महाराष्ट्र: ‘गिरवी’ रखे कातकरी बच्चों में से कई 8-10 साल से गायब हैं

इगतपुरी तालुका में घोटी-सिन्नार रोड पर उभाडे गांव में कातकरी समाज के 138 आदिवासी रहते हैं. यहां कुल 26 परिवार झोपड़ियों में रह रहे हैं. आदिवासी कल्याण के लिए सरकार द्वारा घोषित कई योजनाओं के बावजूद ये समुदाय बिना किसी मदद के अत्यधिक गरीबी में जी रहा है. इस बस्ती में रहने वाले आदिवासियों का आरोप है कि कई बार सरकार की ओर से उन्हें राशन भी नहीं मिलता है.

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महाराष्ट्र (Maharashtra) के नासिक से हैरान कर देने वाला मामला सामने आ रहा है. नासिक के इगतपुरी तालुका (Igatpuri taluka) के उभाडे गांव के 8 आदिवासी बच्चे लापता हो गए हैं. कातकरी समाज समुदाय (Katkari Samaj community) के गरीब माता-पिता ने पैसों के लिए इन बच्चों को अहमदनगर में बंधुआ मजदूर के तौर पर काम करने के लिए गिरवी रखा था. इन बच्चों को भेड़ चराने वाले अपने साथ ले जाते हैं.

मां-बाप के कहने पर दलाल इन बच्चों को भेड़ और बकरी मालिकों तक पहुंचाते हैं. इसके बदले में बच्चों के घरवालों को कुछ पैसे और दलालों को कमीशन मिलता है.

हाल ही में 10 साल की एक बच्ची गौरी अगिवले (Gauri Agivle) की मौत ने इस मामले पर सुर्खियां बटोरीं. जिसके चलते अब तक 11 आदिवासी बच्चों को छुड़ा लिया गया, जिन्हें उनके मां-बाप ने गिरवी रखा था. अभी भी 8 बच्चों की तलाशी जारी है.

अहमदनगर में स्थानीय पुलिस के साथ राजस्व और आदिवासी विकास विभागों के शीर्ष अधिकारी लापता बच्चों की तलाश कर रहे हैं और स्थानीय चरवाहा समुदाय के साथ कई दौर की बैठकें कीं.

सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि यह एक बड़ा रैकेट है जिसमें बिचौलिए इगतपुरी के बहुत गरीब आदिवासी परिवारों से मिलते हैं और उन्हें अपने बच्चों को गिरवी रखने के लिए मनाते हैं. कुछ बच्चे तो पांच साल की उम्र के हैं.

इगतपुरी तालुका में घोटी-सिन्नार रोड पर उभाडे गांव में कातकरी समाज के 138 आदिवासी रहते हैं. यहां कुल 26 परिवार झोपड़ियों में रह रहे हैं. आदिवासी कल्याण के लिए सरकार द्वारा घोषित कई योजनाओं के बावजूद ये समुदाय बिना किसी मदद के अत्यधिक गरीबी में जी रहा है. इस बस्ती में रहने वाले आदिवासियों का आरोप है कि कई बार सरकार की ओर से उन्हें राशन भी नहीं मिलता है.

महाराष्ट्र में आदिवासियों के अधिकारों के लिए काम करने वाले एक गैर सरकारी संगठन श्रमजीवी संगठन (Shramjeevi Sanghatana) के विवेक पंडित ने MBB से बात करते हुआ कहा, “इन आदिवासियों को अभी तक भी जीने के लिए ज़रूरी मूलभूत सुविधाएं तक नहीं मिली हैं. ये आदिवासी बेहद ख़राब हालातों में जीते हैं. इसलिए इस तरह से बच्चों को गिरवी रखने के मामले सामन आते हैं.”

उन्होंने बताया कि शुरूआतें में उन्हें बच्चों से बात करने का मौका मिलता है, जब बिचौलिए दूसरे परिवारों को समझाने के लिए उनके इलाके में जाते हैं. लेकिन यह धीरे-धीरे बंद हो जाता है और माता-पिता अपने बच्चों के बारे में बिना किसी जानकारी के रह जाते हैं.”

गौरी की मौत के बाद एक बिचौलिया कांतिलाल करांडे, जो अक्सर गांव आता-जाता था, फिलहाल पुलिस हिरासत में है.

असहाय आदिवासी

आदिवासियों ने बताया कि उनके कुछ बच्चे कई सालों से लापता हैं. इलाके की मुखिया पाकुलाबाई वाघ ने कहा, “हम पिछले 40 साल से यहां रह रहे हैं. करांडे हमें बताते थे कि अगर बच्चे यहां रहते हैं, तो वे व्यस्त सड़क पर दुर्घटना में मर सकते हैं या डरना बांध में डूब सकते हैं. इसलिए हमने सोचा कि बेहतर होगा कि हम अपने बच्चों को भेड़-बकरियों के फार्म में काम करने के लिए भेज दें.”

पाकुलाबाई वाघ ने अपने दो बेटों- राजू और करण को कई साल पहले अहमदनगर ज़िले के संगमनेर तालुका के डोंगर गांव भेज दिया था.

आदिवासी नेता विवेक पंडित के हस्तक्षेप के बाद बच्चों को बचाया गया. विवेक गौरी की मृत्यु के बाद महाराष्ट्र में आदिवासियों और गैर सरकारी संगठनों के लिए योजनाओं की स्थिति को देखने के लिए सरकार द्वारा नियुक्त समिति के अध्यक्ष भी हैं.

जनजाति की स्थिति पर बोलते हुए, विवेक पंडित ने MBB से कहा , “इन आदिवासियों के पास आधार कार्ड या राशन कार्ड जैसे दस्तावेज़ भी नहीं मिलते हैं. यही कारण है कि बिचौलिए उन्हें अपने बच्चों को मामूली रकम और एक साल में एक दो मवेशियों का वादा कर अपने बच्चों को गिरवी रखने के लिए मना लेते हैं.”

कैसी होगी बच्चों की हालत

40 वर्षीय सुनीता देवीदास मुकने ने लगभग सात साल पहले अपने दो बेटों- धोंडू और पांडु, साथ ही बेटी लक्ष्मी को भेड़ फार्म में काम करने के लिए भेजा था. सुनीता ने कहा, “मेरे बच्चे अब तक 11 से 15 साल के हो गए होंगे. तब से मैंने उन्हें एक बार भी नहीं देखा. जब मैं करंडे से पूछती हूं, तो वह कहता है कि वे ठीक काम कर रहे हैं. लेकिन मुझे नहीं पता कि वे कैसे और कहां हैं.”

हालांकि, मुकाने ने अपने बच्चों को भेड़ फार्म में काम करने के लिए अपनी मर्जी से भेजा था. लेकिन 55 वर्षीय वसंत बाबूराव पवार के लिए ऐसा नहीं था. पवार ने कहा कि उनके दो बेटों को गांव से उठा लिया गया था जब वो वहां नहीं थे.

पवार ने कहा, “करंडे मेरे बेटों- 8 साल के गोकुल और 11 साल के तुकाराम को डोंगर ले गया. मेरा बड़ा बेटा भागने में कामयाब रहा, लेकिन मुझे अभी तक छोटा बेटा नहीं मिला है.”

वहीं 26 साल की पिंती वाघ ने कहा, “मेरा भाई आकाश 7 साल का था जब करांडे उसे ले गया था. कई साल हो गए हैं और हमें कुछ पता नहीं है कि वो कहां है.”

‘काम करो, गाली खाओ’

गौरी अगिवले की मौत के बाद से बचाए गए 11 बच्चों में से अधिकांश को रिमांड होम भेज दिया गया है. उनमें से सिर्फ तीन- सुदाम सीताराम भोईर, सुदाम वसंत वाघ और उनकी बहन जानकी वाघ फिलहाल गांव में अपने परिवारों के साथ रहते हैं, क्योंकि उनकी स्वास्थ्य स्थिति बेहद खराब थी और अधिकारियों ने उन्हें लेने से मना कर दिया था.

15 साल के सुदाम ने कहा, “मुझे रामदास लवहाटे द्वारा अहमदनगर के पारनेर तालुका में सकुर मांडवा ले जाया गया था. वहां हमें रोज सुबह 5 बजे उठना पड़ता था और दोपहर 12 बजे के आसपास हमें पहला भोजन दिया जाता था. मुझे भेड़ के मल को साफ करने, पानी लाने और परिसर को साफ रखने के लिए कहा गया था.”

सुदाम ने कहा, “मुझे भेड़ों के झुंड को हर रोज खेत में ले जाना पड़ता था और शाम को लौटना होता था. फिर, मुझे दो भाकरी और सब्जी दी जाती थी. कड़ी मेहनत के बावजूद, नियोक्ता, रमा पोकले, हमेशा मेरे साथ मारपीट करता था.”

9 साल की जानकी ने कहा, “हम हमेशा काम करते रहते थे. अगर भेड़ें किसी और के खेत में घुस जातीं तो जमींदार मेरे साथ मारपीट करता. और फिर, जब मैं वापस लौटती तो मेरा नियोक्ता मुझे उसी गलती के लिए फिर गाली देता था.”

उस अनुभव का आतंक अभी भी जानकी के भाई पर भारी है, जिसने बात करने से इनकार कर दिया.

इस बीच, बचाए गए बच्चों को रिमांड होम ले जाने के बारे में बताते हुए, आदिवासी नेता विवेक पंडित ने कहा, “ये बच्चे अनाथ नहीं हैं. उन्होंने कोई अपराध नहीं किया है. तो उन्हें रिमांड होम में क्यों रखा गया है? उन्हें कातकरी समाज के लिए समर्पित शाहपुर स्थित आश्रमशाला में रखा जाना चाहिए था. मैंने मुख्यमंत्री को उन्हें आश्रमशाला में भर्ती करने के लिए पत्र लिखा है.”

संगमनेर के तीन आरोपियों के खिलाफ गौरी की मौत के बाद पहली प्राथमिकी दर्ज की गई थी. बाद में, पुलिस ने अलग-अलग लापता बच्चों के मामलों को जोड़ा और 7 सितंबर को दो प्राथमिकी दर्ज की.

संगमनेर पुलिस से जुड़े एक अधिकारी ने कहा, “हमने उन पर बंधुआ श्रम प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 की धारा 16 (बंधुआ मजदूरी का प्रवर्तन), 17 (बंधुआ कर्ज को आगे बढ़ाना) और 18 (बंधुआ मजदूरी प्रणाली के तहत बंधुआ मजदूरी निकालना) के तहत मामला दर्ज किया है.”

अहमदनगर से पुलिस की एक टीम भी गौरी के माता-पिता से बात करने के लिए बुधवार को उभाडे पहुंची. जांच अधिकारी राहुल मदने ने कहा, “हमारी जांच चल रही है. कुल तीन प्राथमिकी दर्ज की गई हैं और सात लोगों- विकास कुदनार, उनकी पत्नी सुमन, संगमनेर से प्रकाश पुनेकर, और पार्कर तालुका से कांतिलाल करांडे, रामदास लवाटे, हरि भाऊ खताल और बबन पोकाले को गिरफ्तार किया गया है.”

प्रशासन की ज़िम्मेदारी और लापरवाही

MBB से बात करते हुए विवेक पंडित ने बताया कि इस मसले पर मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे से उनकी मुलाक़ात हुई है. इस मुलाक़ात में मुख्यमंत्री ने इस आदिवासी समुदाय के लिए एक नीति बनाने का फ़ैसला किया है.

विवेक पंडित ने कहा, “प्रशासन ने हाल ही में एक कातकरी लड़की की मौत के बाद अच्छी भूमिका निभाई है. लेकिन अगर यह आदिवासी समुदाय इस हालत में है कि बच्चे गिरवी रखता है, तो फिर उसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा. प्रशासन को कम से कम इनके मनरेगा के जॉब कार्ड तो बनाने ही चाहिएँ. लेकिन सच तो यह है कि प्रशासन के रिकॉर्ड में तो यह आदिवासी समुदाय है ही नहीं.”

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