HomeAdivasi Dailyझारखंड में हुए आदिवासी एकता महाजुटान के क्या मायने हैं

झारखंड में हुए आदिवासी एकता महाजुटान के क्या मायने हैं

यह जुटान इस चिंता पर केंद्रित था कि भविष्य में होने वाला परिसीमन झारखंड में अनुसूचित जनजातियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर असर डाल सकता है.

झारखंड में प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक लड़ाई तेज़ हो गई है. रांची के मोराबादी मैदान में कांग्रेस ने आदिवासियों को एकजुट करने के लिए एक बड़ी रैली की. जबकि मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाए गए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इसमें शामिल नहीं हुए.

हालांकि, सोरेन ने परिसीमन के विरोध में रैली की मुख्य मांग का समर्थन किया.

रविवार को रांची के मोराबादी मैदान में एक विशाल ‘आदिवासी एकता महाजुटान’ (आदिवासी एकता रैली) आयोजित की गई, जिसमें पूरे झारखंड से आदिवासी समुदाय के हज़ारों लोग शामिल हुए.

प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया एक बड़ी चिंता का विषय बन गया है क्योंकि आदिवासी नेताओं को डर है कि अगर भविष्य में सिर्फ़ आबादी के आधार पर परिसीमन किया गया, तो झारखंड में समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर बुरा असर पड़ सकता है.

आदिवासी सभा ने पांच अहम प्रस्ताव पास किए, जिनमें परिसीमन और माइंस एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) अमेंडमेंट एक्ट (MMDR) का विरोध शामिल है.

मुख्यमंत्री ने रैली का किया समर्थन

विधायक विकास मुंडा द्वारा पढ़े गए संदेश में, सीएम सोरेन ने आदिवासी समुदाय के साथ एकजुटता दिखाते हुए वादा किया कि वे किसी भी ऐसे कदम का विरोध करेंगे जिससे अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या कम हो सकती है.

मुख्यमंत्री ने 2007 की परिसीमन प्रक्रिया का भी ज़िक्र किया और कहा कि तब आदिवासी एकता ने उस प्रक्रिया को रोकने में मदद की थी. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि आदिवासियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की रक्षा के लिए फिर से वैसी ही एकता दिखाने की ज़रूरत होगी.

भले ही सोरेन मंच पर मौजूद नहीं थे लेकिन रैली में उनके संदेश ने एक साफ़ राजनीतिक संकेत दिया.

मुख्यमंत्री ने इस मांग का समर्थन किया कि परिसीमन के दौरान आदिवासियों का प्रतिनिधित्व कम नहीं होना चाहिए और आदिवासी समुदायों से एकजुट बने रहने की अपील की.

आदिवासी एकता महाजुटान

रविवार को झारखंड के अलग-अलग हिस्सों से हज़ारों आदिवासी ‘आदिवासी एकता महाजुटान’ के लिए इकट्ठा हुए. इस कार्यक्रम ने लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के प्रस्तावित परिसीमन (सीमाओं के पुनर्निर्धारण) के विरोध को आदिवासियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व, ज़मीन के अधिकारों, संवैधानिक सुरक्षा और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण जैसे बड़े मुद्दों से जोड़ दिया।

पूर्व मंत्री और कांग्रेस नेता बंधु तिर्की के नेतृत्व में आयोजित इस सभा में कई ज़िलों से आदिवासी पुरुष, महिलाएँ, युवा और बुज़ुर्ग शामिल हुए.

रैली में प्रस्तावित परिसीमन मुख्य मुद्दा था.

वक्ताओं ने तर्क दिया कि सिर्फ़ आबादी के आधार पर चुनाव क्षेत्रों का पुनर्गठन करने से अनुसूचित जनजातियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर बुरा असर पड़ सकता है.

उन्होंने मांग की कि झारखंड की खास जनसांख्यिकीय, भौगोलिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों पर भी ध्यान दिया जाए.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी, जो रैली में मौजूद नहीं थे, उन्होंने भी एक संदेश भेजा जिसे सभा में पढ़कर सुनाया गया.

उन्होंने आदिवासी समुदायों के साथ एकजुटता दिखाई और उनके अधिकारों, पहचान और सम्मान की रक्षा करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया.

 सभा में सांसद सुखदेव भगत ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी का लिखित संदेश पढ़कर सुनाया.

अपना समर्थन देते हुए राहुल ने आदिवासी नेता जयपाल सिंह मुंडा और संविधान सभा में आदिवासियों के अधिकारों के लिए उनकी भूमिका को याद किया.

उन्होंने आदिवासी ज़मीन, जंगलों और जल संसाधनों की सुरक्षा पर ज़ोर दिया और समुदाय की सहमति के बिना विकास के नाम पर विस्थापन का विरोध किया.

उन्होंने पाँचवीं अनुसूची, PESA (अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत विस्तार का प्रावधान) एक्ट और वन अधिकार एक्ट जैसी अहम सुरक्षा व्यवस्थाओं का भी ज़िक्र किया.

इस मौके पर झारखंड कांग्रेस अध्यक्ष केशव महतो कमलेश, राज्य प्रभारी के. राजू, रामेश्वर उरांव, मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की, सुबोध कांत सहाय, विधायक राजेश कच्छप, नमन विक्सल कोंगारी और भूषण बारा, तथा ऑल इंडिया आदिवासी कांग्रेस के अध्यक्ष विक्रांत भूरिया मौजूद थे.

के. राजू ने कहा कि कांग्रेस संसद में यह मुद्दा उठाएगी और दावा किया कि पार्टी ने तय किया है कि अगले 25 सालों तक झारखंड में परिसीमन नहीं होना चाहिए.

परिसीमन आदिवासियों के लिए चिंता का विषय क्यों बन गया है?

आयोजकों के लिए यह मुद्दा संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों की संख्या या सीमाओं से कहीं आगे का है.

उनका कहना है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व में किसी भी बदलाव के समय झारखंड के आदिवासी-बहुल इलाकों, पाँचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों, ऐतिहासिक विस्थापन और पलायन को ध्यान में रखा जाना चाहिए.

झारखंड में अभी विधानसभा की 81 सीटें हैं, जिनमें से 28 अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं. राज्य की 14 लोकसभा सीटों में से 5 एसटी उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं.

ये चिंताएं आंशिक रूप से परिसीमन के एक पुराने ड्राफ़्ट से जुड़ी हैं.

2007 में, एक प्रस्तावित व्यवस्था में विधानसभा सीटों की कुल संख्या तो 81 ही रखी गई थी, लेकिन ST-आरक्षित सीटों की संख्या 28 से घटाकर 22 कर दी गई थी. लोकसभा स्तर पर सीटों की कुल संख्या 14 ही रही, जबकि ST-आरक्षित सीटों की संख्या पाँच से घटाकर चार करने का प्रस्ताव था.

वह पुराना प्रस्ताव मौजूदा चुनावी व्यवस्था नहीं बन पाया, लेकिन भविष्य के परिसीमन का विरोध करते समय आदिवासी संगठन अब भी उसके प्रावधानों का ज़िक्र करते हैं.

शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि यह मुद्दा सिर्फ़ लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या का नहीं है बल्कि आदिवासी समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों का है.

इस मुहिम का समर्थन करने वाले आदिवासी संगठनों ने भी यही तर्क दिया कि चुनाव क्षेत्रों (constituencies) को तय करने का आधार सिर्फ़ आबादी नहीं होनी चाहिए.

यह तर्क झारखंड के आदिवासी नेताओं के एक वर्ग की उस पुरानी चिंता को दिखाता है कि आबादी में बदलाव, पलायन और विस्थापन से आदिवासी समुदायों का राजनीतिक महत्व बदल सकता है.

रैली का मकसद यह बताना था कि चुनावी सीमाओं को इन ऐतिहासिक और सामाजिक कारकों से अलग करके नहीं देखा जा सकता.

बंधु तिर्की ने राजनीतिक दांव-पेच को साफ़ तौर पर रखा. उन्होंने कहा, “आज हमें प्रस्तावित परिसीमन (delimitation) के ख़िलाफ़ लड़ने का संकल्प लेना होगा। यह राज्य आदिवासियों के लिए बनाया गया था, और हम आदिवासियों के अधिकार छीनने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं करेंगे.”

उन्होंने आगे कहा कि अगर 2007-08 की रिपोर्ट के आधार पर परिसीमन किया गया, तो हम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे.

साथ ही, उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी और आरएसएस आदिवासियों की सीटें कम करना चाहते हैं.

उन्होंने उन पर पांचवीं अनुसूची (Fifth Schedule) और PESA को कमज़ोर करने की कोशिश करने और धर्म के नाम पर समाज को बांटने का आरोप भी लगाया.

कांग्रेस सांसद सुखदेव भगत ने परिसीमन की बहस को माइनिंग, उद्योगों, बड़े प्रोजेक्ट्स और बांधों की वजह से होने वाले विस्थापन से जोड़ा.

उन्होंने कहा, “माइनिंग, उद्योगों की स्थापना, बड़े प्रोजेक्ट्स या बड़े बांधों के निर्माण के कारण आदिवासियों का सबसे ज़्यादा, यानी 70 प्रतिशत विस्थापन हुआ है. हमारी आबादी में 13 प्रतिशत की कमी आई है.”

ये आरोप राजनीतिक मंच से लगाए गए थे और ये परिसीमन के संभावित नतीजों के बारे में कांग्रेस और रैली के आयोजकों की समझ को दिखाते हैं.

पांच मुख्य मांगें

महाजुटान ने पांच मुख्य मांगें रखीं और परिसीमन (सीटों के बंटवारे में बदलाव) को आदिवासी अधिकारों के बड़े एजेंडे का हिस्सा बनाया.

. पहली मांग यह थी कि परिसीमन के कारण लोकसभा और राज्य विधानसभा में ST (अनुसूचित जनजाति) के लिए आरक्षित सीटों की संख्या कम नहीं होनी चाहिए. अगर कुल सीटों की संख्या बढ़ती है, तो ST के लिए आरक्षित सीटों की संख्या भी उसी अनुपात में बढ़नी चाहिए.

सभा ने यह भी मांग की कि चुनाव क्षेत्रों का नया नक्शा बनाते समय पांचवीं अनुसूची वाले इलाकों, आदिवासी-बहुल क्षेत्रों और ऐतिहासिक विस्थापन व पलायन जैसी बातों का ध्यान रखा जाए.

. दूसरी मांग ‘माइंस एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) अमेंडमेंट’ (खान और खनिज विकास एवं विनियमन संशोधन) ढांचे का विरोध करने के बारे में थी.

वक्ताओं ने तर्क दिया कि इन बदलावों से राज्यों की वित्तीय और विधायी शक्तियों तथा सहकारी संघवाद के सिद्धांत पर असर पड़ सकता है.

. तीसरी मांग आदिवासी ज़मीन से जुड़ी थी. सभा ने मांग की कि छोटानागपुर टेनेंसी और संथाल परगना टेनेंसी कानूनों का उल्लंघन करके आदिवासी ज़मीन के गैर-कानूनी हस्तांतरण, कब्ज़े और बिक्री पर रोक लगाई जाए.

साथ ही गैर-कानूनी तरीके से हस्तांतरित ज़मीन को उसके मूल रैयतों (ज़मीन के असली मालिकों) को वापस किया जाए.

. चौथी मांग यह थी कि पांचवीं अनुसूची वाले इलाकों में ग्राम सभा की सहमति के बिना खनन, ज़मीन अधिग्रहण और विस्थापन नहीं होना चाहिए.

रैली में PESA, 1996 और वन अधिकार अधिनियम, 2006 को प्रभावी ढंग से लागू करने की भी मांग की गई.

. पांचवीं मांग जनगणना में अलग ‘सरना धर्म कोड’ की लंबे समय से चली आ रही मांग थी, जिसमें आयोजकों ने आदिवासी समुदायों की धार्मिक पहचान को मान्यता देने के लिए एक अलग कॉलम की मांग की.

रैली में परिसीमन पर एक रिपोर्ट भी पेश की गई.

बंधु तिर्की ने वकील सुशीश सोरेन से रिपोर्ट सौंपने को कहा और बताया कि इसे कांग्रेस प्रभारी के. राजू के ज़रिए राहुल गांधी को भेजा जाएगा ताकि आदिवासी समुदायों की चिंताओं को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया जा सके.

केंद्र की परिसीमन योजना का क्या मतलब है

झारखंड में यह राजनीतिक बहस ऐसे समय में हो रही है जब लोकसभा सीटों के पुनर्निर्धारण पर संवैधानिक रोक के बाद पूरे देश में परिसीमन को लेकर चर्चा चल रही है.

केंद्र ने परिसीमन का एक नया ढांचा प्रस्तावित किया है, जिसमें इस प्रक्रिया को जनगणना और निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों से जोड़ा गया है.

केंद्र सरकार का कहना है कि इस कवायद का मकसद प्रतिनिधित्व में असंतुलन को दूर करना और साथ ही लोकसभा के आकार में बढ़ोतरी को समायोजित करना है.

सरकार ने राज्यों को यह भरोसा भी दिलाया है कि प्रस्तावित कवायद का 2029 तक होने वाले चुनावों पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

झारखंड समेत अलग-अलग राज्यों और एसटी-आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों पर इसका क्या असर होगा, यह अंतिम विधायी ढांचे, जनगणना के आंकड़ों और परिसीमन आयोग की सिफारिशों पर निर्भर करेगा.

यहीं पर राजनीतिक असहमति खास तौर पर अहम हो जाती है.

‘महाजुटान’ की चिंता यह है कि जनसंख्या-आधारित परिसीमन से झारखंड की आदिवासी आबादी का राजनीतिक महत्व कम हो सकता है और एसटी-आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या या संरचना में बदलाव हो सकता है.

सरकार का व्यापक तर्क यह है कि परिसीमन का मतलब सिर्फ़ मौजूदा सीटों का पुनर्वितरण नहीं है और बढ़ी हुई लोकसभा में ज़्यादा प्रतिनिधित्व को समायोजित किया जा सकता है.

हालांकि, झारखंड के आदिवासी संगठनों के लिए मुद्दा सिर्फ़ यह नहीं है कि सीटों की कुल संख्या बढ़ेगी या नहीं. वे ऐसी सुरक्षा चाहते हैं जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि विस्थापन, पलायन या अन्य ऐतिहासिक कारणों से होने वाले जनसांख्यिकीय बदलावों के कारण आदिवासी-बहुल क्षेत्रों और समुदायों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम न हो.

‘महाजुटान’ ने उन कई मुद्दों को एक साथ उठाया जिन्होंने पारंपरिक रूप से झारखंड की आदिवासी राजनीति को आकार दिया है. जैसे – CNT और SPT कानूनों के तहत ज़मीन की सुरक्षा, पांचवीं अनुसूची के तहत शासन, PESA, ग्राम सभा के अधिकार, खनन, विस्थापन, पलायन और आदिवासी धार्मिक पहचान.

बंधु तिर्की ने इस लामबंदी को झारखंड की पहचान बदलने की एक व्यापक कोशिश से जोड़ा.

उन्होंने घटती आदिवासी आबादी और पलायन पर भी चिंता जताई. जिसमें उन्होंने पहाड़िया समुदाय का उदाहरण दिया और आबादी में गिरावट को रोज़गार, विस्थापन और विकास नीतियों से जोड़ा.

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