कैलेंडर में कोई दिन बताओ जिस दिन आदिवासियों की हत्या ना की गई हो

देश में आदिवासियों की हत्या के सिलसिले को अगर तलाश किया जाए, तो शायद ही कैलेंडर का कोई दिन मिलेगा जब कोई आदिवासी राज्य यानि सरकार के हाथों ना मारा गया हो. आज़ाद भारत में भी आदिवासी संसाधनों की लूट, और उनकी हक़मारी का सिलसिला बदस्तूर जारी है और वो भी बंदूक़ के दम पर.

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1 जनवरी को सोशल मीडिया पर खरसावां गोली कांड में मारे गए आदिवासियों को याद करते हुए कई पोस्ट और कहानियों पर नज़र पड़ी. कुछ राजनीतिक कार्यक्रमों की फ़ोटो भी दिखाई दीं. झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस गोली कांड में मारे गए आदिवासियों को श्रद्धांजलि दी. खरसावां गोली कांड आज़ाद भारत का पहला बड़ा गोली कांड था जब राज्य ने अपने ही नागरिकों पर गोलियों की बौछार कर दी थी. यह घटना 1948 में हुई थी.

अगले दिन यानि 2 जनवरी को एक और ख़बर पर नज़र पड़ी, यह एक और गोली कांड से जुड़ी ख़बर थी. ओडिशा में कुछ आदिवासी संगठनों ने एक प्रदर्शन किया था. यह प्रदर्शन 2006 में कलिंगनगर में पुलिस फ़ायरिंग में मारे गए आदिवासियों की याद में किया गया था. इस प्रदर्शन में शामिल संगठनों का कहना था कि इस फ़ायरिंग में जो आदिवासी मारे गए उनके परिवारों को आज तक इंसाफ़ नहीं मिला है. 

हाल ही में महाराष्ट्र के गोवारी आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति की सूचि में शामिल करने से जुड़ी ख़बर के सिलसिले में आदिवासी नेता रमेशकुमार गजबे से बातचीत हो रही थी. इस बातचीत में उन्होंने नागपुर शहर में गोवारी आदिवासियों की हत्याकांड का ज़िक्र किया. उन्होंने बताया कि 1994 में गोवारी आदिवासी अपने हक़ों के लिए प्रदर्शन कर रहे थे. पुलिस ने फ़ायरिंग की, और इस कांड में 114 लोग मारे गए. रमेशकुमार गजबे ने एक और बात की तरफ़ ध्यान दिलाया. उन्होंने कहा कि आदिवासियों पर इतना बड़ा ज़ुल्म हुआ, लेकिन नागपुर शहर में किसी नागरिक को खरोंच तक नहीं आई. आदिवासी चुपचाप अपने गाँवों को लौट गए. वो पूछते हैं कोई और समुदाय होता तो क्या ऐसा संभव था कि प्रदर्शन में आए 114 लोग मार दिए जाएँ, और शहर को खरोंच तक ना आए?

खरसावां गोली कांड का स्मारक

इन ख़बरों ने मेरे दिमाग़ में सवाल पैदा किया कि क्या साल की कोई तारीख़ ऐसी हो सकती है जिस दिन राज्य यानि सरकार के हाथों किसी आदिवासी की हत्या नहीं हुई हो. 

2006 में कलिंगनगर में आदिवासियों के इस हत्याकांड को मैंने बीबीसी के लिए कवर किया था. 14-15 साल बाद जब इस ख़बर पर नज़र पड़ी तो सब कुछ नज़रों के सामने तैर गया. इस हत्याकांड के अगले दिन मैं भुवनेश्वर होते हुए जाजपुर पहुँचा था. ओडिशा के इस थके और सुस्त से क़स्बे में एक शानदार होटल बना था. घटनास्थल की तरफ़ निकले तो जिंदल स्टील प्लांट की चिमनी से निकलती आग की लपटें नज़र आ रही थीं. यहाँ पर कई स्टील प्लांट थे. यह हत्याकांड भी टाटा स्टील प्लांट की चारदीवारी करने पर हुए विवाद के कारण ही हुआ था. 

घटना स्थल पर सामूहिक दाह संस्कार के बाद चिताओं की राख मौजूद थी. इस जगह की रस्सी बांधकर एक बाड़ बना दी गई थी. घटना स्थल के पास से ही पारादीप बंदरगाह जाने वाला चमचमाता हाईवे गुज़रता है. ज़ाहिर है यह हाईवे आदिवासियों की ज़मीन से मिलने वाले लोहे और कोयले को बंदरगाह तक पहुँचाने के लिए बनाया गया था. अगले कई दिन इस इलाक़े में रहना हुआ और कई आदिवासी बस्तियों में लोगों से मुलाक़ात का सिलसिला चला. 

इस मुलाक़ात में पता चला कि विस्थापन के बाद आदिवासियों से जो वादे किए गए थे, उनमें से कोई भी पूरा नहीं किया गया. आदिवासियों को रोज़गार का झाँसा दिया गया, लेकिन बाद में स्किल ना होने की बात कहकर रोज़गार नहीं दिया गया. आदिवासियों के हाथ से ज़मीन निकल चुकी थी और रोज़गार मिला नहीं, सो ज़्यादातर आदिवासी परिवारों की हालत दयनीय थी. 

खरसावां की घटना 1948 की थी, यानि देश को आज़ादी मिले एक साल भी हुआ नहीं था. इस घटना में मारे गए आदिवासियों की संख्या के बारे में अलग-अलग दावे हैं. इन दावों में मारे गए आदिवासियों की संख्या 30 से लेकर 2 हज़ार तक बताई जाती है. 

खरसावां झारखंड में जमशेदपुर के पास बसा एक छोटा सा क़स्बा है. तब की सरकार ने इस क़स्बे को उड़ीसा में मिलाने का फ़ैसला किया था. आदिवासियों ने इसका विरोध करने का फ़ैसला किया. इसके लिए वो 1 जनवरी को इस क़स्बे में लगने वाले साप्ताहिक हाट में जमा हुए. भीड़ बढ़ती देख कर पुलिस ने गोली चला दी, और आदिवासी मारे गए. कहा जाता है कि जो आदिवासी मारे गए उन्हें एक कुएँ में डाल कर कुआँ बंद कर दिया गया था.

इस गोलीकांड के बाद एक जाँच आयोग भी बना था, लेकिन आज तक इस हत्याकांड में मारे गए आदिवासियों की सही-सही संख्या का पता नहीं चला है. सरकार की तरफ़ से आज तक कोई औपचारिक आँकड़ा इस संबंध में पेश ही नहीं किया गया है. 

ये घटनाएँ ऐसी हैं जब आदिवासी तथाकथित लोकतांत्रिक तरीक़े अपनाकर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे. उन आदिवासी इलाक़ों में जहां कुछ संगठन हथियारबंद आंदोलन में हैं, निहत्थे आदिवासियों की हत्या आम बात है. क़रीब 4 साल पहले मैं भी भारत के सिलसिले में हमारी टीम मयूरगंज से लौटकर भुवनेश्वर से मल्कानगिरी के लिए निकली थी. अभी हम आधे रास्ते थे कि ख़बर मिली कि पुलिस ने एक टेम्पो पर गोलियाँ बरसा दी हैं, क्योंकि उनको शक़ था कि उस टेम्पो में माओवादी हैं. इस हमले के बाद पुलिस को पता चला कि टेम्पो में आदिवासी महिलाएँ बच्चों के साथ कहीं से लौट रही थीं. 

छत्तीसगढ़ में कैसे 17 आदिवासियों को फ़ेक एंकाउंटर में मौत के घाट उतार दिया गया, यह तो अब सरकार भी मान चुकी है.  

17 मार्च 2019 को विशाखापत्तनम से ख़बर आई थी कि दो आदिवासी किसानों की हत्या कर पुलिस ने उन्हें माओवादी बताने की कोशिश की.

देश में आदिवासियों की हत्या के सिलसिले को अगर तलाश किया जाए, तो शायद ही कैलेंडर का कोई दिन मिलेगा जब कोई आदिवासी राज्य यानि सरकार के हाथों ना मारा गया हो. 

आज़ाद भारत में भी आदिवासी संसाधनों की लूट, और उनकी हक़मारी का सिलसिला बदस्तूर जारी है और वो भी बंदूक़ के दम पर.

 

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