कर्नाटक: आदिवासियों को नशे और कुपोषण से बाहर निकालने के रास्तों की खोज

परियोजना आदिवासी समुदायों के बीच कुपोषण और नशे की लत लगने के पीछे की वजहों को समझने में मदद करेगी. इससे इनमें हस्तक्षेप और आगे कार्रवाई के लिए उचित दिशा-निर्देशों को तैयार किया जा सकेगा.

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कर्नाटक के चामराजनगर जिले में आदिवासी स्वास्थ्य पर पांच साल लंबी एक शोध पहल शुरू की गई है.

आदिवासियों के स्वास्थ्य पर अपनी तरह का पहला प्रशिक्षण, अनुसंधान और नवाचार केंद्र (Centre for Training, Research and Innovation on Tribal Health – CTRITH) मैसूर में JSS मेडिकल कॉलेज और भारतीय जन स्वास्थ्य संस्थान (Indian Institute of Public Health) के साथ मिलकर सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थान, बेंगलुरु द्वारा शुरू किया गया है.

इस केंद्र में आदिवासी समुदायों के बीच आनुवंशिक रोगों (Genetic diseases) और खून से जुड़ी बीमारियों (hemoglobinopathies) पर अनुसंधान, नवाचार और प्रशिक्षण दिया जाएगा.

चामराजनगर की उपायुक्त चारुलता सोमल ने बुधवार को इस परियोजना का उद्घाटन किया. उन्होंने कहा कि बावजूद इसके कि सरकार द्वारा आदिवासियों में कुपोषण को मिटाने के कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, आदिवासी समुदायों के स्वास्थ्य को लेकर चिंता बनी हुई है.

उम्मीद है कि इस नई परियोजना से चामराजनगर और राज्य के बाकी आदिवासी समुदायों को फ़ायदा मिलेगा.

भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Bio Technology – डीबीटी) और वेलकम ट्रस्ट इंडिया एलायंस द्वारा इस परियोजना को समर्थन दिया जा रहा है.

परियोजना को स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग के साथ-साथ अनुसूचित जनजाति कल्याण विभाग, और सोलिगा आदिवासियों के एक संघ के सहयोग से लागू किया जाएगा.

इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ, बेंगलुरु के सहायक निदेशक डॉ. प्रशांत एन.एस. ने कहा कि परियोजना आदिवासी समुदायों के बीच कुपोषण और नशे की लत लगने के पीछे की वजहों को समझने में मदद करेगी. इससे इनमें हस्तक्षेप और आगे कार्रवाई के लिए उचित दिशा-निर्देशों को तैयार किया जा सकेगा.

इस शोध में कुपोषण से जुड़े मुद्दों के साथ-साथ आदिवासी समुदायों के बीच तंबाकू और शराब की लत का अध्ययन किया जाएगा.

कर्नाटक में क़रीब 42.5 लाख आदिवासी रहते हैं, जिनमें से 50 हज़ार के क़रीब पीवीटीजी हैं

कर्नाटक के आदिवासियों का स्वास्थ्य

सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों की कोशिशों के बावजूद, इलाक़े की इन जनजातियों के स्वास्थ्य की स्थिति का आकलन करना मुश्किल है, क्योंकि इन जनजातियों के स्वास्थ्य पर अब तक बहुत कम शोध हुआ है. इस स्थिति में इस पहल की अहमियत बहुत बढ़ जाती है.

कर्नाटक के आदिवासी इलाक़ों में सामुदायिक भागीदारी और जवाबदेही की कमी यहां के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की सबसे बड़ी मुश्किल है. इन इलाक़ों में डॉक्टरों की कमी है, और जो यहां नियुक्त किए जाते भी हैं, वो इन दुर्गम इलाक़ों में आने से कतराते हैं. इन आदिवासी इलाक़ों में गुणवत्तापूर्ण डॉक्टरों को लाना हमेशा से एक चुनौती रहा है.

नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) 3 के अनुसार पूरे देश की अनुसूचित जनजाति आबादी के बीच कम वजन, स्टंटिंग और वेस्टिंग की कुल प्रसार दर क्रमशः 54.5, 54 और 27.6 प्रतिशत बताई गई है. इसकी तुलना में, कर्नाटक में कम वजन, स्टंटिंग और वेस्टिंग की कुल प्रसार दर क्रमश: 33.3, 42.4 और 18.9 प्रतिशत थी.

इन आदिवासी समुदायों में संचारी और गैर-संचारी रोगों के प्रसार पर रिसर्च डाटा बेहद कम है. इसलिए सरकार के लिए इन स्वास्थ्य समस्याओं से निपटने के लिए रणनीति तैयार करना भी मुश्किल है.

लेकिन इन आदिवासियों में से अधिकांश समुदाय जो पश्चिमी घाट के जंगलों की मूल निवासी थीं, उन्हें अलग-अलग औषधीय पौधों और पारंपरिक / लोककथाओं के ज़रिए उन औषधियों के इस्तेमाल के बारे में जानकारी है.

कर्नाटक के आदिवासी

कर्नाटक में क़रीब 42.5 लाख आदिवासी रहते हैं, जिनमें से 50 हज़ार के क़रीब पीवीटीजी हैं. हालांकि आदिवासी राज्य की आबादी का सिर्फ़ 6.95 प्रतिशत हिस्सा हैं, लेकिन राज्य में 50 अलग-अलग जनजातियां रहती हैं. इनमें से दो पीवीटीजी समुदायों समेत 14 जनजातियां मुख्य रूप से इसी राज्य की मूल निवासी हैं.

राज्य के आदिवासी अत्यंत गरीबी और पीढ़ियों से उपेक्षा के चलते स्वास्थ्य और पोषण के मामले में बाकी जनता से काफ़ी पिछड़े हैं.

चामराजनगर ज़िले की बात करें तो यहां जेनु कुरुबा, कम्मारा, कनियन, और सोलिगा आदिवासी रहते हैं. इनमें जेनु कुरुबा की जनसंख्या सबसे ज़्यादा है, और सोलिगा आदिवासी, जिन्हें सोलेगा, शोलागा और शलागा भी कहा जाता है, दूसरे नंबर पर हैं.

सोलिगा आदिवासी दक्षिण कर्नाटक में बिलिगिरिरंगा पहाड़ियों और उससे जुड़ी पर्वतमालाओं में रहते हैं. यह कर्नाटक के चामराजनगर ज़िले और तमिलनाडु के ईरोड जिल में निवास करते हैं. इनकी आबादी लगभग 40,000 है.

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