HomePVTGतेलंगाना में थोटी जनजाति विलुप्त होने की कगार पर है

तेलंगाना में थोटी जनजाति विलुप्त होने की कगार पर है

थोटी समुदाय का पारंपरिक निवास क्षेत्र दक्कन के पठारी और वन क्षेत्रों से जुड़ा रहा है. विशेष रूप से तेलंगाना के उत्तरी हिस्से में जंगलों और ग्रामीण बस्तियों के आसपास इनकी उपस्थिति का ऐतिहासिक उल्लेख मिलता है.

तेलंगाना की मान्यता प्राप्त अनुसूचित जनजाति, ‘थोटी’ समुदाय (Thoti community) तेज़ी से घटती आबादी, मौखिक भाषाओं के लुप्त होने, वंशानुगत बीमारियों और गंभीर आर्थिक अस्थिरता के कारण खत्म होने के कगार पर है.

तेलंगाना राज्य विकास योजना सोसाइटी के आंकड़ों से पता चलता है कि राज्य की कुल आदिवासी आबादी 31 लाख 77 हज़ार 940 है, जो राज्य के कुल 3.50 करोड़ निवासियों का 9.1 प्रतिशत है.

जबकि महबूबाबाद और भद्राद्री कोठागुडेम जिले में आदिवासी आबादी का घनत्व सबसे ज़्यादा है. महबूबाबाद में 37.8 प्रतिशत और कोठागुडेम में 36.7 प्रतिशत है. वहीं थोटी जैसे छोटे समुदाय अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

तेलंगाना 32 अनुसूचित जनजातियों को मान्यता देता है, जिनमें राज गोंड, कोया, लाम्बाडा या बंजारा, कोलम, चेंचु, येरुकाला और सवारा शामिल हैं.

इनमें से केंद्र सरकार कुछ समूहों को ‘विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों’ (PVTGs) के रूप में वर्गीकृत करती है क्योंकि वे सामाजिक और आर्थिक रूप से बहुत पिछड़े हुए हैं.

भौगोलिक दृष्टि से कुमरम भीम आसिफाबाद जिला 23 हज़ार 182 पीवीटीजी आबादी के साथ राज्य में सबसे आगे है. इसके बाद आदिलाबाद जिले का स्थान है, जहां इन कमजोर समूहों के 16 हज़ार 373 सदस्य रहते हैं.

हालांकि, थोटी, चेंचु और कोलम को राज्य में अस्तित्व के लिए सबसे बड़े खतरों का सामना कर रहे तीन समुदायों के रूप में पहचाना गया है.

आबादी के आंकड़ों से पता चलता है कि थोटी समुदाय में केवल 4,811 सदस्य हैं, जो मुख्य रूप से पुराने आदिलाबाद जिले में रहते हैं. यह आंकड़ें उन्हें राज्य के प्रमुख PVTGs में सबसे छोटा समूह बनाता है.

इनकी तुलना में चेंचु जनजाति की आबादी 16 हज़ार 912 दर्ज की गई है, जो मुख्य रूप से नागरकुर्नूल जिले में रहती है. जबकि कोलम जनजाति की आबादी 44 हज़ार 805 है.

थोटी लोग ऐतिहासिक रूप से गांव के संदेशवाहक, लोक-गायक और लोक कलाकार रहे हैं, जिन्होंने कहानी कहने और पारंपरिक सांस्कृतिक रीति-रिवाजों की समृद्ध विरासत को बनाए रखा है.

आज कई थोटी लोग खेतिहर मजदूर के रूप में काम करते हैं.

लेकिन अपने सांस्कृतिक योगदान के बावजूद यह समुदाय खत्म होने के कगार पर है क्योंकि उन्हें औपचारिक शिक्षा, आधुनिक स्वास्थ्य सेवा और टिकाऊ आर्थिक अवसरों तक पहुंच नहीं मिल पाती है.

ख़तरे में पड़ी इन जनजातियों के समुदाय के नेताओं ने सरकार से औपचारिक अनुरोध किया है कि उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने और उनके लंबे समय तक संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए विशेष योजनाएं लागू की जाएं.

कौन है थोटी जनजाति?

थोटी समुदाय का इतिहास दक्कन क्षेत्र की आदिवासी सामाजिक संरचना से जुड़ा हुआ है. पुराने प्रशासनिक और मानवशास्त्रीय अभिलेखों में थोटी का उल्लेख आदिलाबाद क्षेत्र की जनजातियों में मिलता है.

भारत सरकार द्वारा गठित लोकुर समिति के पुराने अभिलेख में भी थोटी को आदिलाबाद जिले से संबंधित जनजाति के रूप में दर्ज किया गया था.

थोटी समुदाय को भारत सरकार ने साल 1983 में आधिकारिक तौर पर PVTG के रूप में मान्यता दी थी.

थोटी जनजाति ऐतिहासिक रूप से गोंड (विशेषकर राज गोंड) समुदाय के पारंपरिक गायक, कथावाचक और भाट (bards) रहे हैं. ये गोंड राजाओं और उनके परिवारों की वंशावली, लोककथाओं और मौखिक इतिहास को गाकर भावी पीढ़ियों तक पहुँचाते हैं.

किंकरी (Kingri) वाद्य यंत्र की खास जगह…ये अपनी गायन परंपरा के दौरान ‘किंकरी’ नाम के एक पारंपरिक तार वाले वाद्य यंत्र का उपयोग करते हैं. इसके माध्यम से वे गोंड महाकाव्यों का वाचन करते हैं.

वहीं थोटी समुदाय की महिलाएं गोदना बनाने की कला में निपुण होती हैं. गोंड समुदाय की महिलाओं के शरीर पर धार्मिक और सांस्कृतिक चिन्हों का गोदना बनाना थोटी महिलाओं का पारंपरिक व्यवसाय रहा है.

लेकिन बदलते समय के साथ इनसे ये रोजगार भी छिनता जा रहा है क्योंकि अब गोंड समुदाय में गोदना करवाने का चलन खत्म होता जा रहा है.

थोटी समुदाय की भाषा पर उनके निवास क्षेत्र का काफी प्रभाव है. तेलंगाना में रहने वाले थोटी लोग सामान्यतः तेलुगु और आसपास की स्थानीय भाषाओं/बोलियों से परिचित होते हैं. अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय गोंडी और अन्य आदिवासी भाषाई प्रभाव भी देखने को मिल सकते हैं. इसलिए थोटी समुदाय की भाषाई पहचान को केवल एक भाषा तक सीमित करना उचित नहीं होगा.

ऐतिहासिक रूप से थोटी जनजाति को राज गोंडों के एक उप-समूह या सेवा-वंश के तौर पर जाना जाता है.

थोटी समुदाय सहित छोटे आदिवासी समुदायों के सामने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आवास, सड़क संपर्क और आर्थिक अवसरों से जुड़ी चुनौतियां रही हैं. दूरदराज के आदिवासी क्षेत्रों में स्कूलों और उच्च शिक्षा तक पहुंच विशेष रूप से महत्वपूर्ण मुद्दा है. और यह थोटी समुदाय के लिए भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है,

आधुनिकता, बदलते सामाजिक ढांचे और आजीविका के पारंपरिक साधनों (जैसे गोदना और कथा गायन) में कमी आने के कारण यह समुदाय और इनकी मौखिक संस्कृति विलुप्ति के कगार पर है.

इसलिए आज समुदाय के विकास के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, बुनियादी सुविधाओं और सांस्कृतिक संरक्षण पर समान रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है.

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