फॉरेस्ट राइट्स एक्ट आदिवासी का हक़ मानता है, सरकारें नहीं मानती हैं

मध्य प्रदेश में खारिज किए दावों का आंकड़ा सबसे ज़्यादा है. राज्य में साढ़े तीन लाख (358,767) से ज़्यादा दावों को खारिज किया गया, यह संख्या दायर किए गए कुल दावों का 57.17 प्रतिशत है. मध्य प्रदेश में 31 अगस्त, 2020 तक 6 लाख 27 हज़ार 453 दावे (5,85,266 व्यक्तिगत और 42,187 सामुदायिक) दायर किए गए थे, लेकिन सिर्फ़ 2 लाख 57 हज़ार 964 पर ही आदिवासियों को पट्टे दिए गए.

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फ़ॉरैस्ट राइट्स एक्ट 2006 क़ानूनी तौर पर अनुसूचित जनजातियों और जंगल में रहने वाले अन्य समुदायों के वन अधिकारों को मान्यता देता है. यह अधिनियम वन अधिकारों के प्रबंधन के लिए ग्राम सभाओं को भी सशक्त बनाता है. केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार 31 अगस्त, 2020 तक एफ़आरए के तहत 42.5 लाख से ज़्यादा दावे (42,53,089 – 41,03,177 व्यक्तिगत और 149,912 सामुदायिक) दायर किए गए थे, जिनमें से आधे से भी कम (19,85,911 – 19,09,528 व्यक्तिगत और 76,383 सामुदायिक) दावों पर ही आदिवासियों को पट्टा दिया गया.

मंत्रालय के आंकड़े यह भी बताते हैं कि इस अधिनियम के तहत ग्राम सभा स्तर पर क़रीब साढ़े 17 लाख (17,55,705) दावे खारिज कर दिए गए, यानि दावों की कुल अस्वीकृति दर 41.28 प्रतिशत है. इसकी वजह से जिन आदिवासियों के दावे खारिज हो गए उनपर जंगल की ज़मीन पर ‘अतिक्रमण’ का आरोप लग जाता है.

मध्य प्रदेश में खारिज किए दावों का आंकड़ा सबसे ज़्यादा है. राज्य में साढ़े तीन लाख (358,767) से ज़्यादा दावों को खारिज किया गया, यह संख्या दायर किए गए कुल दावों का 57.17 प्रतिशत है. मध्य प्रदेश में 31 अगस्त, 2020 तक 6 लाख 27 हज़ार 453 दावे (5,85,266 व्यक्तिगत और 42,187 सामुदायिक) दायर किए गए थे, लेकिन सिर्फ़ 2 लाख 57 हज़ार 964 पर ही आदिवासियों को पट्टे दिए गए.

दूसरे राज्यों की बात करें तो छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक 8 लाख 90 हज़ार 240 दावे दायर हुए, जिनमें से 4 लाख 61 हज़ार 590 यानि 51.85 प्रतिशत को खारिज कर दिया गया, और सिर्फ़ 4 लाख 23 हज़ार 218 यानि 47.53 प्रतिशत मामलों में पट्टे वितरित हुए.

30 करोड़ लोग जंगल पर निर्भर

राज्य सभा की फ़रवरी 2019 की रिपोर्ट ‘भारत में वन की स्थिति’ के अनुसार लगभग 30 करोड़ आदिवासी, अन्य समुदाय और ग्रामीण ग़रीब मुख्य रूप से वन संसाधनों पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर हैं.

एक वैश्विक संगठन, राइट्स एंड रिसोर्स इनिशिएटिव की जुलाई 2015 की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में कम से कम 4 लाख वर्ग कि.मी. यानि 56.5 प्रतिशत जंगल आदिवासियों और अन्वय समुदायों द्वारा उपयोग किए जाते हैं. लेकिन, उनके पारंपरिक और कस्टमरी अधिकारों को मान्यता नहीं दी जाती है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इसकी वजह से आदिवासी समुदायों और राज्यों के वन विभागों के बीच अकसर झड़प हो जाती है.

सिकुड़ती वनभूमि 

फ़ॉरेस्ट सर्वे ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार 2017 और 2019 के बीच 14.44 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र का नुकसान हुआ था. यह जंगल आदिवासियों के लिए आजीविका का एक बड़ा साधन हैं. यही उनके रहने की जगह भी है.

वन विभाग अकसर आदिवासियों को ही सिकुड़ती वन भूमि के लिए दोषी ठहराता है, यह कहकर कि आदिवासी देश की संपत्ति का अतिक्रमण और क़ब्ज़ा करना चाहते हैं. लेकिन उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि आदिवासियों को एफ़आरए के तहत जो अधिकार मिलते हैं, उनका क्या.

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