कोंडारेड्डी आदिवासियों की कुप्रथा पर रोक लगाने के लिए ईविल हाउस बना गेस्ट हाउस

यह गेस्ट हाउस एक प्रगतिशील पहल है जिसका उद्देश्य इस जनजाति की सदियों पुरानी 'ईविल हाउस' की प्रथा पर रोक लगाना है.

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विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) कोंडारेड्डी आदिवासियों के 44 घरों के समूह को एकीकृत जनजातीय विकास एजेंसी (ITDA-चिंतूर) द्वारा निर्मित एक अनूठा गेस्ट हाउस मिला है.

यह गेस्ट हाउस एक प्रगतिशील पहल है जिसका उद्देश्य इस जनजाति की सदियों पुरानी ‘ईविल हाउस’ की प्रथा पर रोक लगाना है.प्रथा के अनुसार, कुनावरम मंडल के तेकुलोद्दी गांव के हर घर में एक छोटी सी झोपड़ी है.

झोपड़ी को ‘ईविल हाउस’ कहा जाता है जिसमें परिवार की महिलाओं को माहवारी के दौरान अनिवार्य रूप से रहना पड़ता है. बच्चे को जन्म देने के बाद भी 45 दिनों तक महिलाओं को इन्हीं झोपड़ियों में रखा जाता है.

कोंडा रेड्डी आदिवासियों का मानना ​​है कि माहवारी और प्रसव के बाद महिलाओं को परिवार के साथ रहने की अनुमति देने से बुरी ताकतें आकर्षित होंगी.

दिसंबर 2020 में, द हिंदू अखबार ने इस कुप्रथा पर एक लेख प्रकाशित किया. इसके बाद, पूर्वी गोदावरी एजेंसी इलाके में आंध्र प्रदेश-तेलंगाना सीमा पर बसे कोंडारेड्डी आदिवासियों बस्तियों में इस प्रथा को मिटाने के लिए ITDA-चिंतूर के अधिकारी हरकत में आए.

ITDA-चिंतूर परियोजना अधिकारी ए वेंकट रमणा ने पिछले हफ्ते शुक्रवार को यहां गेस्ट हाउस का उद्घाटन किया. उन्होंने कहा कि कोंडारेड्डी आदिवासी इस गेस्ट हाउस का इस्तेमाल करेंगे, तो उन्हें इस प्रथा को पीछे छोड़ने में मदद मिलेगी.

गेस्ट हाउस में स्वच्छता और सुरक्षा का खास ध्यान रखा गया है. इसमें तीन-बिस्तर की सुविधा वाले दो भाग हैं.

“तीन बिस्तर माहवारी वाली महिलाओं के लिए हैं. बाकि तीन बिस्तर प्रसवोत्तर अवधि में महिलाओं के लिए हैं. हम आदिवासी लोगों को उनकी इस प्रथा पर रोक लगाने और उनके बेहतर स्वास्थ्य के लिए नए गेस्ट हाउस का इस्तेमाल करने के फायदों के बारे में बता रहे हैं,” रमणा ने कहा.

स्थानीय पंचायत को गेस्ट हाउस के रखरखाव का काम सौंपा गया है, और स्वास्थ्य कर्मचारी भी अक्सर इसका दौरा करेंगे. गेस्ट हाउस का नाम इसी समूह की दिव्या के नाम पर रखा गया है, जिनका पिछले साल तेकुलोद्दी गांव में निधन हो गया था.

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