आदिवासी नायक और किसान सामूहिक स्मृति से ग़ायब रहे – द्रोपदी मुर्मू

राष्ट्रपति बनने के बाद आज पहली बार द्रोपदी मूर्मु ने देश को संबोधित किया. स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर देश के नाम संदेश में उन्होंने आदिवासी नायकों के सामूहिक स्मृति से ग़ायब रहने की बात कही. लेकिन आदिवासियों वर्तमान संघर्ष और शोषण को ख़त्म करने के लिए उनके भाषण में कुछ नहीं था.

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भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति ने आज पहली बार देश को संबोधित किया है. स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर देश को संबोधित करते हुए उन्होंने देश की आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लेने वाले स्वतंत्रता सेनानियों श्रद्धांजलि दी. उन्होंने कहा कि भारत की आज़ादी कि लड़ाई में अनेक वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी.

अपने भाषण में उन्होंने कहा कि भारत की आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लेने वाले और अपनी जान की बाज़ी लगाने वाले नायकों में बड़ी संख्या में आदिवासी और किसान शामिल थे. लेकिन एक लंबे समय तक सामूहिक स्मृति से ये नायक ग़ायब रहे.

राष्ट्रपति ने अपने भाषण में 15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस घोषित किये जाने की प्रशंसा की है. उनका कहना था कि स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने वाले आदिवासी नायकों को याद करने के लिए उठाया गया यह कदम सराहनीय है.

15 नवंबर बिरसा मुंडा की जयंती होती है और सरकार ने इस दिन को आदिवासी नायकों को सम्मान देने के लिए जनजातीय गौरव दिवस के रूप मनाये जाने की घोषणा की है. 

द्रोपदी मुर्मु ने स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम संबोधन में वर्तमान सरकार की उपलब्धियों का विस्तार से ज़िक्र किया है. उन्होंने डिजिटल इंडिया के बारे में बात करते हुए सरकार के प्रयासों की तारीफ़ की है.

इसके अलावा कोविड महामारी के दौरान जिस तरह से भारत ने वैक्सीन का निर्माण किया उसके लिए उन्होंने वैज्ञानिकों, डॉक्टरों और नर्सों की तारीफ़ की है. उन्होंने कहा कि भारत ने कोविड से निपटने में जो क्षमता दिखाई है वह कई विकसित देशों से भी बेहतर रही है.

राष्ट्रपति जब देश को संबोधित करती हैं तो वह सरकार की नीतियों को ही पेश करती हैं. यह एक स्थापित परंपरा है और उसी को द्रोपदी मुर्मू ने निभाया भी है. लेकिन वो देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति बनी हैं. यह एक ऐतिहासिक पल था जब एक आदिवासी राष्ट्रपति पद से देश के नाम संदेश दे रही थीं.

इस संबोधन में जैसे आदिवासी नायकों को भुलाए जाने का उन्होंने ज़िक्र किया, उसी तरह से आदिवासियों के वर्तमान संघर्ष का ज़िक्र भी आता तो बेहतर होता. कोविड के दौरान डिजिटल भारत का हिस्सा ना होने के कारण आदिवासी इलाक़ों में छात्रों को पढ़ाई का बड़ा नुक़सान उठाना पड़ा है.

राष्ट्रपति बेशक इसके लिए सरकार की आलोचना नहीं करतीं. लेकिन कम से कम एक चुनौती के तौर पर इसे अपने संदेश में शामिल कर सकती थीं. इसी तरह से उनके जल, जंगल और ज़मीन के मसले का ज़िक्र भी उनके भाषण में होता तो बेहतर होता.

यह द्रोपदी मुर्मू का राष्ट्रपति बनने के बाद पहला ही भाषण है. अभी कई मौक़े आएँगे जब वो देश को संबोधित करेंगी. उम्मीद है कि वो अपने अनुभव के आधार पर आने वाले दिनों में आदिवासी समुदाय के मुद्दों को अपने भाषण में शामिल भी करेंगी.

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