में टीकाकरण और बीमारी की रोकथाम के लिए विशेष अभियान भी चलाए जा रहे हैं. सरकार मेडिकल स्क्रीनिंग और इलाज जारी रखे हुए है, जबकि अधिकारी हर मौत की असल वजह का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं.

हेल्थ टीम के पहुंचने तक 9 बच्चों की मौत हो चुकी थी

बिरसा ब्लॉक के आदिवासी गांवों में बीमारी फैलने के बावजूद, हेल्थ डिपार्टमेंट को इस प्रकोप के बारे में पता नहीं था.

22 जुलाई को अडोरी के सरपंच परशुराम धुर्वे ने SDM को फोन करके हालात की जानकारी दी. उसी दिन हेल्थ डिपार्टमेंट की एक टीम गांव पहुंची और 23 जुलाई से इलाज शुरू हुआ.

जब तक हेल्थ टीम वहां पहुंची, तब तक नौ बच्चों की मौत हो चुकी थी. बीमारी आस-पास के गांवों में भी फैल गई थी और कई परिवारों में बच्चे बीमार थे. कुछ बच्चे इतनी गंभीर हालत में थे कि अस्पताल पहुंचने के बाद भी उन्हें बचाया नहीं जा सका.

राज्य सरकार का दावा है कि उन्होंने प्रभावित इलाकों में स्वास्थ्य निगरानी बढ़ा दी है, गांवों में टीकाकरण और बीमारी की रोकथाम के लिए विशेष अभियान भी चलाए जा रहे  हैं लेकिन इसके बावजूद बच्चों की मौत लगातार हो रही है. इसके कई कारण हैं…

अस्पताल दूर होना – अदोरी, मछुरदा और लालपुर ग्राम पंचायतें सबसे ज़्यादा प्रभावित इलाकों में से हैं. यहां से प्राइमरी सब-हेल्थ सेंटर 15 से 20 किलोमीटर दूर हैं, जबकि कम्युनिटी अस्पताल 35 से 40 किलोमीटर दूर हैं. दूरी की वजह से कई परिवार बिना डिग्री वाले डॉक्टरों या पारंपरिक इलाज पर निर्भर थे.

सरकारी हेल्थ टीम के आने के बाद भी कई परिवार इलाज करवाने में हिचकिचा रहे थे. उन्हें समझाने में समय लगा, जिससे गंभीर मामलों में अस्पताल में भर्ती करने में देरी हुई.

मीज़ल्स-रूबेला संक्रमण की पहचान समय पर नहीं हो पाई- इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (ICMR) की एक रिपोर्ट के अनुसार, बच्चों की मौत मीज़ल्स-रूबेला की वजह से हुई. बच्चों में त्वचा से जुड़े लक्षण भी देखे गए.

गांवों में आंगनवाड़ी और आशा वर्करों की मौजूदगी के बावजूद, स्वास्थ्य विभाग को इस प्रकोप के बारे में समय पर जानकारी नहीं मिल पाई.

जानकारी की कमी और टीकाकरण में कमियां – बच्चों को नौ महीने और दो साल की उम्र में खसरा-रूबेला (measles-rubella) का टीका लगाया जाता है. हालांकि, ज़मीनी स्तर पर की गई जांच में ऐसे कई गांव मिले जहां बच्चों को टीका नहीं लगाया गया था. कई इलाकों में ANM भी तैनात नहीं हैं.

परिवारों का पलायन, जानकारी की कमी और टीकाकरण को लेकर हिचकिचाहट भी कम टीकाकरण कवरेज की वजह रही है.

कुपोषण से कमज़ोर हुई इम्यूनिटी – इस इलाके में कई बच्चे गंभीर कुपोषण से जूझ रहे थे. कुपोषित बच्चों के लिए सरकारी न्यूट्रिशनल सप्लीमेंट भी कई महीनों से कुछ परिवारों तक नहीं पहुंचे थे.

कुपोषण ने बच्चों की इम्यूनिटी को कमज़ोर कर दिया, जिससे उनमें संक्रमण का खतरा बढ़ गया.

बिरसा ब्लॉक को जनमन एम्बुलेंस नहीं मिली – विशेष तौर पर कमज़ोर आदिवासी समूहों (PVTGs) के लिए प्रधानमंत्री जनमन योजना के तहत, MBBS डॉक्टरों और अन्य हेल्थकेयर वर्करों के साथ मोबाइल एम्बुलेंस उपलब्ध कराई जाती हैं.

बालाघाट में ऐसी चार एम्बुलेंस हैं लेकिन बिरसा ब्लॉक में बैगा आबादी की अच्छी-खासी संख्या होने के बावजूद, वहां एक भी एम्बुलेंस नहीं दी गई.

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