ओडिशा सरकार की योजना- 2024 तक सभी योग्य आदिवासियों को FRA के तहत जमीन का मालिकाना हक देंगे

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आदिवासी समुदाय को सशक्त बनाने के अपने उद्देश्य से ओडिशा सरकार 2024 तक राज्य के जमीन के सभी सही दावेदार आदिवासी लोगों को वन अधिकार अधिनियम के तहत व्यक्तिगत और सामुदायिक वन भूमि का हक देने की योजना बना रही है.

एसटी और एससी विकास सचिव रंजन चोपड़ा ने कहा कि 2024 तक जमीन का मालिकाना हक देने के मिशन पर काम चल रहा था. अब  जल्दी ही इस मिशन को शुरू किया जाएगा, जिसके तहत आदिवासी लोगों को हर तरह के वन अधिकार होंगे, चाहे वह व्यक्तिगत या समुदायिक हो.

रंजन चोपड़ा ने आदिवासी विकास पर राष्ट्रीय चर्चा (National consultation tribal development) में कहा, “सभी आदिवासियों को उनका सही स्वामित्व दिया जाएगा. मिशन अभी वित्त, योजना और अभिसरण विभाग द्वारा जांच के अधीन है. मुझे लगता है कि हम जल्द ही इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम को शुरू करने में सक्षम होंगे. 2024 तक, हम एफआरए के तहत राज्य सरकार को दी गई जिम्मेदारी को प्राप्त करने में सक्षम होंगे.”

उन्होंने कहा कि यह सुनिश्चित करने के लिए कि मिशन अपने लक्ष्य को प्राप्त करे, राज्य ने एफआरए कार्यान्वयन के लिए एक समर्पित परियोजना प्रबंधन इकाई स्थापित की है. उन्होंने कहा,”हम न सिर्फ अपने आदिवासी समुदायों के साथ न्याय करना चाहते हैं बल्कि एक डिजिटल रिकॉर्ड बनाने की भी कोशिश कर रहे हैं ताकि भविष्य में भूमि का यह स्वामित्व खो न जाए.”

वन अधिकार अधिनियम के मुताबिक, एक अनुसूचित जनजाति का सदस्य जो 2005 से वन भूमि के एक टुकड़े में रह रहा है और उसका इस्तेमाल कर रहा है लेकिन उसके पास उस पर औपचारिक कानूनी अधिकार नहीं है, वह भूमि के स्वामित्व का हकदार है. गैर-आदिवासी समुदाय, जिन्हें अन्य पारंपरिक वनवासी के रूप में जाना जाता है, भी इन अधिकारों का लाभ उठा सकते हैं लेकिन उन्हें इस बात का प्रमाण देना होगा कि वे तीन पीढ़ियों से वन भूमि पर निवास कर रहे हैं.

2024 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों से पहले ओडिशा में आदिवासी लोगों के लिए 100 फीसदी भूमि अधिकार के लिए जोर दिया जा रहा है. अभी तक ओडिशा देश के सभी राज्यों की तुलना में 4 लाख 52 हज़ार लाभार्थियों को व्यक्तिगत वन अधिकार देकर पहले स्थान पर है. वहीं छत्तीसगढ़ 4 लाख 46 हज़ार लाभर्थियों के साथ दूसरे स्थान पर है. जबकि सामुदायिक वन अधिकारों के मामले में 45 हज़ार लाभार्थियों को भूमि का स्वामित्व देकर छत्तीसगढ़ बाकी राज्यों की तुलना में बहुत आगे है.

अगर वन अधिकारों के दावों के अस्वीकृति दर को देखे तो मध्य प्रदेश के 51 फीसदी, छत्तीसगढ़ के 44 फीसदी और झारखंड के 25 फीसदी की तुलना में, ओडिशा में सिर्फ 20 फीसदी दावों को ठुकरा दिया गया है. रंजन चोपड़ा ने कहा, “2006 में शुरू हुई यात्रा 2024 तक एक सुखद नोट पर समाप्त होने की उम्मीद है.”

सचिव ने कहा कि राज्य सरकार ने 587 वन गांवों को राजस्व गांवों में बदलने का लक्ष्य रखा है, जिनमें से अभी तक सिर्फ 15 वन गांवों को ही मान्यता दी गई है. सचिव ने कहा, “अधिकारों के सभी पुराने रिकॉर्ड (भूमि पट्टों) को डिजिटल कर दिया गया है और भविष्य के पट्टों को भी डिजिटल किया जाएगा. सभी रिकॉर्ड रखने के लिए एक समर्पित वेबसाइट बनाई गई है.

गैर-सरकारी संगठन भागीदारों द्वारा भूमि के सीमांकन और अंतिम नागरिक तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया को सुगम बनाया गया है. ”केंद्रीय आदिवासी मामलों के मंत्रालय के निदेशक मनोज बापना ने कहा कि अब तक विभिन्न राज्यों से वन भूमि के लिए 44.29 लाख दावे प्राप्त हुए हैं, जिनमें से 22.34 लाख स्वीकृत किए गए हैं. कुल मिलाकर, 150 लाख एकड़ से अधिक भूमि को मान्यता दी गई है. जबकि 38 लाख 92 हज़ार 431 दावों का निपटारा किया जा चुका है, जो कि 87 फीसदी से थोड़ा अधिक है.

क्या है वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006

साल 2006 में संसद से पास हुए वन अधिकार कानून के तहत जंगल में निवास करने वाले आदिवासी समुदायों और अन्य पारंपरिक निवासियों के वन संसाधनों के अधिकारों को मान्यता प्रदान करता है. जिन पर ये समुदाय आजीविका, निवास तथा अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक ज़रूरतों सहित विभिन्न आवश्यकताओं के लिये निर्भर थे.

यह वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों (FDST) और अन्य पारंपरिक निवासी (OTFD) जो पीढ़ियों से ऐसे जंगलों में निवास कर रहे हैं, को वन भूमि पर उनके वन अधिकारों को मान्यता देता है. यह अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासी की आजीविका और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए वनों के संरक्षण की व्यवस्था को मज़बूती देता है.

ग्राम सभा को व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR) या सामुदायिक वन अधिकार (CFR) या दोनों जो कि अनुसूचित जनजाति और पारंपरिक निवासी को दिए जा सकते हैं, की प्रकृति और सीमा निर्धारित करने हेतु प्रक्रिया शुरू करने का अधिकार है.

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