केरल के उत्तरी हिस्से में कर्नाटक की सीमा से सटे कासरगोड और कन्नूर के पहाड़ी इलाकों में माविलन और मालावेट्टुवन जैसे आदिवासी समुदाय रहते हैं. पश्चिमी घाट के इस इलाके में लंबे समय से मलयालम, कन्नड़ और तुलु भाषाओं का संपर्क रहा है और इसका प्रभाव यहां रहने वाले आदिवासी समुदायों की भाषाओं पर भी दिखाई देता है.
माविलन समुदाय की भाषा को सरकारी दस्तावेजों में सामान्यतः तुलु के रूप में दर्ज किया गया है. हालांकि, कुछ भाषावैज्ञानिक अध्ययनों में इसे ‘माविलन’ या ‘मार्कोडी’ नाम से एक अलग आदिवासी भाषा के रूप में देखने की बात कही गई है. यह भाषा तुलु से काफी निकट है, लेकिन इसकी अपनी विशिष्ट शब्दावली और भाषाई विशेषताएं भी हैं.
मालावेट्टुवन समुदाय की भाषाई स्थिति कुछ अलग है. केरल सरकार के एक अध्ययन में उनकी भाषा को मलयालम और तुलु से प्रभावित बोली के रूप में वर्णित किया गया है.
भाषाओं के इस मेल और प्रभाव के बीच एक सवाल तेजी से महत्वपूर्ण होता जा रहा है—क्या इन आदिवासी समुदायों की पारंपरिक भाषाएं आने वाली पीढ़ियों तक उसी रूप में पहुंच पाएंगी?
भाषा किसी समुदाय के लिए सिर्फ बातचीत का माध्यम नहीं होती. उसमें उस समुदाय की स्मृतियां, प्रकृति को समझने का तरीका, खेती-किसानी का ज्ञान, जंगल से जुड़े अनुभव, रिश्तों की परिभाषाएं, लोककथाएं, कहावतें और पीढ़ियों से चले आ रहे जीवन के तरीके सुरक्षित रहते हैं.
लेकिन आज इन भाषाओं के सामने एक बड़ा खतरा है.
कभी जंगल के बाहर की दुनिया से बहुत कम संपर्क था
उत्तर केरल के इन पहाड़ी इलाकों में रहने वाले आदिवासी समुदायों का लंबे समय तक बाहरी दुनिया से बहुत सीमित संपर्क रहा. उनके जीवन का बड़ा हिस्सा जंगल और पहाड़ों के आसपास ही गुजरता था. घर और समुदाय उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक दुनिया के केंद्र थे.
समय के साथ परिस्थितियां बदलीं. आदिवासी इलाकों तक शिक्षा पहुंची. सड़कों और यातायात के साधनों का विस्तार हुआ. सरकारी संस्थानों और मुख्यधारा के समाज के साथ संपर्क बढ़ा. इसके साथ ही रोजगार के अवसर भी बढ़े.
इन बदलावों का एक महत्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि माविलन और मालावेट्टुवन आदिवासी समुदायों का बाहरी समाज के साथ संपर्क पहले की तुलना में काफी बढ़ गया.
आज भी आदिवासी परिवार अपने घरों और समुदाय के बीच अपनी पारंपरिक भाषा में बातचीत करते हैं. लेकिन जब वे अपने इलाके से बाहर निकलते हैं और दूसरे समुदायों के लोगों से मिलते हैं तो मलयालम का इस्तेमाल अधिक करते हैं.
यह बदलाव स्वाभाविक भी है. शिक्षा, नौकरी, प्रशासन और रोजमर्रा के सार्वजनिक जीवन में मुख्यधारा की भाषा की जरूरत पड़ती है. लेकिन इसी प्रक्रिया का दूसरा पहलू यह है कि धीरे-धीरे पारंपरिक भाषा के इस्तेमाल का दायरा सीमित होता जाता है.
सरकारी नौकरी से बदली जिंदगी, लेकिन भाषा भी बदल रही है
इन आदिवासी इलाकों में लगभग हर परिवार में किसी न किसी सदस्य को सरकारी नौकरी मिलने को सामाजिक और आर्थिक बदलाव की दृष्टि से एक सकारात्मक उपलब्धि माना जा सकता है. इससे परिवारों को आर्थिक सुरक्षा मिली और बाहरी दुनिया के साथ उनके संपर्क के अवसर बढ़े.
लेकिन इसी बदलाव ने भाषा को भी प्रभावित किया है.
जब समुदाय के लोग शिक्षा और रोजगार के लिए अपने पारंपरिक क्षेत्र से बाहर जाते हैं, तो उन्हें मलयालम या कन्नड़ जैसी भाषाओं का इस्तेमाल करना पड़ता है. परिणामस्वरूप उनकी अपनी भाषा में भी इन भाषाओं के शब्द बढ़ते जा रहे हैं.
भाषाएं हमेशा एक-दूसरे से प्रभावित होती हैं. किसी भाषा में दूसरी भाषा के शब्दों का आना अपने आप में असामान्य बात नहीं है. लेकिन चिंता तब पैदा होती है जब नई पीढ़ी अपनी पारंपरिक भाषा के शब्दों और अभिव्यक्तियों का इस्तेमाल करना ही छोड़ दे.
अगर यही सिलसिला लंबे समय तक जारी रहा तो संभव है कि इन आदिवासी भाषाओं का मूल स्वरूप इतना बदल जाए कि आने वाली पीढ़ियां उन्हें पहचान भी न पाएं. एक समय ऐसा भी आ सकता है जब इन भाषाओं का इस्तेमाल रोजमर्रा की बातचीत से पूरी तरह बाहर हो जाए.
और किसी भाषा का खत्म होना केवल एक भाषा का खत्म होना नहीं होता.
भाषा खत्म हुई तो इतिहास और ज्ञान भी खो सकता है
इन आदिवासी समुदायों के इतिहास का बड़ा हिस्सा लिखित दस्तावेजों में दर्ज नहीं है. उनकी संस्कृति और सामुदायिक स्मृतियां मुख्य रूप से मौखिक परंपरा के जरिए एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती रही हैं.
बुजुर्गों की कही कहानियां, लोकगीत, कहावतें, पारंपरिक ज्ञान, जंगल और पेड़-पौधों की जानकारी, खेती से जुड़े अनुभव, भोजन की परंपराएं और सामाजिक जीवन से जुड़े अनेक नियम और मान्यताएं भाषा के माध्यम से ही अगली पीढ़ी तक पहुंचते हैं.
इसलिए जब कोई आदिवासी भाषा कमजोर होती है या लुप्त होती है तो उसके साथ सिर्फ शब्दों का नुकसान नहीं होता. उस भाषा में संचित ज्ञान और सामुदायिक स्मृति का एक बड़ा हिस्सा भी हमेशा के लिए खो सकता है.
यही वजह है कि आदिवासी भाषाओं का दस्तावेजीकरण बेहद महत्वपूर्ण है.
5,000 शब्दों की डिक्शनरी बचाने की कोशिश
इसी चिंता ने डॉक्टर VTV Mohanan को उत्तर केरल में रहने वाले माविलन और मालावेट्टुवन समुदायों की भाषा को दर्ज करने का प्रयास करने के लिए प्रेरित किया.
उन्होंने इन समुदायों की भाषा के शब्दों को बचाने के उद्देश्य से करीब 5,000 शब्दों की एक डिक्शनरी तैयार करने की कोशिश की है. इस काम में उनके साथी प्रभाकरन ने भी महत्वपूर्ण सहयोग दिया है.
यह काम केवल शब्द इकट्ठा करने तक सीमित नहीं है. किसी भाषा की डिक्शनरी तैयार करने के लिए यह समझना जरूरी है कि समुदाय किसी शब्द का इस्तेमाल किस संदर्भ में करता है, उसका अर्थ क्या है और वह शब्द समुदाय के जीवन और संस्कृति से किस तरह जुड़ा हुआ है.
इसीलिए इस काम में समुदाय के लोगों की भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण है.
डॉ. Mohanan ने इस प्रोजेक्ट में दोनों आदिवासी समुदायों की भाषा के विद्वान को अपने साथ जोड़ा. इसका एक बड़ा फायदा यह हुआ कि समुदाय के लोगों का भरोसा हासिल करना आसान हुआ.
किसी बाहरी व्यक्ति के लिए आदिवासी बस्तियों में जाकर भाषा और संस्कृति से जुड़े सवाल पूछना हमेशा आसान नहीं होता. लेकिन जब समुदाय का अपना विद्वान इस काम का हिस्सा हो तो संवाद अधिक सहज और भरोसेमंद बनता है.
इसके बाद आदिवासी परिवारों से बातचीत करके भाषा के शब्दों और उनके इस्तेमाल को समझने का काम आगे बढ़ा.
यह काम किताब से कहीं बड़ा है
इस डिक्शनरी को केवल शब्दों की एक सूची के तौर पर देखना इसके महत्व को कम करके आंकना होगा.
यह प्रयास दरअसल एक ऐसी भाषा की स्मृति को दर्ज करने की कोशिश है, जिसका इतिहास मुख्य रूप से मौखिक रहा है.
भाषा में मौजूद हर शब्द अपने साथ किसी न किसी अनुभव, वस्तु, परंपरा या ज्ञान को लेकर चलता है. खासकर आदिवासी समाजों में प्रकृति और जंगल से जुड़ा ज्ञान भाषा में गहराई से दर्ज होता है.
किसी पेड़, पौधे, खाद्य पदार्थ, मौसम, खेती की प्रक्रिया या प्राकृतिक घटना के लिए इस्तेमाल होने वाला एक पारंपरिक शब्द कई बार उस समुदाय के पर्यावरणीय ज्ञान का हिस्सा होता है.
इसलिए आज किसी शब्द को दर्ज करना भविष्य के लिए एक सांस्कृतिक दस्तावेज तैयार करना भी है.
दूर-दराज के गांवों तक पहुंचना आसान नहीं
ऐसी डिक्शनरी तैयार करने का काम किसी कार्यालय में बैठकर पूरा नहीं किया जा सकता. इसके लिए दूर-दराज के आदिवासी इलाकों में जाना पड़ता है. अलग-अलग परिवारों से मिलना पड़ता है. बुजुर्गों और भाषा जानने वाले लोगों से बातचीत करनी पड़ती है और शब्दों को उनके संदर्भ के साथ समझना पड़ता है.
इस पूरी प्रक्रिया में समय और धन दोनों खर्च होते हैं.
डॉ. Mohanan के अनुसार, उन्होंने यह काम अपनी इच्छा और अपने खर्च से शुरू किया है. इस प्रोजेक्ट के लिए उन्हें अब तक कोई आर्थिक सहयोग नहीं मिला है.
लेकिन अगर किसी भाषा को बचाने के लिए व्यक्तिगत स्तर पर शुरू किया गया यह प्रयास संस्थागत सहयोग हासिल कर सके, तो इसका दायरा काफी बड़ा किया जा सकता है.
यही वजह है कि इस काम से जुड़े लोगों को उम्मीद है कि सरकार इस तरह के प्रयास को आर्थिक और संस्थागत सहायता देगी.
अगली पीढ़ी के लिए एक विरासत
किसी भाषा को बचाने का सबसे प्रभावी तरीका सिर्फ उसकी डिक्शनरी बनाना नहीं है. भाषा तभी जीवित रहती है जब अगली पीढ़ी उसे बोलती और अपने जीवन में इस्तेमाल करती है.
इसलिए डिक्शनरी के साथ-साथ इन भाषाओं में लोककथाओं, गीतों, कहावतों, पारंपरिक ज्ञान और बुजुर्गों की स्मृतियों को भी रिकॉर्ड करना जरूरी है. ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग के जरिए भाषा के उच्चारण और उसके वास्तविक इस्तेमाल को दर्ज करना भी भविष्य में बेहद उपयोगी साबित हो सकता है.
डिक्शनरी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहला कदम है.
आज अगर इन समुदायों की भाषा में मौजूद शब्दों को दर्ज कर लिया जाए तो कल की पीढ़ी के पास अपने अतीत को समझने का एक स्रोत मौजूद रहेगा.
किसी भाषा का लुप्त होना हमेशा दुखद होता है. लेकिन उन आदिवासी भाषाओं का लुप्त होना और भी गंभीर नुकसान है, जिनमें लिखित इतिहास का अभाव है.
क्योंकि जब भाषा जाती है, तो उसके साथ कई बार वह ज्ञान भी चला जाता है जिसे किसी किताब ने कभी दर्ज ही नहीं किया.
डॉ. VTV Mohanan और उनके साथी प्रभाकरन की 5,000 शब्दों की डिक्शनरी तैयार करने की कोशिश इसी मायने में महत्वपूर्ण है. यह सिर्फ शब्दों को बचाने का प्रयास नहीं है. यह एक समुदाय की स्मृति, संस्कृति और इतिहास को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने की कोशिश है.
और शायद किसी भाषा को बचाने की शुरुआत भी यहीं से होती है—उसके शब्दों को खोने से पहले उन्हें दर्ज कर लेने से.

