सरकारी धन का दुरुपयोग करने वाले आदिवासी विस्तार अधिकारी के वेतन से होगी वसूली

अदालत ने आदेश दिया कि तत्कालीन आदिवासी विस्तार अधिकारी मैथ्यू जॉर्ज के वेतन से 12 महीनों तक हर महीने समान किश्तों में इस रक़म की वसूली की जाए. यह पैसा शिकायतकर्ता बैंक को दिया जाना चाहिए.

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केरल लोकायुक्त की एक डिविज़न बेंच ने एक आदिवासी विस्तार अधिकारी के वेतन से 77,740 रुपये की वसूली का आदेश दिया है. इस अधिकारी पर आरोप है कि ने राज्य की राजधानी तिरुवनंतपुरम के नन्नियोड, पालोड में 115 आदिवासी परिवारों को राशन का सामान बांटने के लिए सरकारी धन का दुरुपयोग किया था.

लोकायुक्त जस्टिस सिरिएक जोसेफ और उप लोकायुक्त न्यायमूर्ति हारुन-उल-रशीद की बेंच ने पाया कि शिकायत करने वाली इकाई, पालोड सेवा सहकारी बैंक को 27 नवंबर, 2007 से 9% की ब्याज दर पर 77,740 रुपये वसूलने का हक है. अधिकारी पर भुगतान करने की तारीख़ तक 9% के हिसाब से ब्याज़ लगाया जाएगा.

अदालत ने आदेश दिया कि तत्कालीन आदिवासी विस्तार अधिकारी मैथ्यू जॉर्ज के वेतन से 12 महीनों तक हर महीने समान किश्तों में इस रक़म की वसूली की जाए. यह पैसा शिकायत करने वाले बैंक को दिया जाना चाहिए.

आदिवासी विकास विभाग के तहत आने वाले नन्नियोड के आदिवासी विस्तार कार्यालय से मुफ्त चावल, हरा चना और नारियल का तेल बांटने की योजना के संबंध में मैथ्यू जॉर्ज ने धोखाधड़ी की थी.

राशन का सामान पालोड सेवा सहकारी बैंक द्वारा चलाई जा रही स्टोर से बांटी जानी थी. आदिवासी विकास विभाग ने इस योजना के लिए आदिवासी विस्तार अधिकारी मौथूय जॉर्ज को 1,15,240 रुपये एडवांस के तौर पर दिए थे. लेकिन जॉर्ज ने बैंक के स्टोर से क्रेडिट पर राशन का सामान बांटने को कहा.

जॉर्ज के कहने पर बैंक स्टोर ने इलाक़े के 115 आदिवासी परिवारों को 77,740 रुपये का राशन बांटा. लेकिन उसके द्वारा ख़र्च की गई इस रक़म का भुगतान बैंक को नहीं किया गया था. लंबे समय तक भुगतान न होने पर बैंक ने लोकायुक्त से संपर्क किया, और उनके सामने एक मामला दायर किया. उन्होंने लोकायुक्त से मांग की कि योजना के लिए बैंक द्वारा खर्च की गई रक़म का भुगतान किया जाए.

मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने कहा कि आदिवासी विस्तार अधिकारी, जो एक सरकारी कर्मचारी है, शिकायत करने वाले बैंक को इस पूरी रक़म का भुगतान करने के लिए बाध्य हैं. लोकायुक्त ने यह भी कहा कि अधिकारी ने अपनी ड्यूटी की अवहेलना की है, जिससे शिकायतकर्ताओं के साथ अन्याय हुआ है. इसके अलावा शिकायत करने वाले बैंक को ग़ैरज़रूरी मुश्किल का भी सामना करना पड़ा, जो इस अधिकारी के कुप्रशासन का परिणाम है.

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