आंध्र प्रदेश के आदिवासी इलाक़ों का जैव खेती की तरफ़ पलायन

जिले के लगभग 10,000 आदिवासी परिवार क़रीब 50,000 एकड़ में प्राकृतिक खेती की तरफ़ पलायन कर चुके हैं. 93 गांवों को आधिकारिक तौर पर जैव गांवों के रूप में घोषित किया गया है. सात और गांवों को जल्द ही इसी तरह से मान्यता दे दी जाएगी.

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एक तरफ़ जहां दुनियाभर में केमिकल उर्वरकों (फ़र्टिलाइज़र) और कीटनाशकों के खतरों के बारे में जागरुकता बढ़ गई है, वहीं यह बात भी सही है कि आज के समय में जैविक और प्राकृतिक खेती को अपनाना आसान नहीं है.

लेकिन आंध्र प्रदेश के विजयनगरम ज़िले में, एक रिटायर्ड स्कूल टीचर और उनका एनजीओ आदिवासी किसानों को प्राकृतिक खेती की तरफ़ वापस जाने के लिए मनाने के लिए एक दशक से ज़्यादा समय से काम कर रहे हैं, और अब उनकी कोशिशें रंग ला रही हैं.

तोटपल्ली गांव के डी. परी नायडू और Justified Action and Training for Tribal Upliftment (JATTU) Trust की कोशिशों के चलते, इस इलाक़े के क़रीब सौ गांवों ने अपने खेतों में रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक का इस्तेमाल बिल्कुल बंद कर दिया है.

“मैदानी इलाक़ों की तुलना में, जिले के इस पहाड़ी इलाक़े के किसान पहले से ही कम केमिकल उत्पादों का इस्तेमाल करते हैं. इसलिए इन्हें केमिकल्स के इस्तेमाल को बंद करने और गाय के गोबर, गोमूत्र और नीम जैसी प्राकृतिक चीज़ों का इस्तेमाल शुरू करने के लिए राज़ी करना हमारे लिए उम्मीद से ज़्यादा आसान था,” परी नायडू ने न्यूज़ एजेंसी आईएएनएस से बातचीत में कहा.

संपूर्ण जैव-कृषि को फिर से शुरू करने में उनकी पहली सफलता कोंडाभरिकी गाँव से आई, जिसे 2018 में आंध्र प्रदेश का पहला जैव-ग्राम घोषित किया गया था. इसके बाद, ज़्यादा से ज़्यादा गाँव इस आंदोलन में शामिल होने लगे.

नायडू ने कहा, “अब तक JATTU जिन 206 गांवों में काम कर रहा है, उनमें से 93 गांवों को आधिकारिक तौर पर जैव गांवों के रूप में घोषित किया गया है. सात और गांवों को जल्द ही इसी तरह से मान्यता दे दी जाएगी.”

आज, जिले के लगभग 10,000 आदिवासी परिवार क़रीब 50,000 एकड़ में प्राकृतिक खेती की तरफ़ पलायन कर चुके हैं.

वॉलंटरी रिटायरमेंट लेते हुए परी नायडू ने 1998 में दो मंडलों में रहने वाले अलग-अलग आदिवासियों के लिए काम करने के लिए JATTU की स्थापना की थी.

एनजीओ ने गैर-कीटनाशक प्रबंधन के साथ शुरुआत की, और धीरे-धीरे प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की तरफ़ अपने क़दम बढ़ाए.

एक नक्सल प्रभावित इलाक़े में काम करना परी नायडू के लिए ज़्यादा समस्याएं लेकर आया. 2002 के आसपास, उन्हें नक्सलियों ने यह इलाक़ा छोड़ने की चेतावनी दी थी. हालांकि, उन्होंने यह साफ़ कर दिया कि इलाक़ा न छोड़ने का नतीजा जो भी हो, वो यहीं बने रहेंगे. उसके बाद, उन्हें परेशान नहीं किया गया.

प्राकृतिक खेती की पहल को इलाक़े के आदिवासी समुदायों ने पूरा समर्थन दिया है. स्थानीय महिलाएं जो पहले पैसे कमाने के लिए शराब बनाती थीं, अब बिक्री के लिए प्राकृतिक खाद और कीटनाशक तैयार कर रही हैं.

कम लागत और बेहतर फसल के अलावा, जैव-खेती के फ़ायदे धीरे-धीरे आदिवासियों को दिखाई देने लगे हैं.

नायडू बताते हैं, “चूंकि पूरे गांव में जैव-खेती हो रही है, हानिकारक कीड़े कम हो रहे हैं, और लाभकारी कीड़ों की संख्या बढ़ रही है.”

युवा पीढ़ी को जागरुक बनाने के इरादे से परी नायडू अब आदिवासी छात्रों के साथ काम कर रहे हैं. JATTU किसानों को कृषि उपकरण, जैसे वीडर और कटर, देकर भी मदद करता है.

जैव-खेती को बढ़ावा देने वाली एक फीचर फिल्म ‘अमृत भूमि’ भी तैयार की गई है.

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