ओडिशा के ‘खास तौर पर कमज़ोर आदिवासी समूहों’ (PVTGs) की सेहत की व्यापक जांच से पता चला है कि लगभग हर सात में से एक वयस्क हाइपरटेंशन से पीड़ित है और आधी से ज़्यादा आदिवासी महिलाएं एनीमिया से प्रभावित हैं.
उत्कल यूनिवर्सिटी की ये जानकारी राज्य भर के 10 PVTG समूहों के सर्वे पर आधारित थी.
वयस्क पुरुषों में 15.15 प्रतिशत लोग हाइपरटेंशन से पीड़ित पाए गए, जबकि महिलाओं में यह दर 14.38 प्रतिशत थी.
हालांकि सर्वे में शामिल ज़्यादातर लोगों का ब्लड प्रेशर सामान्य था, लेकिन रिपोर्ट में कई समुदायों में हाइपरटेंशन के बढ़ते मामलों को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक उभरती हुई चिंता के तौर पर बताया गया है.
पुरुषों में हाइपरटेंशन की सबसे ज़्यादा दर ‘हिल खरिया’ समुदाय में (27.55%) देखी गई, इसके बाद ‘लांजिया सौरा’ (22.56%), ‘लोधा’ (21.93%) और ‘पौडी भुइयां’ (21.09%) का नंबर आता है.
महिलाओं में, ‘लोधा’ समुदाय में सबसे ज़्यादा दर (24.81%) देखी गई, इसके बाद ‘पौडी भुइयां’ (22.63%), ‘मानकिडिया’ (22.03%) और ‘हिल खरिया’ (21.77%) का नंबर आता है.
इसके उलट, ‘जुआंग’, ‘कुटिया कंधा’ और ‘बोंडा’ समुदायों में पुरुषों और महिलाओं दोनों में हाइपरटेंशन की दर तुलनात्मक रूप से कम पाई गई.
‘ओडिशा के विशेष रूप से कमजूर जनजातीय समूहों (PVTGs) की सामाजिक-सांस्कृतिक, जनसांख्यिकीय, पोषण और स्वास्थ्य स्थिति’ पर बनी रिपोर्ट में कुछ आदिवासी समूहों में हाइपरटेंशन के बढ़ते मामलों के लिए खान-पान की बदलती आदतों, कम शारीरिक गतिविधि, मानसिक-सामाजिक तनाव और मुख्यधारा की जीवनशैली के ज़्यादा संपर्क में आने को वजह बताया गया है, साथ ही संभावित आनुवंशिक कारणों की ओर भी इशारा किया गया है.
एनीमिया के चिंताजनक स्तर
सर्वे में एनीमिया के चिंताजनक स्तर को उजागर किया गया, खासकर महिलाओं में. सर्वे में शामिल 1,261 वयस्क महिलाओं में से 53.37 फीसदी एनीमिया से पीड़ित थीं.
‘मानकिडिया’ महिलाओं में सबसे ज़्यादा दर (72.88%) देखी गई, इसके बाद ‘लांजिया सौरा’ (71.14%) और ‘बोंडा’ (67.40%) का नंबर आता है. ‘हिल खरिया’ (55.24%) और ‘दिदायी’ (53.33%) समुदायों की आधी से ज़्यादा महिलाएं भी एनीमिया से पीड़ित थीं.
सर्वे में शामिल 1,015 वयस्क पुरुषों में से 36.95 फीसदी एनीमिया से पीड़ित पाए गए, जिसका मतलब है कि हर तीन में से एक से ज़्यादा पुरुष हीमोग्लोबिन के कम स्तर से जूझ रहे थे.
एनीमिया सबसे ज़्यादा मनकिडिया पुरुषों (59.18%) में देखा गया, इसके बाद बोंडा (56.30%), लोधा (47.32%) और लांजिया साओरा (39.26%) समुदायों का नंबर आता है.
डोंगरिया कोंध (13.04%), कुटिया कोंध (25.84%) और दिदायी (28.08%) समुदायों में यह समस्या अपेक्षाकृत कम पाई गई.
प्रजनन उम्र की महिलाओं में एनीमिया की व्यापक समस्या से मातृ मृत्यु, समय से पहले प्रसव और बच्चों के खराब विकास का खतरा बढ़ सकता है.
लेखक – प्रसन्ना कुमार पात्रा, मिताली चिनारा, सुभेंदु कुमार आचार्य, सुरेश चंद्र मुर्मू और बिनॉय कुमार कुइती – ने यह भी पाया कि राज्य में केवल 18.94 फीसदी PVTG महिलाएं ही सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं.
जबकि 83.06 फीसदी महिलाएं आर्थिक तंगी, सीमित पहुंच और पुरानी सांस्कृतिक प्रथाओं के कारण कपड़े या अन्य पारंपरिक साधनों पर ही निर्भर रहती हैं.
सैनिटरी नैपकिन का सबसे कम इस्तेमाल लोधा, डोंगरिया कोंध और कुटिया कोंध समुदायों में देखा गया, जबकि मनकिडिया और लांजिया साओरा समुदायों में इनका इस्तेमाल अपेक्षाकृत ज़्यादा पाया गया.
मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता को बढ़ावा देने के सरकारी प्रयासों के बावजूद, ज़्यादातर PVTG समुदायों में सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल अभी भी सीमित है.
लगभग 59.86 फीसदी PVTG महिलाएं मासिक धर्म के दौरान साफ-सुथरे, दोबारा इस्तेमाल किए जा सकने वाले साधनों को साबुन और पानी से धोकर इस्तेमाल करती पाई गईं, जबकि 22.15 फीसदी महिलाएं केवल पानी पर निर्भर थीं, जिससे मासिक धर्म के दौरान खराब स्वच्छता और प्रजनन मार्ग में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है.
डोंगरिया कोंध और लांजिया साओरा समुदायों में सफाई की बेहतर आदतें देखी गईं.
यह अध्ययन उच्च शिक्षा विभाग के सहयोग से उत्कल विश्वविद्यालय के ‘सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस (CoE) इन स्टडीज़ ऑन ट्राइबल एंड मार्जिनलाइज़्ड कम्युनिटीज़’ द्वारा किया गया था.

