हसदेव जंगल में कोयला खदानों को मंज़ूरी देना राजनीतिक फ़ैसला या मजबूरी

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छत्तीसगढ़ में हसदेव अरण्य में कोयला खदानों को राज्य सरकार से अनुमति दिए जाने के बाद लगातार आदिवासी आंदोलन कर रहे हैं. इस आंदोलन को अब लगभग तीन महीने का समय हो गया है. सरगुजा, कोरबा और सूरजपुर ज़िले में फैला हसदेव अरण्य देश के सबसे विविध और खूबसूरत जंगलों में से एक है.

इस इलाक़े में कोयला खादानों में खनन की प्रक्रिया के लिए लाखों पेड़ काटे जाएँगे. इसके अलावा यहाँ के कम से कम 10 हज़ार आदिवासी विस्थापित भी होंगे.

इस मामले में राज्य की कांग्रेस सरकार की काफ़ी आलोचना हो रही है. सरकार के लिए भी इस मामले में अपने फ़ैसले को सही ठहराना आसान नहीं है. क्योंकि राज्य में सरकार चला रही कांग्रेस पार्टी ने विपक्ष में रहते हुए यह ऐलान किया था कि वो किसी भी सूरत में आदिवासियों को विस्थापित नहीं होने देगी. 

इसके साथ ही कांग्रेस पार्टी ने यह भी कहा था कि कॉरपोरेट के दबाव में जंगल को नहीं उजाड़ा जाएगा. उनके नेता राहुल गांधी ने भरी सभाओं में यह वादा किया था. अब जब राज्य सरकार ने जंगल काटने की अनुमित दे दी है, तो ज़ाहिर है उससे यह सवाल तो पूछे ही जाएँगे.

हसदेव बचाओ आंदोलन और कांग्रेस की स्थिति 

MBB ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के एक निकट सहयोगी से सीधा पूछा कि क्या कांग्रेस पार्टी ने इस मसले पर राज्य सरकार के फ़ैसले से पहले राजनीतिक नफ़ा नुक़सान का आकलन कर लिया था. क्योंकि यह मुद्दा राज्य में काफ़ी बड़ा बनता नज़र आ रहा है. 

इस पर मुख्यमंत्री के इन सहयोगी का कहना था कि मसला सिर्फ़ चुनाव में राजनीतिक नफ़े नुक़सान का नहीं है. चुनाव में बेशक इस आंदोलन का असर हो सकता है. इसकी वजह से पार्टी को कुछ सीटों का नुक़सान भी हो ही सकता है.

लेकिन इस नुक़सान को सँभाला जा सकता है. लेकिन एक पार्टी की साख का मामला ज़्यादा गंभीर है. 

वो कहते हैं कि इस बात में कोई दो राय नहीं है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और कांग्रेस पार्टी के बड़े नेता राहुल गांधी ने यह वादा किया था कि जंगल नहीं कटने दिए जाएँगे. लेकिन कांग्रेस एक राष्ट्रीय पार्टी है और वह सिर्फ़ एक राज्य के हितों को ही ध्यान में रख कर काम नहीं कर सकती है.

एक राष्ट्रीय पार्टी की अप्रोच देशव्यापी होती है. अगर छत्तीसगढ़ के फ़ैसले से राजस्थान में एक बड़ा बिजली संकट पैदा हो सकता है तो कांग्रेस पार्टी इस तथ्य से नज़रें नहीं चुरा सकती है. उन्होंने कुछ ऐसा इशारा भी किया कि पार्टी आलाकमान का भी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री पर दबाव था.

जब MBB ने उनसे पूछा कि क्या कोई और विकल्प नहीं हो सकता था. हसदेव का जंगल पर्यावरण विविधता और आदिवासी जीविका दोनों ही दृष्टि से अहम है. इस पर उन्होंने कहा कि इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकती है.

हसदेव अरण्य जैविक विविधता, वनस्पति और हाथियों के लिए भी ज़रूरी है और आदिवासियों के लिए तो सबसे पहले है. वो इस बात पर भी सहमत थे कि अगर जंगल काटे जाएँगे तो बेशक आदिवासी नाराज़ भी होगा और आंदोलन भी करेगा.

लेकिन वो कहते हैं कि इस पूरे मामले में मोदी सरकार ने छत्तीसगढ़ राज्य सरकार के सामने कोई विकल्प ही नहीं छोड़े थे. उनका कहना था कि छत्तीसगढ़ की राज्य सरकार ने कई बार केन्द्र सरकार को वैकल्पिक खदान अलॉट करने का आग्रह किया.

लेकिन केन्द्र सरकार ने राज्य सरकार को कोई विकल्प ही नहीं दिया. वो कहते हैं कि यह तो नहीं कहा जा सकता है कि राज्य सरकार की इस पूरे फ़ैसले में कोई भूमिका नहीं है. लेकिन यह भी सच है कि केन्द्र ने जो हालात पैदा किये, उसमें राज्य सरकार के पास विकल्प नहीं बचे थे.

जब MBB ने उनसे पूछा कि अब उपाय क्या है. आदिवासी आंदोलन कर रहे हैं और राज्य सरकार पीछे नहीं हट रही है. इस पर उनका कहना था कि जो आदिवासी आंदोलन कर रहे हैं उनकी बात तो जायज़ है. लेकिन कोयले की ज़रूरत और हालात ऐसे हैं कि फ़ैसला वापस नहीं हो सकता है.

इस सूरत में एक ही उपाय नज़र आता है कि प्रभावित परिवारों को अच्छा मुआवज़ा मिले और उनका ठीक तरीक़े से पुनर्वास किया जाए. 

आंदोलनकारी क्या कहते हैं

हसदेव बचाओ आंदोलन का नेतृत्व कर रहे आलोक शुक्ला कहते हैं कि हसदेव के मामले में बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही अड़ानी के साथ खड़े हुए हैं. उनका कहना था कि कोई भी राजनीतिक दल चाहे वो बीजेपी है या फिर कांग्रेस करोड़ों के कॉरपोरेट चंदे और भ्रष्टाचार से मिलने वाले पैसे को नहीं छोड़ना चाहती है.

उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ सरकार हसदेव के मामले पर केन्द्र सरकार को लिप्त बता कर ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकती है. वो कहते हैं कि माना कि बीजेपी की केन्द्र सरकार कॉरपोरेट के साथ खड़ी है. इस मामले में प्रधानमंत्री मोदी बिलकुल खुल कर उनके साथ हैं.

लेकिन कांग्रेस पार्टी तो अपने आपको आदिवासी हितैषी पार्टी कहती है. उसने तो चुनाव से पहले यह वादा किया था कि जंगल की कटाई, कॉरपोरेट लूट और आदिवासियों के शोषण को ख़त्म किया जाएगा. फिर कांग्रेस पार्टी की राज्य सरकार हसदेव अरण्य को उजाड़ने पर क्यों तुली है.

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार का यह तर्क की कोयला तो केन्द्र का विषय है तो फिर वो यह भी बताए की ज़मीन किसका विषय है. क्या बिना ज़मीन अधिग्रहण और जंगल काटे जाने की अनुमति के केन्द्र सरकार किसी से कोयला निकलवा सकती है.

वो कहते हैं कि दरअसल इस पूरे मामले में कांग्रेस अपने वादे से पीछे हट रही है. अपनी वादा खिलाफ़ी को छुपाने के लिए तर्क गढ़ रही है. 

MBB ने उनसे जानना चाहा कि आख़िर इस मसले का हल क्या है. इस पर उनका जवाब था ‘आदिवासी के पास विकल्प क्या है, वो लड़ रहा है और लड़ता रहेगा.’

हसदेव अरण्य की ख़ासियत

हसदेव अरण्य में 18 कोयला ब्लॉक चिन्हित किये गए हैं. यह जंगल हाथियों का घर है. दरअसल इस जंगल के बड़े हिस्से को एलिफ़ेंट कोरिडोर घोषित करने पर भी लगातार कई साल से चर्चा हुई है. इसके अलावा यह इलाका हसदेव बांगो बांध का ‘कैचमेंट एरिया’ भी है, जिससे लगभग तीन लाख हेक्टेयर क्षेत्र में दो फसली सिंचाई होती रही है. 

हसदेव अरण्य की जैव विविधता और उच्च पारिस्थितिक के कारण कोयला मंत्रालय और वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने 2010 में एक संयुक्त अध्ययन के बाद, इस इलाके को किसी भी तरह के खनन के लिए प्रतिबंधित करते हुए इसे ‘नो गो एरिया’ घोषित किया था.

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