त्रिपुरा की आदिवासी जनजातियों की सदियों पुरानी सामाजिक न्याय प्रणालीत्रिपुरा में फिर आदिवासियों के रुढ़ीगत क़ानून (Customary Law) लागू करने की माँग को कानूनी दर्जा दिलाने के लिए एक बार फिर मुहिम तेज़ हो गई है.
19 आदिवासी समुदायों की त्रिपुरा ट्राइबल कस्टमरी लॉ को-ऑर्डिनेशन कमेटी’ (TTCLCC) के एक प्रतिनिधिमंडल ने इस सिलसिले में राज्यपाल इन्द्रसेना रेड्डी नल्लू से मुलाकात की है.
प्रतिनिधि मंडल ने राज्य के 19 आदिवासी समुदायों के रूढ़िवादी कानूनों (Customary Laws) के शीघ्र संहिताकरण (Codification) और उन्हें लागू करने की मांग की है.
राज्यपाल को सौंपे गए ज्ञापन में TTCLCC के नेताओं और पारंपरिक समाजपतियों (जनजातीय प्रमुखों) ने इस बात पर जोर दिया कि त्रिपुरा के आदिवासी समुदाय अनादि काल से अपने पारंपरिक रूढ़िवादी कानूनों के माध्यम से ही सामाजिक रूप से संचालित होते रहे हैं.
इस पारंपरिक व्यवस्था के कारण आदिवासियों को अपने सामाजिक और पारिवारिक विवादों के निपटारे के लिए पुलिस स्टेशनों या सरकारी अदालतों के चक्कर नहीं लगाने पड़ते थे.
दशकों पुरानी मांग और 2022 का प्रस्तावित विधेयक
त्रिपुरा के कस्टमरी लॉ लागू करने की मांग से जुड़े ज्ञापन में कहा गया है कि 1982 में ‘त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद’ (TTAADC) की स्थापना के बाद से ही इन पारंपरिक कानूनों को कानूनी रूप से संहिताबद्ध करने की मांग उठ रही है.
संविधान की छठी अनुसूची के तहत एडीसी के उन्नयन (Upgradation) के बाद यह मांग और मजबूत हुई.
हालांकि, दशकों बीत जाने के बाद भी जमातिया (Jamatia) समुदाय के अलावा किसी अन्य आदिवासी समुदाय के रूढ़िवादी कानून को अब तक औपचारिक रूप से संहिताबद्ध नहीं किया जा सका है
इस मसले पर गहरी चिंता और पीड़ा व्यक्त करते हुए समिति के नेताओं ने बताया कि एक लंबे इंतजार के बाद 28 दिसंबर 2022 को एडीसी (TTAADC) ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया था.
एडीसी ने उस सत्र में राज्य के 14 प्रमुख आदिवासी समुदायों के रूढ़िवादी कानूनों से संबंधित विधेयकों को सर्वसम्मति से पारित किया गया था.
2022 के प्रस्तावित कानून के दायरे में त्रिपुरा (Tripuri), रीयांग (Reang), चकमा (Chakama), गारो (Garo), उचोई (Uchoi), नोआतिया (Noaitia), मुरासिंग (Murasing), काईपेंग (Kipaing), रूपिनी (Rupini), ह्रांगखवल (Hrangkhawl or Ranglong), मोग (Mog), मिज़ो (Mizo), और चेरोई (Chiroi) समुदाय आते हैं.
राज्यपाल की अनुमति का इंतज़ार
एडीसी द्वारा 28 दिसंबर 2022 को विधेयक पारित करने के बाद इसे राज्यपाल की अंतिम स्वीकृति के लिए राज्य सरकार के जनजातीय कल्याण विभाग (Tribal Welfare Department) को भेजा गया था.
राज्य सरकार के स्तर पर इसे तुरंत आगे बढ़ाने के बजाय, कुछ विसंगतियों (Anomalies) और तकनीकी त्रुटियों को दूर करने के लिए विधेयक को वापस एडीसी (TTAADC) अधिकारियों को भेज दिया गया.
एडीसी प्रशासन द्वारा इन विसंगतियों को अंतिम रूप देकर पुनः जनजातीय कल्याण विभाग को नहीं भेजा जा सका है, जिससे राज्यपाल की सहमति (Governor’s Assent) का मामला लंबित पड़ा हुआ है.
अब चार साल बाद टीटीसीएलसीसी के प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल इन्द्रसेना रेड्डी नल्लू से अपने संवैधानिक पद का उपयोग करने का अनुरोध किया है.
उन्होंने मांग की है कि राज्यपाल एडीसी अधिकारियों को निर्देश दें कि वे विधेयक की विसंगतियों को जल्द से जल्द दूर कर इसे जनजातीय कल्याण विभाग के माध्यम से राजभवन स्वीकृति के लिए भेजें.
इससे त्रिपुरा की आदिवासी आबादी अपनी समृद्ध परंपराओं और रूढ़िवादी न्याय प्रणाली के तहत गरिमापूर्ण जीवन जी सकेगी.

