झारखंड के पीवीटीजी आदिवासियों को राशन तक नहीं मिल रहा है – बृंदा करात

अपने पत्र में उन्होने कहा है कि पीने के पानी के लिए सरकार द्वारा प्रदान किए गए टैंक या पंप जीर्ण-शीर्ण थे . उन्होनें आयोग को अवगत कराया है कि कई पीवीटीजी परिवारों को 35 किलो मुफ्त राशन भी नहीं मिल रहा है.

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सीपीएम की पोलीत ब्यूरो सदस्य वृंदा करात राष्ट्रीय जनजाति आयोग को एक पत्र लिखा है. बृंदा कराद ने मंगलवार को राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष को पत्र लिखकर झारखंड के विशेष रूप से पिछड़े आदिवासी समुदाय से जुड़े कुछ अहम मसले उठाए हैं.

उन्होंने आयोग से आग्रह किया है कि झारखंड के दुमका जिले में विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (पीवीटीजी) को केंद्र और राज्य के लाभों से वंचित रखा जा रहा है. उन्होंने राष्ट्रीय जनजाति आयोग से इस मामले का संज्ञान लेने का अनुरोध किया है.   

उन्होंने आयोग से मांग की है कि इस क्षेत्र में एक निरीक्षण दल (inspection team) भेजी जाए. उन्होंने कहा कि आयोग को ज़मीनी हालात का पता लगा कर तुरंत कार्रावाई करनी चाहिए. 

बृंदा करात ने अपने पत्र में मालपहाड़िया जनजाति का विशेष रूप से ज़िक्र किया है. उन्होने लिखा है कि इस जनजाति के लोगों को राशन और दूसरी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं. 

बृंदा एक आदिवासी रैली में बोलते हुए

आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच के साथ माकपा के एक प्रतिनिधिमंडल ने 11-13 अगस्त के बीच दुमका जिले का दौरा किया था.

इस प्रतिनीधि मंडल ने दावा किया है कि उन्होंने यहां के पीवीटीजी के कम से कम 100 परिवारों से मुलाकात की थी. से मुलाकात की थी.

सीपीएम की पोलित ब्यूरो सदस्य बृंदा करात राज्य सभा की सांसद रही हैं. बृंदा करात आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच से भी जुड़ी हुई हैं.

बृंदा करात लगातार आदिवासी मुद्दों पर लिखती और बोलती रही हैं. बृंदा करात ने अपने पत्र में कहा है,  “मैंने पाया कि अधिकांश का टीकाकरण नहीं हुआ था, वे आवास योजना योजना से वंचित थे, अधिकांश अभी भी प्राकृतिक जल आपूर्ति पर निर्भर थे जो कि बस्तियों से दूर थे.” 

अपने पत्र में उन्होने कहा है कि पीने के पानी के लिए सरकार द्वारा प्रदान किए गए टैंक या पंप जीर्ण-शीर्ण थे . उन्होनें आयोग को अवगत कराया है कि कई पीवीटीजी परिवारों को 35 किलो मुफ्त राशन भी नहीं मिल रहा है. 

झारखंड में कई आदिवासी समुदाय हैं जिन्हें अति पिछड़ी यानि पीवीटीजी की श्रेणी में रखा गया है.

इन जनजातियों में बिरहोर, असुर, बिरजिया, हिल खड़िया, कोरवा, माल पहाड़िया, पहाड़िया , सवर और सौरिया पहाड़िया शामिल हैं. इन जनजातियों में कुपोषण और बाल मृत्यु दर एक बड़ा मसला है.

कुछ साल पहले एक बिरहोर बच्ची की भूख से मौत का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था. सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बावजूद पीवीटीजी समुदायों की हालत में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ है. 

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