पेसा लागू करने पर जवाबदेही की बजाए राष्ट्रपति द्रोपदी मूर्मु से गुहार क्यों

अगर द्रोपदी मूर्मु अनुसूचित इलाक़ों में पेसा क़ानून को लागू करवाने में सक्रिय भूमिका निभाती हैं तो इसका स्वागत होना चाहिए. लेकिन क्या यह क़ानून सिर्फ़ इसलिए लागू नहीं हो पा रहा था कि देश को एक आदिवासी राष्ट्रपति का इंतज़ार था. वनवासी कल्याण आश्रम ने कभी इस मसले पर सरकारों को जवाबदेह क्यों नहीं ठहराया?

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े वनवासी कल्याण आश्रम के एक प्रतिनिधिमंडल ने 5 अगस्त, शुक्रवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू (Draupadi Murmu) से मुलाकात की. इस बैठक में शामिल लोगों ने बताया कि इस बैठक में आदिवासियों के लिए बने क़ानूनों और योजनाओं को लागू करने में राष्ट्रपति के हस्तक्षेप का आग्रह किया गया है. 

बैठक के बारे में बताया गया है कि राष्ट्रपति से राज्य के राज्यपालों से पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (पेसा कानून) का कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए कहने का आग्रह किया. 

वनवासी कल्याण आश्रम के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने रविवार को यह जानकारी दी. उन्होंने कहा कि पेसा अधिनियम 1996 (PESA 1996) में संसद द्वारा अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए स्वशासन सुनिश्चित करने के लिए अधिनियमित किया गया था. 

इस बैठक में पेसा क़ानून को लागू करने और ग्रामसभाओं को मजूबत करने पर ज़ोर दिया गया है. राष्ट्रपति से अनुरोध किया गया है कि राज्यों को इन अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को मजबूत करने के लिए अधिनियम के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए नियम बनाने की आवश्यकता है.

प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने राष्ट्रपति से अनुरोध किया कि जब वह सभी राज्यपालों के साथ बैठक की अध्यक्षता करें तो पेसा अधिनियम जैसे कानूनों के कार्यान्वयन पर जोर दें. उन्होंने मुर्मू को उसकी मासिक पत्रिका ‘वन बंधु’ का विशेष स्वतंत्रता दिवस संस्करण भी भेंट किया.

पेसा बेहद महत्वपूर्ण क़ानून है

पेसा यानि पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) क़ानून 1996, आदिवासी बहुल इलाक़ों में स्थानीय समुदायों और समाज को मज़बूती और शक्ति देने के लिए लाया गया था. भारत के इतिहास में यह क़ानून आदिवासियों के पक्ष में बना सबसे महत्वपूर्ण और मज़बूत क़ानून माना गया है. 

अप्रैल 24, 1993 को संविधान (तिहत्तरवां संशोधन) अधिनियम, 1992 से पंचायती राज को संस्थागत रूप दिया गया. इसके लिए संविधान में ‘पंचायत’ नाम से नया भाग-IX जोड़ा गया. पांचवी अनुसूची के क्षेत्र में इस कानून को विस्तार देने के लिए पेसा अस्तित्व में आया. 

केंद्र सरकार ने 1994 में एक कमेटी बनायी। मध्य प्रदेश से सांसद दिलीप सिंह भूरिया के अध्यक्षता में इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट 1995 में सौंपी जिसमें आदिवासी समाज के साथ किये गए शोषण की चर्चा की गई थी. इस कमेटी के अनुशंसा के पर केंद्र सरकार ने पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों के लिए विस्तार) (पेसा) अधिनियम, 1996 कानून बनाया. इस कानून के साथ से अनुसूची पांच के क्षेत्र में आने वाले  ग्राम सभा को काफी सशक्त किया गया.

इसके तहत ग्राम सभा को आदिवासी समाज की परंपराएं और रीति-रिवाज, और उनकी सांस्कृतिक पहचान, समुदाय के संसाधन और विवाद समाधान के लिए परंपरागत तरीकों के इस्तेमाल के लिए सक्षम बनाया गया. ग्राम सभा को भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और विस्थापित व्यक्तियों के पुनर्वास में अनिवार्य परामर्श का अधिकार दिया गया. इन्हें खान और खनिजों के लिए संभावित लाइसेंस/पट्टा, रियायतें देने के लिए अनिवार्य सिफारिशें देने का अधिकार भी दिया गया. 

‘पेसा’ को लागू करने में कोताही

इस क़ानून को लागू करने की ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों और स्थानीय दी गई थी. लेकिन पिछले 21-22 साल में अलग अलग राज्यों में पेसा क़ानून को लागू करने की प्रतिबद्धता राज्य सरकारों ने नहीं दिखाई है. यह देखा गया है कि राज्य सरकारों की तरफ़ से तरह तरह की बहानेबाज़ी करके इस क़ानून को लागू ना करने में ज़्यादा मशक़्क़त की गई है.

वनवासी कल्याण आश्रम की राष्ट्रपति के साथ बैठक में अगर यह विषय आया है तो अच्छी बात है. लेकिन 1996 से अभी तक शायद ही कभी यह सुना गया है कि इस संस्था ने पेसा या वन अधिकार क़ानून जैसे मसलों को उठाया है. 

आदिवासी आबादी में काम करने वाले इस संगठन की पहुँच मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, झारखंड और ओडिशा में काफ़ी अच्छी है. लेकिन अफ़सोस की इन सभी राज्यों का पेसा लागू करने में रिकॉर्ड बेहद ख़राब रहा है. 

मध्य प्रदेश में देश की सबसे अधिक आदिवासी आबादी रहती है. यहाँ पर बीजेपी लंबे समय से शासन कर रही है. लेकिन इस राज्य में अभी तक पेसा के नियम तक नहीं बनाए गए हैं. राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राज्य में पेसा लागू करने का ऐलान किया है. 

लेकिन इस क़ानून से जुड़े नियम को अंतिम रूप देने में लगातार देरी की जा रही है. मध्य प्रदेश में बीजेपी के लगातार सत्ता में पहुँचने में आदिवासी मतदाता का सहयोग महत्वपूर्ण रहा है. आदिवासी इलाक़ों में अगर बीजेपी को आधार मिला है तो उसमें बड़ा योगदान वनवासी कल्याण आश्रम का है. 2018 में आदिवासी ने बीजेपी का वैसा साथ नहीं दिया तो पार्टी के हाथ से सत्ता फिसल गई थी.

बीजेपी राज्य कांग्रेस पार्टी को तोड़ कर फिर से सत्ता में लौटी तो आदिवासी कल्याण की घोषणाओं से राज्य गूंज उठा. लेकिन ये घोषणाएँ कुछ फ़ौरी राहत (जिसे प्रधानमंत्री जी फ़्री की रेवड़ी कहते हैं) तक सीमित ज़्यादा नज़र आती हैं. 

छत्तीसगढ़ में हाल ही में कांग्रेस की सरकार ने पेसा नियमों को लागू करने की घोषणा की है. हालाँकि भूपेश बघेल सरकार पर भी यह आरोप है कि उसने पेसा क़ानून को कमज़ोर किया है. लेकिन छत्तीसगढ़ में भी बीजेपी की सत्ता लंबे समय रही और यहाँ भी उनकी सरकार के दौरान पेसा क़ानून के नियम तक नहीं बनाए गए. 

इस तरह से झारखंड और ओडिशा ने भी पेसा क़ानून को ज़्यादा तवज्जो नहीं दी है. गुजरात में भी बीजेपी की सरकार पर यह आरोप लगता रहा है कि सरकार आदिवासियों के क़ानूनी और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करती रही है.

MBB की टीम ने गुजरात के नर्मदा, डांग, तापी और कई दूसरे आदिवासी बहुल इलाक़ों में पाया था कि आदिवासी संगठन और राजनीतिक दल पेसा क़ानून को लागू ना होने से नाराज़ थे.

झारखंड की तर्ज़ पर कुछ संगठनों ने राज्य में पत्थलगड़ी आंदोलन शुरू करने की कोशिश भी की थी. 

पेसा, वनाधिकार, भूमि अधिग्रहण क़ानून और सरकारें

MBB की टीम दो महीने पहले महाराष्ट्र के पालघर और ठाणें ज़िलों के आदिवासी इलाक़ों में थी. यहाँ हमने कई तहसीलों में लोगों से मुलाक़ात की थी. हमें बताया गया कि ग्राम सभा के प्रस्ताव के बावजूद लोगों की ज़मीन सड़क या बांध के निर्माण के लिए ले ली गई थी. 

इसी तरह की शिकायतें बुलेट ट्रेन परियोजना के रास्ते में आने वाले गाँवों के कई परिवारों ने हमें बताई थी. महाराष्ट्र के अलावा छत्तीसगढ़ से भी पेसा और दूसरे क़ानूनों के उल्लंघन की ख़बरें आती रही हैं. 

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी की सरकार के ही दो धड़े इस मसले पर आमने-सामने दिखाई दे रही हैं. झारखंड में पत्थलगड़ी आंदोलन का उदाहरण है जब आदिवासी गाँवों ने सरकारों के धोखे से परेशान हो कर आंदोलन की राह पकड़ी थी.

संसद से इस क़ानून को पास करते हुए कहा गया था कि आदिवासियों के साथ ऐतिहासिक अन्याय अब ख़त्म हो जाएगा. फिर क्या कारण है कि वनवासी कल्याण आश्रम जैसे संगठन को राष्ट्रपति से गुहार लगानी पड़ती है कि इस क़ानून को ठीक से लागू किया जाए.

इसकी एक वजह बिलकुल स्पष्ट है कि राज्य सरकारें इस क़ानून को विकास परियोजनाओं में बाधा कि तरह देखती हैं. यह क़ानून आदिवासी तबके के अधिकारो को स्वीकार करे उनके सशक्तिकरण के लिए बनाया गया है, सरकार इस नज़रिये से इसे देख ही नहीं पाती हैं.

सरकार को आदिवासी ज़मीन और ज़मीन में दबे खनिज चाहिएँ, अभी तक वह आदिवासी को बेघर करने की क़ीमत पर हासिल किया जाता रहा था. यह क़ानून कहता है कि आदिवासी को विस्थापित करने से पहले उसकी सहमति लीजिए. अगर वो अपनी ज़मीन नहीं देना चाहता है तो विकास के वैकल्पिक रास्ते तलाशने चाहिएँ.

लेकिन अफ़सोस कि वैकल्पिक रास्ते तलाशने से आसान उन्हें आदिवासी को विस्थापित करना लगता है. वनवासी कल्याण आश्रम को आदिवासी इलाक़ों में काम करना है. इसलिए उनका सरोकार समझा जा सकता है, लेकिन उनका मित्र संगठन जा सत्ता चलाता है यानि बीजेपी शायद उनकी बात से सहमत नहीं है.

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