केंद्र सरकार का 81,000 करोड़ का ‘ग्रेट निकोबार समग्र विकास परियोजना’ मंजूरी के बाद से ही विवादों में है. अब एक बार फिर यह परियोजना सवालों के घेरे में आ गई है.
दरअसल, हाल ही लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी अंडमान-निकोबार के तीन दिवसीय दौरे पर गए थे और ग्रेट निकोबार परियोजना को “सबसे बड़ा घोटाला” और “देश के प्राकृतिक और आदिवासी विरासत के खिलाफ सबसे बड़ा अपराध” बताया.
इसके बाद से इस प्रोजेक्ट को लेकर विवाद बढ़ गया है. बढ़ते विवाद के बीच केंद्र सरकार ने शुक्रवार को विस्तृत फैक्टशीट जारी करते हुए साफ किया कि यह परियोजना भारत के लिए रणनीतिक, रक्षा और आर्थिक रूप से बेहद अहम है.
सरकार ने कहा कि विकास, पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी समुदायों के हित के बीच संतुलन बनाते हुए इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाया जा रहा है.
सरकार ने यह भी दावा किया कि इस द्वीप पर रहने वाले निकोबारी और शोम्पेन समुदायों को विस्थापित नहीं किया जाएगा और इन समुदायों के ‘पुनर्स्थापन’ (relocation) का कोई प्रस्ताव नहीं है.
सरकार की फैक्टशीट में राहुल गांधी के आरोपों के खिलाफ इस प्रोजेक्ट का सीधे तौर पर बचाव तो नहीं किया गया. लेकिन यह बात रेखांकित करने की कोशिश की गई कि इस प्रोजेक्ट को एक विस्तृत प्रक्रिया के बाद पहले ही पर्यावरणीय मंज़ूरी मिल चुकी है और इसमें पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी 42 विशिष्ट शर्तें शामिल हैं.
सरकार के मुताबिक, यह परियोजना द्वीप की रणनीतिक स्थिति का उपयोग करते हुए भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, समुद्री और रक्षा उपस्थिति को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में मजबूत करेगी. साथ ही इसमें पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी कल्याण के उपाय भी शामिल हैं.
इस मेगा प्रोजेक्ट के तहत एक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एक इंटीग्रेटेड टाउनशिप, सिविल और मिलिट्री इस्तेमाल के लिए एक एयरपोर्ट, और 450-MVA का गैस और सोलर पावर-आधारित प्लांट बनाया जाएगा। इसके लिए कुल 166.10 वर्ग किलोमीटर ज़मीन की ज़रूरत होगी, जिसमें 35.35 वर्ग किलोमीटर रेवेन्यू ज़मीन और 130.75 वर्ग किलोमीटर वन भूमि शामिल है; इसमें उष्णकटिबंधीय सदाबहार और अर्ध-सदाबहार जंगलों में दस लाख पेड़ों की कटाई भी शामिल है।
सरकार की तरफ़ से जारी बयान में कहा गया है कि इस (प्रोजेक्ट) क्षेत्र में पेड़ों की अनुमानित संख्या 18.65 लाख है. हालांकि 49.86 वर्ग किलोमीटर के वन क्षेत्र में ज़्यादा से ज़्यादा 7.11 लाख पेड़ों की कटाई होने की उम्मीद है.
सरकार ने कहा, “पेड़ों की कटाई चरणबद्ध तरीके से की जाएगी, जो मुख्य प्रोजेक्ट्स के प्रस्तावित चरण-वार विकास के अनुरूप होगी. अहम बात यह है कि 65.99 वर्ग किलोमीटर ज़मीन को ग्रीन ज़ोन के तौर पर सुरक्षित रखा जाएगा, जहां पेड़ों की कोई कटाई नहीं होगी, जिससे पारिस्थितिक संतुलन बना रहेगा.”
सरकार ने बताया कि इस क्षेत्र में लगभग 18.65 लाख पेड़ हैं, जिनमें से करीब 7.11 लाख पेड़ों को चरणबद्ध तरीके से काटा जा सकता है. साथ ही 65.99 वर्ग किमी क्षेत्र को “ग्रीन ज़ोन” के रूप में संरक्षित रखा जाएगा, जहां पेड़ नहीं काटे जाएंगे.
आदिवासी क्षेत्रों को लेकर सरकार ने कहा कि परियोजना क्षेत्र का एक हिस्सा ट्राइबल रिजर्व से जुड़ा है. लेकिन इसके बदले अधिक भूमि को फिर से ट्राइबल रिजर्व घोषित किया जाएगा, जिससे कुल मिलाकर रिजर्व क्षेत्र में वृद्धि होगी.
हालांकि, निकोबारी समुदाय ने कई बार केंद्र और अनुसूचित जनजाति आयोग को पत्र लिखकर बताया है कि उन्होंने ट्राइबल रिजर्व को हटाने (denotification) के लिए दी गई अपनी सहमति वापस ले ली है.
जनजातीय परिषद ने यह भी आरोप लगाया कि प्रशासन ने उनसे उनकी पारंपरिक जमीन के अधिकार छोड़ने के लिए “सरेंडर सर्टिफिकेट” पर हस्ताक्षर करने को कहा. साथ ही, उन्होंने यह शिकायत भी की कि उनके वन अधिकार कानून के तहत अधिकार अभी तक मान्यता नहीं पाए हैं.
‘लाखों पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलने का निशान लगा है‘: राहुल गांधी
इससे पहले, राहुल गांधी ने अपने दौरे के दौरान कहा था कि इस परियोजना के तहत “लाखों पेड़ों को काटा जाएगा” और यह विकास नहीं बल्कि “विकास के नाम पर विनाश” है.
राहुल गांधी ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की तीन दिन की यात्रा पर थे और तीसरे दिन, 28 अप्रैल को उन्होंने ग्रेट निकोबार द्वीप का दौरा किया, और वहां के मूल निवासी निकोबारी समुदाय के नेताओं और पूर्व सैनिकों के समुदाय से जुड़े बसने वालों से बातचीत की.
द्वीप पर जंगलों का दौरा करने के बाद, गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में कहा कि “लाखों पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलने का निशान लगा है.”
उन्होंने आगे कहा, “यह विकास नहीं है. यह विकास की भाषा में छिपा हुआ विनाश है. इसलिए मैं साफ-साफ कहूंगा और मैं कहता रहूंगा कि ग्रेट निकोबार में जो किया जा रहा है, वह हमारे जीवनकाल में इस देश की प्राकृतिक और आदिवासी विरासत के खिलाफ सबसे बड़े घोटालों और सबसे गंभीर अपराधों में से एक है. इसे रोका जाना चाहिए और इसे रोका जा सकता है – अगर भारतीय वह देखना चाहें जो मैंने देखा है.”
आदिवासी कल्याण के बारे में, सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया कि इस प्रोजेक्ट को “बहुत सोच-समझकर डिज़ाइन किया गया है” ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि निकोबारी और शोम्पेन जनजातियों को विस्थापित न होना पड़े.
‘1972 से ही 11.032 वर्ग किमी ज़मीन राजस्व भूमि के तौर पर इस्तेमाल हो रही है’
सरकार ने दावा किया, “विकास प्रोजेक्ट्स के लिए प्रस्तावित 166.10 वर्ग किमी ज़मीन में से, 84.10 वर्ग किमी ज़मीन आदिवासी रिज़र्व के दायरे में आती है. हालांकि, इस हिस्से में से 11.032 वर्ग किमी ज़मीन 1972 से ही राजस्व भूमि के तौर पर तय और इस्तेमाल की जा रही है. नतीजतन, बाकी बची 73.07 वर्ग किलोमीटर ज़मीन को प्रोजेक्ट के मकसद से आदिवासी रिज़र्व के दायरे से बाहर किया जा रहा है. इसकी भरपाई के लिए, 76.98 वर्ग किलोमीटर ज़मीन को फिर से ट्राइबल रिज़र्व के तौर पर अधिसूचित किया जा रहा है, जिससे ट्राइबल रिज़र्व में कुल 3.912 वर्ग किलोमीटर ज़मीन का इज़ाफ़ा होगा.”
हालांकि, निकोबारी समुदाय ने केंद्र सरकार और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को कई बार पत्र लिखकर यह बताया है कि उन्होंने आदिवासी रिज़र्व को डी-नोटिफ़ाई करने के लिए दिया गया अपना ‘अनापत्ति प्रमाण पत्र’ (NOC) वापस ले लिया है.
2004 की सुनामी में निकोबारी समुदाय को जान-माल का भारी नुकसान हुआ था और उन्होंने अंडमान और निकोबार द्वीप प्रशासन से बार-बार यह मांग की है कि उन्हें उनके पुश्तैनी गांवों में वापस बसाया जाए.
सुनामी के बाद उन्हें पूर्वी तट की ओर स्थित राजीव नगर और न्यू चिंगेनह की बस्तियों में बसाया गया था.
जनवरी में, ग्रेट निकोबार द्वीप की आदिवासी परिषद ने यह आरोप लगाया था कि निकोबार ज़िला प्रशासन के अधिकारियों ने उनसे ‘समर्पण प्रमाण पत्र’ पर हस्ताक्षर करने को कहा था, जिसके तहत वे अपनी पुश्तैनी ज़मीन पर अपने दावों को छोड़ रहे थे.
पिछले साल, इस समुदाय ने जनजातीय मामलों के मंत्रालय को पत्र लिखकर यह आरोप लगाया था कि ‘वन अधिकार अधिनियम’ के तहत उनके अधिकारों का निपटारा अभी तक नहीं किया गया है और न ही उनके अधिकारों को मान्यता देने की प्रक्रिया अभी तक शुरू हुई है.

