IIM रांची की एक PhD स्कॉलर ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) से संपर्क किया है. उनका आरोप है कि अपनी आदिवासी पहचान की वजह से उन्हें संस्थान के मैनेजमेंट से भेदभाव का सामना करना पड़ा.
अनुसूचित जनजाति समुदाय से ताल्लुक रखने वाली प्रियंका कुजूर (Priyanka Kujur) का दावा है कि अपने बैकग्राउंड की वजह से उनके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार किया गया.
सोमवार को अपने माता-पिता के साथ प्रियंका रांची के सर्किट हाउस गईं और IIM रांची मैनेजमेंट के खिलाफ औपचारिक शिकायत दर्ज कराने के लिए NCST की सदस्य डॉक्टर आशा लकड़ा से मिलीं.
प्रियंका के मुताबिक, BIT मेसरा से ग्रेजुएट होने के बावजूद, उन्हें अक्सर ताने मारे जाते हैं और “कमज़ोर” कहा जाता है. उन्होंने संस्थान में छात्रों को मार्क्स देने में भी भेदभाव का आरोप लगाया.
प्रियंका के माता-पिता ने चिंता जताई कि IIM रांची मैनेजमेंट का रवैया उनकी बेटी को डिप्रेशन में धकेल सकता है.
उनके पिता जॉन अनुरंजन कुजूर ने कहा, “यह बहुत परेशान करने वाली बात है कि वे किसी भी सवाल का जवाब नहीं देते; वे RTI आवेदनों का भी जवाब नहीं देते. मुझे लगता है कि संस्थान में उसे दबाया जा रहा है.”
उन्होंने आगे आरोप लगाया कि प्रियंका ने साइबर क्राइम से जुड़ा एक इनोवेटिव सुझाव दिया था, लेकिन उसे दबा दिया गया, शायद इसलिए क्योंकि “वे नहीं चाहते थे कि कोई आदिवासी छात्र आगे बढ़े.”
छात्रा की शिकायत सुनने के बाद डॉक्टर आशा लकड़ा ने कहा कि वह उसी दिन बाद में IIM रांची में होने वाली समीक्षा बैठक के दौरान इस मामले को देखेंगी.
आशा लकड़ा ने आदिवासी समुदाय के छात्रों को यह भी भरोसा दिलाया कि कमीशन उनके साथ कोई अन्याय नहीं होने देगा, चाहे मामला IIM रांची का हो या देश के किसी अन्य IIM का.
आशा लकड़ा के नेतृत्व में नेशनल कमीशन फॉर शेड्यूल्ड ट्राइब्स की एक टीम अभी रांची में है, ताकि पूरे राज्य से अनुसूचित जनजाति से जुड़ी शिकायतों को सुना जा सके.
कमीशन ने मंगलवार को IIM रांची में एक समीक्षा बैठक भी की और आरोपों के संबंध में संस्थान से लिखित स्पष्टीकरण मांगा.
हालांकि, IIM रांची के अधिकारियों ने प्रियंका कुजूर के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि संस्थान किसी के साथ भेदभाव नहीं करता है और सभी छात्रों के साथ समान व्यवहार करता है.

