धनबाद की आदिवासी बस्तियों के पास धधकी आग, ख़तरे में हैं 184 परिवार

दरअसल जिस जगह पर आग भड़की पहले में वहाँ अंडरग्राउण्ड माइंस चलती थी. साल 2013 में यहां एक हादसा हुआ था. उस हादसे में मैनेजर समेत 3 मजदूरों की मौत हो गई थी. हादसे के बाद डीजीएमएस ने माइंस को असुरक्षित बताकर बंद करा दिया था.

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झारखंड के धनबाद में बीसीसीएल सीवी एरिया के सीपैच दहीबाड़ी आउटसोर्सिंग के नजदीक शुक्रवार को कोयला खदान में अचानक आग भड़क उठी. देखते ही देखते आग की लपटें आसमान छूने लगीं. आग का विक्राल रूप देखकर आस-पड़ोस के लोग खौफ में थे. स्थानीय लोगों में बीसीसीएल के प्रति आक्रोश देखा गया. लोगों ने बीसीसीएल पर जान-बूझकर जान जोखिम में डालने का आरोप लगाया.

खदान में आग लगने से नाराज़ लोगों ने मौके पर पहुंचे बीसीसीएल के अधिकारियों के सामने प्रदर्शन भी किया. इन ग्रामीणों को अपने आशियाने की चिंता सता रही है.

यह घटना झारखंड के धनबाद जिले के निरसा क्षेत्र में हुई है, जहां भारत कोकिंग कोल लिमिटेड BCCL की बासंती माता-दहीबाड़ी कोलियरी में जमीन के नीचे सालों से सुलग रही आग जमीन की सतह में धधक उठी है. आग की लपटों के कारण बचाव और राहत कार्य चलाना भी मुश्किल है.

फिलहाल लोग ने घर छोड़कर कोलियरी के सामने डेरा डाल लिया है.  ज्यादातर परिवारों ने अपनी गाय, बकरी, मुर्गी सब खोल कर छोड़ दिए हैं. लोगों को डर लग रहा है कि अभी तक बेकाबू यह आग कभी भी पूरे मुंडा धौड़ा को लील सकती है.

दरअसल जिस जगह पर आग भड़की पहले में वहाँ अंडरग्राउण्ड माइंस चलती थी. साल 2013 में यहां एक हादसा हुआ था. उस हादसे में मैनेजर समेत 3 मजदूरों की मौत हो गई थी. हादसे के बाद डीजीएमएस ने माइंस को असुरक्षित बताकर बंद करा दिया था. 

लेकिन वक्त बीतने के बाद बीसीसीएल ने फिर से उस जगह पर आउटसोर्सिंग के माध्यम से ओपन कास्ट माइंस की शुरुआत की है.

BCCL  देश की एकमात्र कंपनी है जो देश को कोकिंग कोयला देती है. फिर भी कोकिंग कोल की जरूरत पूरा करने के लिए कोयले का इम्पोर्ट करना पड़ता है.

क्या है पूरा मामला?

दरअसल BCCL के झरिया, कतरास जैसे इलाकों में भयावह आग का तांडव है लेकिन निरसा इलाके में पहली बार आग इस तरह धधक उठी है.

यह इलाका लोक उपक्रम कोल इंडिया की सब्सिडरी BCCL के चांच-विक्टोरिया क्षेत्र में पड़ता है. तकरीबन 32 वर्ग किलोमीटर में फैले इस इलाके में पहले बेंगल कोल, वीरभूम कोल, विक्टोरिया आदि के नाम पर कोयले की खदानें चलती थीं. निजी खान मालिकों के स्लॉटर माइनिंग के कारण भूधसान और आग का खतरा उत्पन्न हो गया है.

इस इलाके में तीन मिलियन टन से अधिक कोयला आग की चपेट में है. साल 1972 को कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण के समय यह इलाका BCCL के अधीन आया. पब्लिक सेक्टर बनने के बाद दहीबाड़ी के इस पैच पर भूमिगत खदान चलाया गया. सुशील इंक्लाइन नाम पर यह माइंस चल रही थी.

बासंतीमाता-दहीबाड़ी सी-पैच में फैली आग से कम से कम 183 परिवार प्रभावित हो रहे हैं. इनमें मुंडा धौड़ा के बगल में ही आग धधक रही है. मुंडा और मांझी के 11 परिवार यहां कच्चा शेड बनाकर रहते हैं. 

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