वन संरक्षण अधिनियम में संशोधन का विरोध

बैठक में पारित हुए प्रस्ताव में कहा गया है कि अभ्यावेदन करने के लिए कम से कम तीन महीने की ज़रूरत है. ऐसे में सरकार से समय बढ़ाने का आग्रह किया गया है. उनका यह भी आरोप है कि आदिवासी लोगों को अंधेरे में रखने के लिए मसौदा अंग्रेज़ी में जारी किया गया है. उनकी मांग है कि इसे तमिल में जारी किया जाए.

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वन संरक्षण अधिनियम (Forest Conservation Act – FCA) में संशोधन के केंद्र सरकार के प्रस्ताव का विरोध करने के लिए तमिलनाडु ट्राइबल पीपल एसोसिएशन ने 8 नवंबर को ईरोड ज़िले में वन रेंज कार्यालयों के सामने विरोध प्रदर्शन करने का फ़ैसला किया है.

सत्यमंगलम में हुई एसोसिएशन की एक बैठक में एक प्रस्ताव पारित किया गया. इसमें कहा गया है कि केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 2 अक्टूबर को एफसीए, 1980 में प्रस्तावित संशोधनों पर एक कंसल्टेशन पत्र जारी किया था, और लोगों से 15 दिनों के भीतर अपनी राय देने को कहा था.

एसोसिएशन ने तब कहा था कि दी गई समय-सीमा काफ़ी नहीं है और उनके कड़े विरोध के बाद सरकार ने 1 नवंबर तक समय बढ़ा दिया.

बैठक में पारित हुए प्रस्ताव में कहा गया है कि अभ्यावेदन करने के लिए कम से कम तीन महीने की ज़रूरत है. ऐसे में सरकार से समय बढ़ाने का आग्रह किया गया है. उनका यह भी आरोप है कि आदिवासी लोगों को अंधेरे में रखने के लिए मसौदा अंग्रेज़ी में जारी किया गया है. उनकी मांग है कि इसे तमिल में जारी किया जाए.

प्रस्ताव में कहा गया है, “वनों के संरक्षण और पर्यावरण संबंधी चिंताओं को दूर करने को प्राथमिकता देने के बजाय, प्रस्तावित संशोधनों में कॉरपोरेट द्वारा वन भूमि के अधिग्रहण की सुविधा है, जो कि निजीकरण के अलावा और कुछ नहीं है. प्रस्तावित संशोधन जंगलों में रहने वाले आदिवासी लोगों के कल्याण के खिलाफ़ हैं, और यह वन अधिकार अधिनियम, 2006 को कमज़ोर करेगा.”

केंद्र से अधिनियम में संशोधन न करने का अनुरोध करते हुए, एसोसिएशन ने मांग की है कि राज्य सरकार संशोधनों के खिलाफ़ अपनी चिंताएं केंद्र सरकार के सामने रखे.

क्या है प्रस्तावित संशोधन?

मोटे तौर पर प्रस्तावित संशोधन कुछ श्रेणियों के इंफ़्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए डेवलपर्स को वन भूमि का इस्तेमाल करने की अनुमति के लिए केंद्र सरकार के पास जाने से छूट देता है.

मसलन, राष्ट्रीय सुरक्षा परियोजनाओं, बॉर्डर इंफ़्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं, रेलवे या सड़क परिवहन मंत्रालय के स्वामित्व वाली भूमि जो 1980 से पहले या अधिनियम के लागू होने से पहले अधिग्रहित की गई थी, को छूट दी गई है.

एफॉरेस्टेशन के लिए इस्तेमाल की जाने वाली ज़मीन के कुछ हिस्सों का नॉन-फ़ॉरेस्ट उपयोगों के लिए ज़मीन मालिकों को केंद्र से अनुमति लेने की ज़रूरत थी, और कॉम्पेंसेशन सेस भी देना पड़ता था. प्रस्तावित संशोधन इस पूरे प्रोसेस को आसान बना देगा.

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