तमिलनाडु: आदिवासी इलाक़े में बनी कामचलाऊ डिस्पेंसरी, क्या यह कोई समाधान है

आदिवासियों के लिए स्वास्थ्य सेवाएं या फिर कोई भी परियोजना बनाने से पहले, उनकी भावनाओं और जीवनशैली को समझना भी बेहद ज़रूरी है. वरना एक-दूसरे को समझने के अभाव में योजनाए सफ़ल नहीं होंगी, और नुकसान आदिवासी का ही होगा.

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तमिलनाडु के वेल्लोर ज़िले में पहाड़ों पर रहने वाले आदिवासियों की आपातकालीन स्वास्थ्य देखभाल के लिए कुरुमलई के ऊपर एक अस्थायी डिस्पेंसरी स्थापित की गई है. इतनी हड़बड़ी में डिस्पेंसरी खोलने के पीछे यहां की दयनीय स्वास्थ्य प्रणाली है.

सोमवार को पहाड़ पर बसी एक आदिवासी बस्ती की एक गर्भवती औरत को डोली में बिठाकर पहाड़ी से नीचे उतारकर अस्पताल ले जाया गया. उसने रास्ते में ऑटोरिक्शा में ही बच्चे को जन्म दे दिया. हालांकि जच्चा-बच्चा दोनों बच गए, लेकिन इस घटना ने अधिकारियों का ध्यान खींचा.

इसके बाद वेल्लोर कलेक्टर पी कुमारवेल पांडियन को पहाड़ी पर आदिवासियों को स्वास्थ्य और सड़क सुविधाएं प्रदान करने का निर्देश दिया गया है. कलेक्टर ने 2 जुलाई को पहाड़ी का दौरा किया और सभी ज़रूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने का वादा किया.

पंचायत के एक स्कूल में फ़िलहाल यह डिस्पेंसरी स्थापित की गई है. इसमें एक डॉक्टर, एक नर्स और एक स्वास्थ्य कर्मी होगा. आदिवासियों के इलाज के लिए डिस्पेंसरी में दो बेड भी हैं. डिस्पेंसरी में एक स्वास्थ्य शिविर का आयोजन हो चुका है, जिसमें 60 स्थानीय निवासियों ने भाग लिया.

कुरुमलई आदिवासी गांव से लगभग 10 कि.मी. दूर है, और आदिवासी तलहटी से आने-जाने के लिए सड़क की मांग कर रहे हैं. ग्रामीण विकास विभाग के अधिकारियों का कहना है कि 463 आबादी वाले गांव तक सड़क बनाने का काम चल रहा है.

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि अधिकांश आदिवासी महिलाएं प्रसव की तारीख से पहले मैदानी इलाकों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचने के निर्देशों का पालन नहीं करती हैं. वो अंतिम क्षण तक घर पर रहती हैं, और फिर अस्पताल पहुंचने के लिए संघर्ष करती हैं.

अधिकारियों की हिदायत भले ही सही मानी जाए, लेकिन यह समझना भी ज़रूरी है कि बाकि औरतों की तरह ही आदिवासी औरतों के लिए भी घर छोड़कर कई दिनों तक अस्पताल में रहना शायद संभव नहीं है. ऊपर से आधुनिक चिकित्सा प्रणाली पर उन्हें ज़्यादा भरोसा नहीं होता.

आदिवासियों के लिए स्वास्थ्य सेवाएं या फिर कोई भी परियोजना बनाने से पहले, उनकी भावनाओं और जीवनशैली को समझना भी बेहद ज़रूरी है. वरना एक-दूसरे को समझने के अभाव में योजनाए सफ़ल नहीं होंगी, और नुकसान आदिवासी का ही होगा.

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