HomeLaw & Rightsग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट की सुनवाई रुकवाने में सरकार नाकाम हुई

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट की सुनवाई रुकवाने में सरकार नाकाम हुई

अदालत ने कहा कि यदि वनाधिकार क़ानून के उल्लंघन के गंभीर आरोप लगाए गए हैं, तो उनकी न्यायिक समीक्षा आवश्यक है. यह केवल तकनीकी प्रक्रिया का मामला नहीं बल्कि संविधान द्वारा संरक्षित समुदायों के अधिकारों से जुड़ा विषय है.

कोलकाता हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को बड़ा झटका देते हुए उन प्रारंभिक आपत्तियों को खारिज कर दिया है, जिनके ज़रिए सरकार एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका को शुरुआती स्तर पर ही रुकवाना चाहती थी. 

यह मामला लगभग ₹92,000 करोड़ की एक विशाल परियोजना से जुड़ा है, जिस पर आरोप है कि इसके लिए मंज़ूरी लेते समय आदिवासियों और वनवासियों के अधिकारों की रक्षा करने वाले वनाधिकार क़ानून (Forest Rights Act, 2006) का पालन नहीं किया गया.

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि परियोजना क्षेत्र में रहने वाले वनवासी समुदायों की ग्राम सभाओं से वैधानिक सहमति नहीं ली गई और न ही उनके पारंपरिक अधिकारों का समुचित निर्धारण किया गया.

अब हाई कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इस मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिकाओं पर सुनवाई होगी और सरकार केवल तकनीकी आपत्तियों के आधार पर इससे बच नहीं सकती.

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद उस बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर/औद्योगिक परियोजना को लेकर है जिसकी अनुमानित लागत ₹92,000 करोड़ बताई जा रही है. 

इस परियोजना के लिए बड़े पैमाने पर वन भूमि के उपयोग की आवश्यकता है. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत प्रभावित ग्राम सभाओं की अनुमति लेना अनिवार्य था, लेकिन इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया.

वनाधिकार क़ानून का उद्देश्य आदिवासियों और अन्य पारंपरिक वन निवासियों के ऐतिहासिक अधिकारों को मान्यता देना है. इस क़ानून के तहत जंगल, ज़मीन और संसाधनों पर समुदायों के अधिकार सुनिश्चित किए गए हैं. किसी भी परियोजना के लिए वन भूमि हस्तांतरण से पहले ग्राम सभा की सहमति एक अहम शर्त मानी जाती है.

शोम्पेन जनजाति पर मंडरा रहा खतरा

इस परियोजना को लेकर सबसे बड़ी चिंता ग्रेट निकोबार में रहने वाली अत्यंत संवेदनशील आदिम जनजाति शोम्पेन (Shompen) को लेकर है. शोम्पेन समुदाय भारत की Particularly Vulnerable Tribal Groups (PVTGs) में शामिल है. इनकी आबादी बहुत कम है और ये मुख्य रूप से जंगलों पर निर्भर जीवन जीते हैं.

शोम्पेन समुदाय बाहरी दुनिया से बहुत सीमित संपर्क रखता है. उनकी संस्कृति, भाषा और जीवनशैली सदियों से जंगल और प्रकृति के साथ गहराई से जुड़ी रही है. विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियाँ, सड़कें, बंदरगाह और बाहरी आबादी का बढ़ना इस समुदाय के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा बन सकता है.

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि जंगलों का विनाश होता है और पारंपरिक इलाक़ों में दखल बढ़ता है, तो शोम्पेन समुदाय विस्थापन, बीमारियों और सांस्कृतिक विनाश जैसी समस्याओं का सामना कर सकता है.

अदालत ने क्या कहा?

केंद्र सरकार की ओर से अदालत में प्रारंभिक आपत्तियाँ उठाई गई थीं. सरकार का तर्क था कि याचिकाएँ सुनवाई योग्य नहीं हैं या फिर इस मामले में अदालत को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए. लेकिन कोलकाता हाई कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया.

अदालत ने कहा कि यदि वनाधिकार क़ानून के उल्लंघन के गंभीर आरोप लगाए गए हैं, तो उनकी न्यायिक समीक्षा आवश्यक है. यह केवल तकनीकी प्रक्रिया का मामला नहीं बल्कि संविधान द्वारा संरक्षित समुदायों के अधिकारों से जुड़ा विषय है.

इस आदेश के बाद अब मामले की विस्तृत सुनवाई का रास्ता साफ़ हो गया है. हाईकोर्ट की बेंच ने इस मामले में अंतिम सुनवाई के लिए 23 जून 2026 की तारीख तय की है.

मीना गुप्ता कौन है

 केंद्र सरकार ने जिन याचिकाओं पर आपत्ति उठाई है वे पूर्व आईएएस अधिकारी मीना गुप्ता की याचिकाएं  हैं. केंद्र सरकार के अनुसार मीना गुप्ता को यह अधिकार ही नहीं है कि वे इस मामले में याचिकाकर्ता बनें. 

सरकार ने दलील दी है कि मीना गुप्ता निकोबार प्रोजेक्ट के स्थान की निवासी ही नहीं हैं. सरकार ने कोर्ट में जिरह करते हुए कहा कि मीना गुप्ता ग्रेट निकोबार के आदिवासियों का प्रतिनिधित्व नहीं करती हैं. 

सरकार की तरफ़ से सॉलिसिटर जनरल अशोक कुमार चक्रबर्ती ने तर्क रखते हुए कहा कि ग्रेट निकोबार के आदिवासियों ने मीना गुप्ता को इस मामले में अधिकृत नहीं किया है. 

मीना गुप्ता पर्यावरण और आदिवासी मामलों के मंत्रालयों में सचिव रह चुकी हैं.

लेकिन कोर्ट ने सरकार की इस दलील को ख़ारिज कर दिया है. 

वनाधिकार कानून क्यों महत्वपूर्ण है?

2006 में लागू हुआ Forest Rights Act लंबे संघर्षों के बाद अस्तित्व में आया था. यह कानून उन ऐतिहासिक अन्यायों को सुधारने का प्रयास था, जिनका सामना सदियों से वनवासी समुदाय करते रहे हैं.

इस कानून के तहत.

  • वन भूमि पर व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकार मान्यता प्राप्त कर सकते हैं.
  • ग्राम सभा को निर्णय प्रक्रिया में केंद्रीय भूमिका दी गई है.
  • जंगल आधारित आजीविका और सांस्कृतिक अधिकारों की सुरक्षा की गई है.

लेकिन जमीनी स्तर पर अक्सर आरोप लगते रहे हैं कि बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए इन प्रक्रियाओं को जल्दबाज़ी में पूरा किया जाता है या कई बार पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है.

आगे क्या?

अब इस मामले में विस्तृत सुनवाई होगी. अदालत यह जांच सकती है.

  • क्या प्रभावित ग्राम सभाओं की वास्तविक सहमति ली गई थी?
  • क्या वनाधिकार कानून की प्रक्रिया का पालन हुआ?
  • क्या पर्यावरण और सामाजिक प्रभावों का उचित आकलन किया गया?

इस मामले का असर केवल एक परियोजना तक सीमित नहीं रहेगा. अदालत का अंतिम फैसला भविष्य में आने वाली बड़ी परियोजनाओं और आदिवासी अधिकारों के बीच संतुलन तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.

विकास और पर्यावरण के बीच संघर्ष नया नहीं है, लेकिन सवाल वही है. क्या विकास बिना आदिवासियों की आवाज़ सुने आगे बढ़ सकता है?

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