ओडिशा में आदिवासी फंड का ग़बन – बीजेपी एसटी मोर्चा

अनुसूचित जनजाति मोर्चा के राज्य महासचिव रबी नाइक ने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और आदिवासी विकास निधि के गबन का आरोप लगाते हुए कहा कि केंद्र ने पिछले चार सालों में विभिन्न योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए 47,229 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं. लेकिन राज्य सरकार ने सिर्फ 552 करोड़ रुपये के उपयोगिता प्रमाण पत्र जमा किए हैं.

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भारतीय जनता पार्टी (BJP) एसटी मोर्चा रविवार को ओडिशा की आदिवासी आबादी के विशाल बहुमत की उपेक्षा के लिए बीजद (BJD) सरकार पर निशाना साधा है. बीजेपी अनुसूचित जनजाति मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद गोंड ने यहां मीडियाकर्मियों को बताया कि नीति आयोग द्वारा प्रकाशित हालिया राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) 2021 की रिपोर्ट ने बीजद सरकार का पर्दाफाश किया है जो लगातार पांचवीं बार सत्ता में है.

रिपोर्ट का हवाला देते हुए नित्यानंद गोंड ने कहा कि यह शर्म की बात है कि नबरंगपुर में 59.32 फीसदी, मलकानगिरी में 58.71 फीसदी, कोरापुट में 51.14 फीसदी, रायगढ़ में 48.14 फीसदी, कालाहांडी में 47.28 फीसदी, मयूरभंज में 44.9 फीसदी, कंधमाल में 44.75 फीसदी और खनिज समृद्ध क्योंझर में 41.78 फीसदी आदिवासी आबादी केंद्र द्वारा उनके कल्याण के लिए निर्धारित भारी धनराशि के बावजूद अभी भी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं.

नित्यानंद गोंड ने कहा, “जब राज्य की आबादी का लगभग एक तिहाई (1.10 करोड़) आदिवासी हैं, उनमें से 50 फीसदी गरीबी से जूझ रहे हैं. यह स्पष्ट रूप से सरकार की उदासीनता को प्रदर्शित करता है और साबित करता है कि सरकारी कार्यक्रमों का अपेक्षित लाभ उन तक नहीं पहुंच रहा है.”

अनुसूचित जनजाति मोर्चा के राज्य महासचिव रबी नाइक ने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और आदिवासी विकास निधि के गबन का आरोप लगाते हुए कहा कि केंद्र ने पिछले चार सालों में विभिन्न योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए 47,229 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं. लेकिन राज्य सरकार ने सिर्फ 552 करोड़ रुपये के उपयोगिता प्रमाण पत्र जमा किए हैं.

इसी तरह राज्य को पिछले तीन वर्षों में आदिवासियों के लिए बनाई गई अन्य योजनाओं के तहत केंद्र से 42,864 करोड़ रुपये मिले. जबकि लंबित उपयोगिता प्रमाण पत्र 7,096 करोड़ रुपये के हैं.

रबी नाइक ने कहा, “हम राज्य सरकार से यह बताने का आग्रह करते हैं कि इन निधियों का उपयोग कहां किया गया था और परिणाम क्या थे. अगर सरकार चुप रही तो हमें आंदोलन का सहारा लेने के लिए मजबूर होना पड़ेगा.”

बीजद पर एफआरए के तहत सबसे अधिक भूमि अधिकारों के वितरण पर स्व-प्रचार में लिप्त होने का आरोप लगाते हुए, उन्होंने कहा कि आदिवासियों को सौंपे गए अधिकारों का रिकॉर्ड किसी काम का नहीं है क्योंकि बैंक भूमि को ऋण के लिए संपार्श्विक के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर रहे हैं.

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