एक अस्पताल से दूसरे के चक्कर में गर्भवती आदिवासी महिला और उसके बच्चे की मौत

एक अस्पताल से दूसरे तक की पूरी यात्रा 100 किलोमीटर से ज़्यादा की थी, और इस लंबी यात्रा ने मां और बच्चे दोनों के जीवन पर गहरा असर किया.

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महाराष्ट्र के पालघर ज़िले के जवाहर में 35 साल की एक गर्भवती आदिवासी महिला की रविवार तड़के इलाज की कमी की वजह से मौत हो गई.

धाबेरी की रहने वाली रेखा पोटिंडा को शनिवार दोपहर प्रसव पीड़ा शुरू हुई. उसे पहले सखरसेठ के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने सलाह दी कि उसे पतंगशाह मेडिकल कॉलेज ले जाया जाए.

पतंगशाह मेडिकल कॉलेज से शाम को उसे नासिक के सिविल अस्पताल ले जाया गया, लेकिन रास्ते में ही उसके बच्चे की मौत हो गई, और रविवार को क़रीब एक बजे उसने खुद दम तोड़ दिया.

आदिवासी कल्याण के लिए काम करने वाले श्रमजीवी संगठन से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता सीता घाटल के हस्तक्षेप के बाद ही रेखा के शरीर को वापस जवाहर ले जाया गया, क्योंकि इसके लिए कोई एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं थी.

श्रमजीवी संगठन ने आदिवासी महिला और उसके नवजात शिशु की मौत की जांच की मांग की है. संगठन ने आरोप लगाया है कि सखरसेठ के पीएचसी में डॉक्टर रेखा का इलाज कर सकते थे, लेकिन नहीं किया. उसके बाद ही उसे शाम चार बजे जवाहर के पतंगशाह मेडिकल कॉलेज ले जाया गया.

पतंगशाह में भी डॉक्टरों ने शाम लगभग 5.30 बजे उसे नासिक के सिविल अस्पताल के लिए रेफ़र किया. एक अस्पताल से दूसरे तक की पूरी यात्रा 100 किलोमीटर से ज़्यादा की थी, और इस लंबी यात्रा ने मां और बच्चे दोनों के जीवन पर गहरा असर किया.

रेखा की मौत के बाद सिविल अस्पताल ने महिला के परिजनों को सूचित किया कि शव को जवाहर तक ले जाने के लिए उनके पास कोई एम्बुलेंस नहीं है. रिश्तेदारों से पैसे की व्यवस्था कर निजी एम्बुलेंस बुलाने के लिए कहा गया.

मामले की जानकारी होने पर संगठन कार्यकर्ता सीता घाटल ने शव को जवाहर तक पहुंचाने की व्यवस्था की.

एनजीओ ने पालघर जिला परिषद के सीईओ सिद्धराम सलीमत के सामने भी मामला उठाया, जिन्होंने कहा कि एम्बुलेंस खरीदने की प्रक्रिया चल रही है. सलीमठ ने घटना पर दुख जताते हुए कहा है कि वह ज़िला और तालुक के स्वास्थ्य अधिकारियों से इसके बारे में पूछताछ करेंगे.

(तस्वीर प्रतीकात्मक है.)

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