केरल में फर्जीवाड़े से आदिवासियों की ज़मीन हड़पी गई: रिपोर्ट

अट्टापदी में भू-माफियाओं द्वारा भूमि हड़पने की चौंकाने वाली घटनाएं हैं. अगर इस पर रोक नहीं लगाई गई तो राज्य के आदिवासी गढ़ अट्टापदी की हाशिए पर रहने वाली आदिवासी आबादी के नरसंहार में तब्दील हो जाएगी.

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आदिवासियों जैसे गरीब और हाशिए के वर्गों को कानूनी सहायता देने वाली एक सामाजिक संस्था जननीति ने पाया है कि केरल के अट्टपाड़ी में आदिवासी आबादी का जबरन विस्थापन हो रहा है. इस एनजीओ का दावा है कि इस इलाके में भू-माफियाओं ने बड़े स्तर पर फर्जीवाड़ा किया है. ज़िले के राजस्व और पंजीकरण विभागों की मिलीभगत से फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल करके आदिवासी भूमि के बड़े क्षेत्रों पर कब्जा किया जा रहा है.

जननीति के अध्यक्ष एन पद्मनाभन की अध्यक्षता में चार सदस्यीय आयोग ने कहा कि 8 अगस्त, 2021 की सुबह शोलयूर सीआई टीके विनोद कृष्णा के नेतृत्व में एक पुलिस टीम ने जबरन आदिवासी बस्तियों में प्रवेश किया. 

इसके बाद वट्टलुक्की आदिवासी बस्प्रती के मुख चोरिया मूप्पन और उनके बेटे को गिरफ्तार कर लिया. चोरिया मूप्पन और उनका बेटा राज्य के एक पूर्व मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाले ट्रस्ट को सरकार द्वारा आवंटित 55 एकड़ में निर्माण शुरू करने के क़दम का विरोध कर रहा था.

आयोग ने पाया कि ज़मीन मूल रूप से आदिवासियों की थी. रिपोर्ट में कहा गया है, “गिरफ्तारी फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल करके आदिवासी भूमि को हड़पने के लिए, आधिकारिक-भू-माफिया गठजोड़ के खिलाफ़ आदिवासियों के संघर्ष को दबाने के लिए थी.”

अट्टपाड़ी में भू-माफियाओं द्वारा भूमि हड़पने की चौंकाने वाली घटनाएं हैं. अगर इस पर रोक नहीं लगाई गई तो राज्य का आदिवासी गढ़ अट्टपाड़ी हाशिए पर रहने वाली आदिवासी आबादी के नरसंहार में तब्दील हो जाएगी.

रिपोर्ट में इस मुद्दे पर सरकार, न्यायपालिका, आम जनता, लोकतांत्रिक संस्थानों आदि से तत्काल ध्यान देने की मांग की गई है. रिपोर्ट में राज्य सरकार से शोलयूर सीआई को निलंबित करने का भी आग्रह किया गया है, जिन्होंने आदिवासी प्रमुख और उनके बेटे को सुबह-सुबह उनके गांव से गिरफ्तार करने में पुलिस के साथ मिलकर ज्यादती की.

रिपोर्ट में “उन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की भी मांग की गई जिन्होंने आदिवासी परिवारों को बसाने के लिए बनाई गई अट्टपाड़ी को-ऑपरेटिव फार्मिंग सोसाइटी (ACFS) से संबंधित 2,000 एकड़ जमीन देने की कोशिश की थी.”

रिपोर्ट ने पिछले 25 सालों के दौरान अट्टपाड़ी में आदिवासी और सरकारी भूमि के अलगाव को प्रकाश में लाने के लिए अट्टपाड़ी में ज़मीन के सभी लेनदेन की जांच की मांग की गई है.

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