HomeLaw & Rightsसिजिमाली में आदिवासी और पुलिस टकराव की पूरी कहानी क्या है?

सिजिमाली में आदिवासी और पुलिस टकराव की पूरी कहानी क्या है?

सिजिमाली में आदिवासी मरने या मारने को तैयार है. इसके पीछे कोई नया कारण नहीं है. एकबार फिर आदिवासी अपनी ज़मीन को बचाने और विस्थापन को टालने के लिए लड़ रहा है.

ओडिशा के रायगड़ा जिला के काशीपुर क्षेत्र में 7 अप्रैल को आदिवासी ग्रामीणों और पुलिस के बीच हुई हिंसक झड़प ने एक बार फिर खनन परियोजनाओं और आदिवासी अधिकारों के बीच गहरे टकराव को उजागर कर दिया. 

इस घटना में कम से कम 40 पुलिसकर्मी और 25 ग्रामीण घायल हो गए, जिससे इलाके में तनाव की स्थिति बनी हुई है.

इस पूरे विवाद की जड़ सिजिमाली बॉक्साइट खदान तक जाने वाली 3 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण है, जिसे प्रशासन खनन परियोजना के लिए आवश्यक बता रहा है. लेकिन स्थानीय आदिवासी समुदाय लंबे समय से इस परियोजना का विरोध कर रहा है. 

वर्ष 2023 में इस खदान को नीलामी के जरिए वेदांता लिमिटेड को सौंपे जाने के बाद से ही इलाके में असंतोष लगातार बढ़ता गया है.

सिजिमाली के ग्रामीणों का आरोप है कि 7 अप्रैल की तड़के करीब 3 बजे पुलिस ने गांव में छापेमारी की थी. 

उनका कहना है कि कार्रवाई से पहले गांव की बिजली काट दी गई और पुलिस ने घरों के दरवाजे तोड़कर अंदर प्रवेश किया. ग्रामीणों के अनुसार यह कार्रवाई उन लोगों को पकड़ने के लिए की गई जो सड़क निर्माण और खनन परियोजना का विरोध कर रहे थे. 

इस कार्रवाई के बाद गांव में तनाव फैल गया और विरोध प्रदर्शन हिंसक झड़प में बदल गया.

वहीं पुलिस का दावा है कि वे एक ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार करने गए थे जिसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी था. 

रायगड़ा की एसपी स्वाति एस कुमार के मुताबिक लगभग 250 ग्रामीणों ने पुलिस पर हमला किया और पत्थर, कुल्हाड़ी और तलवार जैसे हथियारों का इस्तेमाल किया. पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज किया, आंसू गैस के गोले छोड़े और छह प्लाटून बल तैनात किया गया.

इस घटना से पहले भी प्रशासन ने 3 अप्रैल को इलाके में निषेधाज्ञा लागू की थी, लेकिन इसके बावजूद ग्रामीणों का विरोध जारी रहा. ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें सड़क निर्माण या खनन परियोजना के बारे में सही तरीके से न तो जानकारी दी गई और न ही उनकी सहमति ली गई. 

प्रशासन का दावा है कि 8 दिसंबर 2023 को प्रभावित आठ गांवों में ग्राम सभाएं आयोजित की गई थीं और ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से परियोजना को मंजूरी दी थी, लेकिन ग्रामीण इन दावों को खारिज करते हुए कहते हैं कि ग्राम सभाएं फर्जी तरीके से कराई गईं और उनके हस्ताक्षर तक जाली बनाए गए.

आदिवासी समुदाय का कहना है कि यह परियोजना उनके जीवन और अस्तित्व पर सीधा हमला है. उनका मानना है कि खनन से उनके जंगल, जमीन और पारंपरिक आजीविका पर गंभीर असर पड़ेगा. 

सिजिमाली क्षेत्र पूर्वी घाट पर्वतमाला का हिस्सा है और यहां करीब 1500 हेक्टेयर में फैले लगभग 311 मिलियन टन उच्च गुणवत्ता वाले बॉक्साइट का भंडार मौजूद है. यह खदान लांजीगढ़ स्थित वेदांता के एल्यूमिना रिफाइनरी के पास है, जिसकी उत्पादन क्षमता 5 मिलियन टन प्रति वर्ष है. 

बॉक्साइट से एल्यूमिना और फिर एल्यूमिनियम बनाया जाता है, जिसका उपयोग रोजमर्रा की चीजों से लेकर बड़े औद्योगिक उत्पादों तक में होता है.

ओडिशा देश के खनिज संसाधनों का एक बड़ा केंद्र है और यहां भारत के कुल बॉक्साइट संसाधनों का लगभग 41 प्रतिशत हिस्सा मौजूद है. यही कारण है कि खनन परियोजनाओं को लेकर राज्य में लगातार दबाव बना रहता है. लेकिन इसके साथ ही आदिवासी इलाकों में विरोध भी उतना ही मजबूत है.

इससे पहले वेदांता लिमिटेड को नियमगिरि पहाड़ में भी कड़े विरोध का सामना करना पड़ा था, जहां डोंगरिया कोंध जनजाति ने खनन परियोजना का विरोध किया था. 

वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि खनन के लिए ग्राम सभाओं की अनुमति जरूरी होगी. इसके बाद सभी 12 ग्राम सभाओं ने सर्वसम्मति से खनन परियोजना को खारिज कर दिया था, जिससे वेदांता की योजना को बड़ा झटका लगा था.

रायगड़ा की ताजा घटना यह दिखाती है कि विकास और संसाधनों के दोहन की योजनाएं जब स्थानीय समुदायों की सहमति और विश्वास के बिना आगे बढ़ाई जाती हैं, तो वे टकराव का रूप ले लेती हैं. यह संघर्ष केवल एक सड़क या खदान का नहीं, बल्कि आदिवासियों के अधिकार, उनकी जमीन और उनकी पहचान की रक्षा का सवाल बन चुका है.

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