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पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाकों में बीजेपी की भारी जीत के क्या कारण हो सकते हैं?

राज्य की सभी अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए आरक्षित 16 सीटों पर भाजपा ने शत-प्रतिशत जीत दर्ज की है.

पश्चिम बंगाल की राजनीति में ऐतिहासिक उलटफेर में आदिवासी इलाके भी शामिल हुए हैं.  पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाकों में ममता बनर्जी का वर्चस्व पूरी तरह से ध्वस्त हो गया है.  

राज्य की सभी अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए आरक्षित 16 सीटों पर भाजपा ने शत-प्रतिशत जीत दर्ज की है.

आदिवासी इलाकों में ममता बनर्जी की हार और बीजेपी की जीत के कई कारण बताए जा रहे हैं. 

फ़र्ज़ी आदिवासी

देश के कई राज्यों के आदिवासी इलाकों में यह शिकायत सुनी जाती है कि आरक्षण का लाभ और ज़मीन हथियाने के लिए कई ग़ैर आदिवासी लोग फ़र्जी अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र बनवा लेते हैं. 

पश्चिम बंगाल के संदर्भ में यह बताया जाता है कि 2011 की जनगणना में आदिवासियों की संख्या लगभग 52 लाख थी. लेकिन ताज़ा प्रशासनिक आंकड़ों में यह जनसंख्या 80 लाख के करीब पहुँच गई. 

आदिवासी समुदायों, विशेषकर बांकुरा और पश्चिम मेदिनीपुर के युवाओं में यह डर घर कर गया कि ‘फर्जी जाति प्रमाण पत्र’ जारी कर उनकी पहचान और हक को कमजोर किया जा रहा है.

शायद यह एक कारण रहा जिसने आदिवासियों को तृणमूल कांग्रेस से दूर कर दिया. इसका सीधा-सीधा फ़ायदा बीजेपी को मिला.

विकास की कमी

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने कई कल्याणकारी योजनाएं (welfare schemes) लागू की थीं. लेकिन इसके बावजूद आदिवासी क्षेत्रों में तृणमूल एक भी सीट नहीं जीत पाई है. इसका कारण शायद यह रहा कि आदिवासी परिवारों को कुछ नकद पैसा तो मिला लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में आदिवासियों के लिए कोई ख़ास काम नहीं हुआ.

बल्कि इस क्षेत्र में हालात और ख़राब हुए. आदिवासी हॉस्टलों की संख्या 1,000 से घटकर 300 रह गई. 

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का अपमान

मार्च में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के प्रोटोकॉल से जुड़ा विवाद को भी आदिवासी इलाकों में ममता बनर्जी से नाराज़गी का एक कारण समझा जा सकता है. हांलाकि इस निर्णय पर पहुंचने के कोई ठोस तथ्य नहीं हैं.  

राष्ट्रपति के दौरे के स्थान में बदलाव और राज्य सरकार के उच्च प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति को द्रोपदी मुर्मू ने अपना अपमान बताया था. राष्ट्रपति मुर्मू को एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर जाना जाता है जो हल्की बात नहीं करती हैं. ऐसा हो सकता है कि उनकी नाराज़गी को आदिवासियों ने अपनी अस्मिता से जोड़ कर देखा हो. 

बेशक यह कारण आदिवासी इलाकों में ममता बनर्जी की हार से सीधे सीधे ना जोड़ा सके लेकिन यह कई कारणों में से एक हो सकता है.

2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में, राज्य की कुल 16 अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षित सीटों पर मुकाबला काफी दिलचस्प रहा था। उस समय के परिणाम इस प्रकार थे:

  • तृणमूल कांग्रेस (TMC): 16 में से 9 सीटें जीती थीं.
  • भारतीय जनता पार्टी (BJP): 16 में से 7 सीटें जीती थीं.

2021 में आदिवासियों के अलग सरना धर्म कोड और राज्य की वेलफेयर योजनाओं ने पलड़ा तृणमूल के पक्ष में झुका दिया था.

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