आदिवासी औरतों के बारे में अपमानजनक बातें सिर्फ़ जानकारी का अभाव नहीं एक दुराग्रह भी है

लेकिन ताज़ा विवाद में मुझे लगता है कि आदिवासी समुदायों के बारे में भ्रम और दुराग्रह सबसे बड़ा मसला है. आदिवासी समाज की सामाजिक बनावट, आस्थाओं और स्त्री-पुरूष संबंधों के बारे में बेहद ग़लत धारणाएँ बनी हैं. आदिवासी समाज में स्त्री को च्वाइस का जो अधिकार प्राप्त है, उसे अक्सर खुले सेक्स के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है. अफ़सोस की बात ये है कि कई बार मुख्यधारा कहे जाने वाले समाज के बुद्धिजीवी भी गलत तरह से आदिवासी समाज में औरत के इस अधिकार को पेश करते हैं.

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गुजरात में पिछले सप्ताह समाजशास्त्र की एक किताब से बवाल खड़ा हो गया. राज्य के आदिवासी लोगों ने इस किताब के प्रकाशक के ख़िलाफ़ कार्रवाई की माँग की और कई ज़िलों में प्रकाशक के ख़िलाफ़ प्रदर्शन शुरू हो गए.

इस किताब में भारत की वर्तमान सामाजिक समस्याओं के बारे में चर्चा की गई है. इन समस्याओं में से एक समस्या ऐड्स (AIDS) भी बताई गई है. इस रोग के फैलने का विश्लेषण करते हुए किताब में कई बातें कही गई हैं.

इस सिलसिले में एक बात कही गई है कि वेश्यावृत्ति इस रोग के फैलाव की ज़िम्मेदार है. इसी सिलसिले में लेख में आगे बताया गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आदिवासी महिलाएँ वेश्यावृत्ति लिप्त रहती हैं. इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों में आदिवासी औरतें ऐड्स फैलाती हैं.

जब आदिवासी इलाक़ों में प्रकाशक और लेखक के ख़िलाफ़ प्रदर्शन की ख़बर आई तो प्रकाशन कंपनी आर.जमनादास की तरफ़ से इस किताब में कही गई बातों के लिए माफ़ी माँग ली गई है. इसके साथ ही कंपनी ने कहा है कि वो हज़ार से किताब की सारी कॉपी वापस लेगी.

प्रकाशक की तरफ़ से माफ़ी माँगने के बावजूद कुछ आदिवासी संगठन अभी भी कंपनी के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज करने की माँग कर रहे हैं. लेकिन अभी तक इस मामले में कोई मामला दर्ज किया गया है इसकी जानकारी नहीं है. 

मेरी नज़र में इस लेख में औरतों के ख़िलाफ़ और ख़ासतौर से ग़रीब तबकों की सतायी हुई महिलाओं के ख़िलाफ़ एक मज़बूत नज़रिया दिखाई देता है. वो नज़रिया जो बीमारी नहीं लक्षणों पर बात करता है और सताए हुए को ही दोषी क़रार देने के लिए कुख्यात है.

आपत्तिजनक बातें जो किताब में कही गई हैं

यह लेख वेश्यावृत्ति के बहाने औरतों को इस ऐड्स रोग को फैलाने के लिए ज़िम्मेदार ठहरता है. लेकिन स्थिति तो बिलकुल उल्टी है. ऐड्स असुरक्षित यौन संबंधों से भी फैलता है यह एक सच्चाई है. लेकिन असुरक्षित यौन संबंध बनाने पर ज़ोर कौन देता है, औरत या मर्द ?

सेक्स के दौरान कंडोम पहनने की ज़िम्मेदारी मर्द की है. लेकिन इस तथ्य से नज़र चुरा कर ऐड्स फैलाने के लिए वेश्यवृत्ति में फँसी औरतों को ज़िम्मेदार ठहरा दिया जाता है. इस मसले में और व्यापक और गहरे पहलू भी हैं.

मसलन वेश्यावृत्ति में फँसी औरतें समाज के ग़रीब और कमज़ोर तबके की हैं. जिनमें से ज़्यादातर को इस पेशे में धकेल दिया गया है. शायद ही कोई औरत मिले जो अपनी मर्ज़ी से वेश्यवृत्ति में शामिल हुई है. अगर कोई महिला अपनी मर्ज़ी से वेश्यवृत्ति करती है तो भी क्या असुरक्षित यौन संबंध के लिए उसको दोषी माना जा सकता है? 

लेकिन ताज़ा विवाद में मुझे लगता है कि आदिवासी समुदायों के बारे में भ्रम और दुराग्रह सबसे बड़ा मसला है. आदिवासी समाज की सामाजिक बनावट, आस्थाओं और स्त्री-पुरूष संबंधों के बारे में बेहद ग़लत धारणाएँ बनी हैं.

आदिवासी समाज में स्त्री को च्वाइस का जो अधिकार प्राप्त है, उसे अक्सर खुले सेक्स के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है. अफ़सोस की बात ये है कि कई बार ऐसा देखा गया है कि मुख्यधारा कहे जाने वाले समाज के बुद्धिजीवी भी गलत तरह से आदिवासी समाज में औरत के इस अधिकार को पेश करते हैं.

मसलन मुख्य समाज में औरत पर जो पहरेदारी है, चाहे वो पहनावे पर हो या प्रेम पर, उसके काउंटर में अक्सर आदिवासी समुदायों का उदाहरण दिया जाता है. इन उदाहरणों में जिन शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है उनमें जानकारी का अभाव और लापरवाही दोनों देखी जा सकती है.

इन उदाहरणों में कहा जाता है कि आदिवासी समुदाय में फ़्री सेक्स की अवधारणा है. अपनी इस बात को साबित करने के लिए आदिवासी समुदायों के सामाजिक संस्थानों मसलन गोंड समुदाय के गोटुल का उदाहरण दिए जाते हैं. 

प्रकाशक का माफ़ीनामा

कुछ महीने पहले हम बस्तर में कई गोंड आदिवासी समुदाय के गाँवों में हमें जाने का मौक़ा मिला. वहाँ हमने गोटुल व्यवस्था को समझने की कोशिश की थी. हमने पाया कि गोटुल एक सामाजिक और राजनीतिक संस्था है. 

यह संस्था समय के साथ कमज़ोर पड़ी है. लेकिन एक समय में यह संस्था समुदाय की संस्कृति, न्याय और सामाजिक व्यवस्था की संरक्षक थी. लेकिन इस संस्था को ग़ैर आदिवासी समाज में बेधड़क तरीक़े से एक सेक्स स्कूल की तरह से पेश किया गया है. 

पिछले क़रीब 6 साल में नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश से लेकर असम ,झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात और हाल ही महाराष्ट्र के अलावा भी हमें कई राज्यों के आदिवासी समुदायों से मिलने का मौक़ा मिला है. 

इस दौरान हमने इन समुदायों के जीवनशैली के साथ साथ उनके सामाजिक मूल्यों को भी समझने का प्रयास किया. इस दौरान हमें अंडमान और निकोबार के जारवा, ओंग, ग्रेट अंडमानी और निकोबारी समुदायों से भी मिलने का अवसर मिला.

अपने इस सीमित अनुभव के बाद एक बात कह सकता हूँ कि ग़ैर आदिवासी समुदायों में जितनी जानकारी का अभाव अंडमान के आदिवासी समुदायों के बारे में है उतना ही जानकारी का अभाव उन आदिवासियों के बारे में भी है जो उनके आस-पास के इलाक़ों में ही रहते हैं.

अंडमान के आदिवासी तो अलग द्वीप पर घने जंगलों में रहते हैं. इन आदिवासियों से मिलने पर कई तरह की पाबंदी है. लेकिन झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र या फिर पूर्वोत्तर के आदिवासी समुदायों के बारे में भी जिस तरह की धारणाएँ हैं, वो दुखद है. 

मुझे याद आता है कि कुछ महीने पहले हम ओडिशा के बालेश्वर ज़िले के नीलगिरी ब्लॉक में हो आदिवासियों से मिलने पहुँचे थे. यहाँ पर हमारी मुलाक़ात इंद्रजीत सिंह मारली से हुई. वो आर्ट के छात्र हैं और पेंटिंग करते हैं.

उन्होंने हमें बताया, “ जब कॉलेज में हमारे दोस्तों को पता चलता है कि मैं आदिवासी हूँ तो पहला सवाल होता है, यार आपके यहाँ तो फ़्री सेक्स सोसायटी होती है ना ?” उन्होंने आगे कहा था यह बेहद दुखद स्थिति होती है.

इसलिए स्कूल, कॉलेज या काम करने की जगह पर अक्सर आदिवासी अपनी पहचान छुपा लेते हैं. 

मैं जब आदिवासी भारत में अपना अनुभव देखता हूँ और मुख्यधारा कहे जाने वाले समाज में आदिवासियों पर जो थोड़ा बहुत विमर्श देखता हूँ तो उसमें एक बहुत बड़ी समस्या पाता हूँ. मैं पाता हूँ एक तबका है जो आदिवासी समुदाय में कई प्रगतिशील व्यवस्थाएँ पाता है.

लेकिन उन प्रगतिशील व्यवस्थाओं का उदाहरण ग़लत संदर्भ या शब्दों में दिया जाता है. इन व्यवस्थाओं का महिमा मंडन की हद तक जाते हुए आदिवासी समुदाय को फ़्री सेक्स सोसायटी घोषित कर दिया जाता है. 

मसलन हाल ही में हम महाराष्ट्र से लौटे हैं. यहाँ पर वारली आदिवासी समुदाय के बीच हमें कई दिन बिताने का मौक़ा मिला. जब हम वहाँ थे तो शादियों का सीज़न था. यहाँ पर हमें वारली समुदाय के लोगों ने बताया कि उनके समाज में शादी की एक ख़ास व्यवस्था है.

इस व्यवस्था के अनुसार लड़की और लड़के की सगाई हो जाने के बाद, लड़की लड़के के घर जा कर रह सकती है. लड़की और लड़का चाहें तो बच्चा भी पैदा कर सकते हैं. लेकिन शादी तभी होगी जब लड़का इतना कमाने लगेगा. 

अगर लड़का कमा नहीं पाता है तो लड़की को यह अधिकार है कि वो अपने माता-पिता के पास लौट आए या फिर किसी और से शादी कर ले. अब आप इसे किस नज़र से देखेंगे, एक फ़्री सेक्स सोसायटी या फिर एक ऐसा समाज जिसमें लड़की को ज़्यादा अधिकार देता है.

क्योंकि यहाँ यह ध्यान देने वाली बात है कि लड़का लड़की को अपने घर से निकालने का अधिकार नहीं रखता है. 

क्या मेरे अनुभव में आदिवासी समुदाय में कोई अंतर्विरोध नज़र नहीं आए हैं. जी हाँ, मैंने इनके बारे में कई बार लिखा भी है. इसके साथ ही मैंने यह भी पाया कि आदिवासी समुदाय में इन मुद्दों पर चर्चा हो रही है. 

लेकिन इस ताज़ा विवाद पर मुझे लगता है कि ग़ैर आदिवासी समाज में आदिवासी समुदाय के बारे में सिर्फ़ जानकारी का अभाव नहीं है बल्कि एक निश्चित दुराग्रह भी है. इसके साथ ही मुझे लगता है कि एक राजनीतिक दुराग्रह भी इस घटना के बाद नज़र आ रहा है.

हाल ही में मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में आदिवासी इलाक़ों में बड़े बड़े नेताओं ने सभाएँ की हैं. केन्द्र और राज्य सरकारों ने ऐलान किया है कि उनका फ़ोकस आदिवासियों के विकास पर होगा.

लेकिन मामूली बयानों पर केस दर्ज कर देने वाली सरकारें इस किताब के प्रकाशक के ख़िलाफ़ मामला दर्ज करने में हिचकती है.

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