कोकबोरोक – स्क्रिप्ट पर राजनीति, भाषा बचाने से ज़्यादा वर्चस्व की लड़ाई

पिछले क़रीब 40 सालों में लगभग एक दर्जन से ज़्यादा बार इस भाषा की लिपि को लेकर फ़ैसले बदले हैं. त्रिपुरा में लंबे समय तक सत्ता में रही वामपंथी मोर्चा की सरकार इस भाषा की बांग्ला लिपि के पक्ष में थी. लेकिन यहाँ के आदिवासी संगठन और राजनीतिक दल रोमन स्क्रिप्ट चाहते हैं.

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कोकबोरोक भाषा भारत के त्रिपुरा के अलावा बांग्लादेश के भी कुछ हिस्सों में बोली जाती है. कोक का मतलब होता है भाषा और बोरोक का मतलब होता है लोग. यानि लोगों की भाषा को कोकबोरोक कहा जाता है. इस भाषा को भारत की उन भाषाओं की सूचि में रखा गया है जो ख़तरे में हैं.

त्रिपुरा के आदिवासियों की ये सबसे बड़ी भाषा मानी जाती है. इस भाषा को बचाने के प्रयास लंबे समय से चल रहे हैं. इस सिलसिले में सबसे ज़रूरी काम हुआ है इस भाषा कि लिपी तैयार करना. लेकिन अफ़सोस की कोकबोरोक की लिपी एक बड़ा राजनीतिक मसला बन गया है. 

पिछले क़रीब 40 सालों में लगभग एक दर्जन से ज़्यादा बार इस भाषा की लिपि को लेकर फ़ैसले बदले हैं. त्रिपुरा में लंबे समय तक सत्ता में रही वामपंथी मोर्चा की सरकार इस भाषा की बांग्ला लिपि के पक्ष में थी. लेकिन यहाँ के आदिवासी संगठन और राजनीतिक दल रोमन स्क्रिप्ट चाहते हैं. 

अब राज्य में बीजेपी की सरकार है और कोकबोरोक के लिए देवनागरी स्क्रिप्ट की वकालत की जा रही है. इस भाषा की स्क्रिप्ट के मसले पर हो रही राजनीति का सबसे बड़ा ख़ामियाज़ा वो छात्र भुगत रहे हैं जो इस भाषा में पढ़ाई करते हैं.

इस भाषा की स्क्रिप्ट रोमन हो या बंगाली इस बहस में एक तर्क यह भी दिया जाता है कि कोकबोरोक भाषा के कुछ शब्दों का उच्चारण या उन्हें लिखना बांग्ला भाषा में संभव ही नहीं है. इसलिए इसकी स्क्रिप्ट रोमन ही हो सकती है. 

एक अध्यापक का अनुभव

बौधरेय देबबर्मा त्रिपुरा में एक रिटायर्ड टीचर हैं. उन्होंने इस भाषा की लिपि के बनने और बदलने को लगातार देखा है. वो कहते हैं कि 1979 में यह तय हुआ कि कोकबोरोक की स्क्रिप्ट बंगाली होगी. उसके बाद लिपि तैयार हुई और उसी में स्कूलों की पढ़ाई भी होती है.

अभी भी 12वीं कक्षा तक स्कूलों में कोकबोरोक के लिए बंगला लिपि का ही इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन कॉलेज और यूनिवर्सिटी में रोमन स्क्रिप्ट ही इस्तेमाल हो रही है. देबबर्मा कहते हैं कि जब कोकबोरोक की लिपि बांग्ला तय की गई थी तो यह कोई राजनीतिक फ़ैसला नहीं था. 

यह भाषा के उच्चारण और छात्रों की सुविधा दोनों को देख कर तैयार की गई थी. लेकिन रोमन स्क्रिप्ट की माँग पूरी तरह से राजनीतिक है. उनका कहना है कि अंग्रेज़ी भाषा में वो अक्षर ही नहीं हैं जो कोकबोरोक भाषा की अभिव्यक्ति कर सकें. 

वो कहते हैं कि यह छात्रों के साथ अन्याय है. इस भाषा में पढ़ने वाले छात्र स्कूल में बांग्ला लिपि पढ़ते हैं और कॉलेज में उन्हें रोमन में लिखना पड़ता है. रोमन लिपि उन पर थोप दी गई है. 

वो कहते हैं कि या तो इस आदिवासी भाषा की लिपि के लिए अंतर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला (International Phonetic Alphabet) का इस्तेमाल आदर्श है. उसके बाद अगर कोई भाषा इस भाषा के क़रीब आती है तो वो बांग्ला हो सकती है. 

बोरोक संगठन का क्या कहना है

एंटनी देबबर्मा, बोरोक पीपुल्स ह्यूमन राइटस ऑरगनाइजेशन के नेता हैं. एंटनी कहते है कि अब अगर बीजेपी देवनागरी को कोकबोरोक भाषा की लिपि पर थोपने की कोशिश करती है तो यह आदिवासी समुदायों के साथ अन्याय होगा.

वो कहते हैं कि किसी भाषा पर कोई लिपि राजनीतिक कारणों से थोपना आदिवासी समुदायों के अधिकारों का हनन है. एंटनी कहते हैं कि किसी आदिवासी भाषा की स्क्रिप्ट क्या होगी, यह तक करने का हक़ तो उस समुदाय को ही होना चाहिए.

एंटोनी देबबर्मा

हम समझते हैं कि हमारा समुदाय रोमन स्क्रिप्ट में ही अपनी भाषा का विकास देखता है. भाषा हमारी पहचान है, लेकिन त्रिपुरा में प्रवासी बंगालियों के दबाव में हमारी भाषा ख़तरे में पड़ गई है. हम यह बर्दाश्त नहीं कर सकते कि बंगला लिपि हम पर थोपी जाए.

त्रिपुरा में माणिक सरकार के शासन के दौरान पवित्र सरकार कमेटी का गठन किया गया था. इस कमेटी ने पाया कि त्रिपुरा के ज़्यादातर ट्राइबल समुदाय रोमन स्क्रिप्ट के पक्ष में हैं. वैज्ञानिक आधार पर भी यही माना जाता है कि रोमन स्क्रिप्ट हमारी भाषा की अभिव्यक्ति के लिए ठीक होगी.

छात्रों के लिए बेशक यह स्थिति बहुत ही ख़राब है. उनके लिए इस भाषा में पढ़ना बेहद मुश्किल हो रहा है क्योंकि भाषा कि कोई लिपि तय नहीं हो पा रही है. इस वजह से हमारे लोगों के विकास में भी मुश्किल हो रही है.

यह बड़ी अजीब और दुखदायी बात है कि हमें अपनी मातृभाषा के लिए कभी अंग्रजी तो कभी बांग्ला या फिर हिंदी की तरफ़ देखना पड़ रहा है. 

भाषा का विकास ज़रूरी है

सुनील कालाई, त्रिपुरा यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं. किसी भाषा की लिपि क्या होगी, यह उस भाषा के बोलने वालों पर छोड़ा जाना चाहिए. कोकबोरोक एक ऐसी भाषा है जिसे काफ़ी तादाद में लोग बोलते हैं लेकिन इसकी कोई स्क्रिप्ट नहीं है.

किसी लिपि को किसी भाषा पर थोपा जाना सही नहीं होगा. अब आप पूर्वोत्तर राज्यों के कई ट्राइबल समुदायों को ही देखें. उनकी भाषा की भी कोई स्क्रिप्ट नहीं थी. लेकिन उन्होंने रोमन स्क्रिप्ट को अपनाया है. इसे लोगों ने स्वीकार भी कर लिया है.

इसलिए मेरा मानना है कि जिन लोगों की भाषा है उन्हें ही यह अधिकार भी है कि वो किसी लिपि को अपनाना चाहते हैं. भाषा को किसी एक लिपि तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए. 

मुझे लगता है कि कोकबोरक भाषा के साहित्य को अगर देखें तो यह कई लिपियों में लिखा जा रहा है. कुछ लोग बांग्ला इस्तेमाल कर रहे हैं तो कुछ लोग रोमन स्क्रिप्ट का इस्तेमाल कर रहे हैं. मेरी नज़र में महत्वपूर्ण यह है कि कोकबोरोक भाषा में लिखा और पढ़ा जा रहा है. 

सुनील कलाई

हमें यह बात माननी पड़ेगी कि भाषा भी लगातार बदलती है. मेरे दादा जी या फिर मेरे पुरखे जो कोकबोरोक बोलते थे, वो शायद मेरी कोकबोरोक से अलग थी. समय के साथ साथ भाषा का विकास होता है और होना चाहिए.

मैं तो बस यही चाहुँगा कि इस विवाद में एक भाषा ना निपट जाए. क्योंकि यह भाषा ही तो हमारी पहचान है. 

कोकबोरक भाषा की रोमन स्क्रिप्ट पर ज़ोर देने का एक कारण बंगाली बनाम आदिवासी की पृष्ठभूमि भी हो सकती है. त्रिपुरा में बांग्लादेश से 1947 और 1971 में बड़ी तादाद में बंगाली लोग आ कर बस गए.

प्रवासी बंगालियों की तादाद के मुक़ाबले यहाँ के मूल निवासी या ट्राइबल ग्रुप अब अल्पमत में आ गए हैं. तो एक तरह से अपनी भाषा की बांग्ला स्क्रिप्ट के विरोध में बंगाली आबादी के वर्चस्व को अस्वीकार करने की भावना भी जुड़ी है.

आदिवासी भाषाओं के जानकार जीएन देवी (GN Devy) के हवाले से कहा गया है कि किसी आदिवासी भाषा की स्क्रिप्ट क्या होगी, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है. किसी भी लिपि में कोई भी आदिवासी भाषा लिखी जा सकती है.

दरअसल लिपि भाषा से जुड़ा फ़ैसला नहीं है बल्कि राजनीतिक वर्चस्व से जुड़ा फ़ैसला होता है.

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