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कर्नाटक के आदिवासी स्कूलों के शिक्षक वेतन और सुविधाओं को लेकर राष्ट्रपति से दखल की मांग कर रहे हैं

ज्यादातर अलग-थलग और जंगली इलाकों में स्थित इन आवासीय स्कूलों में शिक्षकों को चौबीसों घंटे कैंपस में रहना पड़ता है.

कर्नाटक के सबसे दूर-दराज़ के इलाकों में बच्चों को पढ़ाने में करीब 25 साल बिताने के बाद, सैकड़ों आउटसोर्स किए गए शिक्षक गंभीर आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं.

119 महर्षि वाल्मीकि आदिवासी आश्रम स्कूलों में काम करने वाले करीब 400 से 500 शिक्षकों का आरोप है कि उन्हें रुकी हुई सैलरी और नौकरी की सुरक्षा न होने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. इसलिए उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से तुरंत दखल देने की मांग की है.

शिक्षकों को अभी हर महीने 10,500 रुपये का मानदेय मिलता है.

उनका कहना है कि यह उसी संस्थान में काम करने वाले ग्रुप-D कर्मचारियों और रसोइयों की बेसिक सैलरी से काफी कम है.

ज्यादातर अलग-थलग और जंगली इलाकों में स्थित इन आवासीय स्कूलों में शिक्षकों को चौबीसों घंटे कैंपस में रहना पड़ता है. पढ़ाने के अलावा वे छात्रों की सेहत का ध्यान रखते हैं, अनुशासन बनाए रखते हैं, रहने की व्यवस्था की देखरेख करते हैं और प्रशासनिक काम भी संभालते हैं.

उन्हें जंगली जानवरों के हमले का खतरा भी रहता है.

शिक्षकों की सुरक्षा समिति के एक प्रतिनिधि ने कहा, “मैंने 2001 में 2,000 रुपये के मासिक मानदेय पर काम करना शुरू किया था. आज भी मेरी सैलरी 10,500 रुपये ही है, जबकि लेबर डिपार्टमेंट के ज़रिए रखे गए रसोइए 23,000 से 25,000 रुपये कमाते हैं.”

उन्होंने कहा, “मैसूरु और चामराजनगर जैसे जंगली सीमावर्ती जिलों में हमारे पास बुनियादी सुरक्षा की कमी है. शिक्षकों को जंगली हाथियों के हमले का खतरा भी रहता है.”

शिक्षकों का कहना है कि सपोर्ट स्टाफ की कमी के कारण उन पर काम का बोझ बढ़ गया है.

प्रतिनिधि ने कहा, “क्योंकि कोई खास वार्डन नहीं है इसलिए हमें कई वार्डों की देखभाल करनी पड़ती है और अतिरिक्त 6,000 रुपये के लिए शाम 4 बजे से अगली सुबह तक स्कूल में रहना पड़ता है. हम चौबीसों घंटे काम करते हैं और मेडिकल इमरजेंसी के दौरान बीमार बच्चों को सरकारी अस्पतालों में ले जाते हैं. फिर भी हमारे पास नौकरी की सुरक्षा, प्रोविडेंट फंड या ESI जैसी सुविधाएं नहीं हैं और छुट्टियों के दौरान सैलरी भी नहीं मिलती है.”

शिक्षकों ने अनुसूचित जनजाति कल्याण विभाग और श्रम विभाग से ‘समान काम के लिए समान वेतन’ के सिद्धांत को लागू करने और उनकी सेवाओं को नियमित करने की मांग की है.

दक्षिण कन्नड़ के इंटीग्रेटेड ट्राइबल डेवलपमेंट प्रोजेक्ट (ITDP) के प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर बसवराजु HC ने कहा कि आउटसोर्स किए गए शिक्षकों को एक तय मानदेय दिया जाता था और उन्हें ESI या प्रोविडेंट फंड का लाभ नहीं मिलता था, क्योंकि टीचिंग पोस्ट लेबर डिपार्टमेंट के दायरे में नहीं आती थीं.

उन्होंने कहा, “यह राज्य-स्तर की पॉलिसी का मामला है. हमने उनके मासिक मानदेय को बढ़ाकर 25,000 रुपये करने का औपचारिक प्रस्ताव भेजा है.”

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