महाराष्ट्र सरकार ने 27 सदस्यों वाली एक कमेटी बनाई है. यह कमेटी इस बात की जांच करेगी कि क्या दूसरे धर्म में धर्म-परिवर्तन करने वाले अनुसूचित जनजाति (ST) के सदस्यों को आरक्षण और सरकारी फ़ायदे मिलते रहने चाहिए या नहीं.
यह मुद्दा राजनीतिक और संवैधानिक रूप से संवेदनशील है और इसे लंबे समय से RSS से जुड़े संगठनों और बीजेपी के कुछ धड़ों द्वारा उठाया जाता रहा है.
राज्य के आदिवासी विकास विभाग ने 16 जुलाई को एक सरकारी आदेश (GR) जारी किया. इसमें कहा गया है कि आदिवासी विकास मंत्री अशोक उइके की अध्यक्षता वाली यह कमेटी धर्म-परिवर्तन के बाद एसटी के लिए आरक्षण और कल्याणकारी लाभों से जुड़ी संवैधानिक और कानूनी स्थिति की जांच करेगी.
साथ ही, यह कमेटी केंद्र और दूसरे राज्यों द्वारा अपनाए गए तरीकों का अध्ययन करेगी और महाराष्ट्र के लिए एक नीति की सिफारिश करेगी.
हालांकि, इस सरकारी आदेश में कमेटी के लिए अपनी सिफारिशें सौंपने की कोई समय-सीमा तय नहीं की गई है.
यह मुद्दा कानूनी तौर पर अनुसूचित जातियों (SC) के मुद्दे से अलग है. संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के तहत SC आरक्षण धर्म से जुड़ा हुआ है, जबकि अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए ऐसी कोई पाबंदी नहीं है.
संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत एसटी को एसटी के तौर पर ही मान्यता मिलती रहती है, चाहे वे किसी भी धर्म को मानते हों.
यह मुद्दा संघ परिवार के आदिवासी संपर्क अभियान का हिस्सा रहा है. इस साल मई में RSS से जुड़े वनवासी कल्याण आश्रम के समर्थन वाले जनजातीय सुरक्षा मंच (JSM) ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ज्ञापन सौंपे.
इन ज्ञापनों में दूसरे धर्म में धर्म-परिवर्तन करने वाले एसटी सदस्यों को ST की सूची से हटाने (डिलिस्टिंग) की मांग की गई थी.
उनका तर्क था कि जो लोग धर्म-परिवर्तन के बाद पारंपरिक आदिवासी आस्था, रीति-रिवाजों और संस्कृति को छोड़ देते हैं, उन्हें ST के फ़ायदे नहीं मिलने चाहिए.
इसमें संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 में संशोधन या स्पष्टीकरण, ‘अनुसूचित जनजाति’ की कानूनी परिभाषा और धर्म-परिवर्तन रोकने वाले कड़े कानूनों की भी मांग की गई.
यह मांग इस साल मई में तब और तेज़ हो गई, जब नई दिल्ली में संघ से जुड़े आदिवासियों के एक बड़े सम्मेलन में, जिसमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी शामिल हुए थे, उसमें ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाने वाले STs को ‘डीलिस्ट’ (सूची से हटाने) की मांग की गई.
संघ परिवार के रुख का समर्थन करते हुए, आवास और शहरी मामलों के केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू (बीजेपी) ने अगस्त 2024 में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, “हिंदू धर्म कभी भी किसी के धर्म-परिवर्तन की बात नहीं करता. हम सनातन संस्कृति को मानने वाले हैं. हम सभी धर्मों का सम्मान करते हैं. हमने कभी किसी को धर्म बदलने के लिए नहीं कहा. लेकिन कांग्रेस ने हमेशा वोट-बैंक की राजनीति के लिए धर्म-परिवर्तन को बढ़ावा दिया है. जो लोग धर्म बदल चुके हैं, उन्हें उस (ST) समुदाय का फ़ायदा क्यों मिलना चाहिए? डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा बनाए गए संविधान के अनुसार, जो लोग किसी खास समुदाय में हैं, उन्हें उसी समुदाय का फ़ायदा मिलना चाहिए, ताकि सभी वर्गों को लाभ मिल सके.”
यह सवाल महाराष्ट्र में खास तौर पर अहम है, जहां अनुसूचित जनजाति की आबादी राज्य की कुल आबादी का 9.35 फीसदी है.
2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य में एसची आबादी 2001 में 85.77 लाख से बढ़कर 1.05 करोड़ से ज़्यादा हो गई, जिसमें कई धर्मों के लोग शामिल थे. जहां 97.2 फीसदी एसटी लोगों ने खुद को हिंदू बताया, वहीं जनगणना में 1.13 लाख मुस्लिम, 20 हज़ार से ज़्यादा ईसाई और करीब 21 हज़ार बौद्ध भी दर्ज किए गए, साथ ही सिखों और जैनियों की भी कुछ संख्या थी.
2001 और 2011 के बीच मुस्लिम ST आबादी में 49.1 प्रतिशत, बौद्ध ST आबादी में 114.8 प्रतिशत और जैन ST आबादी में करीब छह गुना बढ़ोतरी हुई, जबकि ईसाई एसटी आबादी में 34.8 प्रतिशत की कमी आई.
राज्य समिति की अध्यक्षता उइके करेंगे और इसमें आदिवासी विकास राज्य मंत्री इंद्रनील नाइक, खाद्य और औषधि प्रशासन मंत्री नरहरी ज़िरवाल, ST निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले विधायक और पुणे स्थित आदिवासी अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थान (TRTI) के आयुक्त (सदस्य सचिव के तौर पर) शामिल होंगे.
यह कदम विधानसभा के 2025 के मॉनसून सत्र के दौरान राज्य सरकार द्वारा दिए गए आश्वासन के बाद उठाया गया है.
यह आश्वासन तब दिया गया था जब BJP विधायकों ने नंदुरबार जिले में आदिवासियों के धर्म परिवर्तन के आरोप लगाए थे और सवाल उठाया था कि क्या धर्म परिवर्तन करने वालों को लाभ मिलना जारी रहना चाहिए.
यह पहली बार नहीं है जब महायुति सरकार ने इस मुद्दे की जांच की है. 2023 में सरकार ने उन आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई थी कि दूसरे धर्मों में धर्म परिवर्तन करने वाले एसटी छात्र औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (ITI) में आरक्षण का लाभ उठा रहे थे.
मार्च 2024 में विधानसभा में पेश की गई एक अंतरिम रिपोर्ट में ST कोटे के तहत दाखिला लेने वाले 257 ऐसे छात्रों की पहचान की गई, जिन्होंने हिंदू धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाया था.
हालांकि सरकार ने घोषणा की थी कि इन दाखिलों की जांच की जाएगी लेकिन आदिवासी संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों की आलोचना के बीच आगे कोई कार्रवाई नहीं हुई.
ट्राइबल राइट्स एक्टिविस्ट और ‘नेशनल फ़ोरम फ़ॉर ट्राइबल राइट्स’ की राज्य समिति के सदस्य डॉ. संजय दाभाड़े ने कहा, “यह पूरा मामला बेतुका है और RSS के एजेंडे से प्रेरित है. RSS और वनवासी संगठन बरसों से यह मांग कर रहे हैं और कई राज्यों में सत्ता में होने के बावजूद, वे जानते हैं कि इसे संविधान में संशोधन किए बिना लागू नहीं किया जा सकता. संविधान धर्म को ST का दर्जा देने का आधार नहीं बनाता. जो कोशिश की जा रही है, वह असंवैधानिक है और हिंदुत्व की राजनीति का हिस्सा है.”

