महाराष्ट्र सरकार को आदिवासी इलाक़ों में कुपोषण से लड़ने के लिए योजना तैयार करने का आदेश

आदिवासी आबादी को मुख्यधारा की स्वास्थ्य सुविधाओं में शामिल करने की ज़रूरत है और सरकार को इसके लिए पहल कर उन्हें ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए.

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बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को 3 जनवरी, 2022 तक राज्य के आदिवासी-बहुल मेलघाट इलाक़े में कुपोषण से लड़ने के लिए एक शॉर्ट-टर्म प्लान तैयार करने का निर्देश दिया है.

कोर्ट ने सरकार से कहा है कि यह प्लान वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी छेरिंग दोरजे की व्यक्तिगत यात्रा के आधार पर तैयार किया जाए. दोरजे मेलघाट और दूसरे आदिवासी इलाक़ों के स्पेशल इंस्पेक्टर जनरल हैं.

दोरजे ने अपने दौरे के बाद एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की थी. उसमें उन्होंने कहा कि आदिवासी इलाक़े में लड़कियों की जल्दी शादी हो जाती है, और आदिवासी आमतौर पर आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं की तरफ़ शक़ की नज़र से देखते हैं. इन हालात में कुपोषण फैलता है, और इससे पार पाने के लिए एक अंतर-विभागीय मूल्यांकन की ज़रूरत है.

अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि आदिवासी आबादी को मुख्यधारा की स्वास्थ्य सुविधाओं में शामिल करने की ज़रूरत है और सरकार को इसके लिए पहल कर उन्हें ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए.

बॉम्बे हाई कोर्ट जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था

चीफ़ जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मकरंद एस कार्णिक की बेंच मेलघाट इलाक़े में बच्चों के बीच कुपोषण पर दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी. इन याचिकाओं में डॉ राजेंद्र बर्मा और कार्यकर्ता बंडू संपतराव साने द्वारा दायर जनहित याचिकाएं भी शामिल थीं, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उस इलाक़े के आदिवासियों की परेशानियों को कम करने की ओर ज़्यादा काम नहीं हुआ था.

इसी साल 4 अक्टूबर को हाई कोर्ट ने मेलघाट इलाक़े में कुपोषण से हो रही मौतों की स्टडी करने और रिपोर्ट करने के लिए दोरजे को अपना अधिकारी नियुक्त किया था.

सोमवार को अदालत में मौजूद दोरजे ने मेलघाट इलाक़े में आदिवासी आबादी के सामने आने वाली कठिनाइयों पर अपनी रिपोर्ट पेश की. अपनी रिपोर्ट में उन्होंने महाराष्ट्र के आदिवासी इलाक़ों में गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं और बच्चों के बीच कुपोषण के मुद्दे को संबोधित करने के लिए एक व्यापक कार्यक्रम का सुझाव दिया है.

दोरजे ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि विभागों के बीच समन्वय की ज़रूरत है, और यह भी जानना होगा कि स्थानीय लोग सहयोग क्यों नहीं कर रहे हैं. दोरजे ने कहा, “मेरा निष्कर्ष यह है कि इसमें न सिर्फ़ स्वास्थ्य विभाग बल्कि दूसरे विभागों को भी शामिल किया जाना चाहिए. यदि आदिवासी सहयोग नहीं कर रहे, तो इसके पीछे की वजहों का पता लगाने की जरूरत है. मेलघाट में, स्वास्थ्य प्रणाली आशा कार्यकर्ताओं पर ज़्यादा निर्भर है.”

“इन लोगों के रीति-रिवाज़, परंपराएं और मान्यताएं हो सकती हैं, लेकिन स्वास्थ्य की तरफ़ उनकी अनिच्छा को उचित नहीं ठहराया जा सकता, और उन्हें मुख्यधारा की स्वास्थ्य प्रणाली में शामिल होना होगा. राज्य को पता लगाना होगा कि क्या किया जा सकता है,” उन्होंने कहा.

राज्य सरकार के लिए महाधिवक्ता आशुतोष कुंभकोनी ने तब कहा कि दोरजे की रिपोर्ट उसके सभी विभागों के साथ साझा की जाएगी और समाधान निकाला जा सकता है।

बेंच ने राज्य सरकार को दोरजे की रिपोर्ट पर गौर करने और याचिकाकर्ताओं की दलीलों और रिपोर्ट के निष्कर्षों के आधार पर एक कार्य योजना तैयार करने का निर्देश दिया है. मामले की अगली सुनवाई 3 जनवरी को होगी.

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