तमिलनाडु: चार आदिवासी बच्चों को बाल मज़दूरी से बचाया गया

सोमवार 16 अगस्त को इन बच्चों को मज़दूरी के लिए वेल्लोर ज़िले के एक आदिवासी गांव से कल्लकुरिची ज़िले में कपास के खेतों में काम करने के लिए ले जाया गया.

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देश में मानव तस्करी से जुड़ी ख़बरें जब भी आती हैं, तो उनमें पीड़ित ज़्यादातर ग़रीब और आदिवासी तबके के लोग होते हैं. आदिवासी बच्चे अक्सर तस्करों के जाल में फंस जाते हैं, जो उन्हें नौकरी का लालच देते हैं.

ऐसी ही एक घटना तमिलनाडु के तिरुवन्नामलई ज़िले से सामने आई हैं. चाइल्ड लाइन की टीम ने यहां एक 14 साल की लड़की समेत चार आदिवासी बच्चों को बचाया है.

सोमवार 16 अगस्त को इन बच्चों को मज़दूरी के लिए वेल्लोर ज़िले के एक आदिवासी गांव से कल्लकुरिची ज़िले में कपास के खेतों में काम करने के लिए ले जाया गया.

जमुनामरदूर पहाड़ियों में एक गाड़ी में कुछ बच्चों के साथ घूम रहे दो लोगों को देखने के बाद, इलाक़े के लोगों को शक हुआ और उन्होंने चाइल्ड लाइन (1098) को सतर्क कर दिया.

ख़बर मिलते ही चाइल्ड लाइन की तीन सदस्यीय टीम हरकत में आई, और अरसावल्ली आदिवासी बस्ती में वैन को रोका गया. पूछताछ करने पर पता चला की गाड़ी में मौजूद आदमी एजेंट थे, जो उन बच्चों – तीन लड़कों और एक लड़की – को काम के लिए कल्लकुरिची ले जा रहे थे.

तिरुवन्नामलई ज़िला चाइल्ड लाइन समन्वयक ने एक अखबार को बताया कि टीम ने बच्चों को बचाया, गाड़ी को ज़ब्त कर लिया, और जमुनामरदूर पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई.

दोनों एजेंटों – 45 साल के मुत्तुकुमार और 41 साल के अलगुवेल के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है. उन्हें जुविनाइल जस्टिस एक्ट (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम की धारा 79 के तहत गिरफ्तार किया गया है.

इन बच्चो में दे लड़के 13 साल के हैं, एक 16 साल की, और लड़की 14 साल की है.

यह चारों अब बाल कल्याण समिति (CWC) की देखरेख में हैं, जो मामले की विस्तृत जांच करेगी.  प्रारंभिक जांच से पता चला है कि हर बच्चे को एडवांस के तौर पर 1000 रुपये दिए गए थे.

महामारी की वजह से स्कूल बंद होने के चलते बच्चों के परिवार उनकी भोजन की ज़रूरतें भी पूरी नहीं कर पा रहे थे. ऊपर से कोविड ने ज़्यादातर आदिवासी और दूसरे ग़रीबों की आजीविका पर गहरा असर डाला है.

इन हालात में यह बच्चे अपने परिवार की आर्थिक मदद करना चाहते थे. अब बच्चों को या तो एक सरकारी घर या उनके परिवारों के साथ भेजा जाएगा.

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