मां की ममता से दूर मानसिक अलगाव से जूझते आदिवासी बच्चे

बहुत कम उम्र (5 से 6 साल) में आदिवासी बच्चे मॉडल आवासीय विद्यालयों (MRS) और प्री-मैट्रिक हॉस्टलों में शिफ़्ट होने को मजबूर हो रहे हैं. प्रकृति की गोद में बसी शांत आदिवासी बस्तियों में रहने वाले यह बच्चे अचानक अर्ध-शहरी (semi-urban) गांवों में पहुंच गए हैं.

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केरल के आदिवासी बच्चों को आजकल एक अलग ही मुश्किल का सामना करना पड़ रहा है. दूरदारज़ की आदिवासी बस्तियों में बने ऑल्टर्नेट लर्निंग सेंटर्स (Alternate Learning Centres) को बंद करने के राज्य सरकार के फ़ैसले ने छोट-छोटे बच्चों में मानसिक तनाव पैदा कर दिया है.

ALC के बंद होने से उसमें पढ़ाने वाले शिक्षकों पर हुए असर पर इससे पहले काफ़ी चर्चा हुई है, लेकिन इसका एक बड़ा और गहरा असर बच्चों पर भी पड़ रहा है.

बहुत कम उम्र (5 से 6 साल) में आदिवासी बच्चे मॉडल आवासीय विद्यालयों (MRS) और प्री-मैट्रिक हॉस्टलों में शिफ़्ट होने को मजबूर हो रहे हैं. प्रकृति की गोद में बसी शांत आदिवासी बस्तियों में रहने वाले यह बच्चे अचानक अर्ध-शहरी (semi-urban) गांवों में पहुंच गए हैं.

हॉस्टलों के अंदर भी उन्हें जगह के लिए मशक्कत करनी पड़ती है, क्योंकि ज़्यादातर हॉस्टलों में जगह की कमी है, और पहली और बारहवीं तक के छात्र एक ही छत के नीचे रहते हैं.

जानकार कहते हैं कि पहले ही परिवार से अलग होने की मुश्किलें झेलने वाले बच्चे अपने पारंपरिक वातावरण और शहरी परिवेश दोनों में ही अजनबी बन जाते हैं, जिससे कभी-कभी अवसाद हो जाता है. बच्चे ओणम, क्रिसमस और गर्मी की छुट्टियों के दौरान ही अपने माता-पिता से मिल पाते हैं.

मूवाट्टुपुझा के पास मदिरप्पिल्ली में आदिवासी लड़कियों का एक हॉस्टल है, जिसमें 79 बच्चे हैं – उनमें से 13 कक्षा एक के छात्र हैं, और नौ कक्षा 2 के.

इस हॉस्टल की वॉर्डन सुनीता ने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि ज्यादातर बच्चे शुरुआती दिनों में भावनात्मक (emotional) मुद्दों का सामना करते हैं क्योंकि वे पहली बार अपने परिवार से दूर रह रहे हैं. लेकिन बच्चे बहुत तेजी से ही अपने आस-पास के वातावरण में ढल जाते हैं, खासकर अपनी ही बस्ती के दूसरे बच्चों की मदद से. उन्होंने कहा कि इस सेशन में हॉस्टल पहुंचने वाले सिर्फ दो बच्चे ही उदास थे, लेकिन तेजी से उनकी हालत में सुधार हुआ.

माता-पिता भी इस बात से सहमत हैं कि आदिवासी हॉस्टल में बच्चों को अच्छा भोजन और देखभाल मिलती है.

मदिरप्पिल्ली के हॉस्टल में बच्चों की देखभाल के लिए दो चौकीदार और तीन रसोइए हैं. उनकी पढ़ाई में मदद करने के लिए एक ट्यूशन टीचर भी हैं. साथ ही प्राइमरी के छात्रों के कपड़े धोने के लिए एक व्यक्ति को नियुक्त किया गया है.

आदिवासी कार्यकर्ता चित्रा निलंबूर ने अखबार को बताया कि उन्होंने पिछले साल मलप्पुरम जिले के एक आदिवासी हॉस्टल का दौरा करते हुए पाया कि एक बच्चे को बुखार था, और उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं था. आदिवासी हॉस्टल के अधिकांश कर्मचारी गैर-आदिवासी समुदायों से हैं और वे इन बच्चों के भावनात्मक मुद्दों को नहीं समझते हैं.

मलप्पुरम जिले के मंचेरी में चोलनायका समुदाय के एक सदस्य सी विनोद ने कहा, “सरकार को सभी आदिवासी बस्तियों में आंगनवाड़ी शुरू करनी चाहिए, और चौथी कक्षा तक के छात्रों को उनके पारंपरिक वातावरण में पढ़ाई करने की अनुमति दी जानी चाहिए.”

वो मानते हैं कि इतनी कम उम्र में अपने माता पिता से दूर होकर हॉस्टलों में रहने से आदिवासी बच्चे अपने पारंपरिक मूल्यों को खो देते हैं. वो अपने स्कूल के दिनों के बारे में कहते हैं कि वो भी इसी तरह की भावनाओं से गुज़रे था, और उन्होंने कई बार स्कूल छोड़ने के बारे में सोचा था. विनोद का कहना है कि सांस्कृतिक अंतर कई छात्रों को हाई स्कूल तक पहुंचने के बाद पढ़ाई बाच में ही छोड़ने के लिए मजबूर करता है.

मनोचिकित्सक सीजे जॉन ने अखबार से बातचीत में कहा, “बच्चों को नए वातावरण में सावधानी से स्थानांतरित किया जाना चाहिए और मां को इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए. नए परिवेश में, माता-पिता की देखभाल के नुकसान की भरपाई के लिए वॉर्डन को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए.”

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