उतराखंड की व्यास घाटी में बसे रंग समुदाय (Rung Community) के लोगों ने 3 टन के एक शिवलिंग और नंदी की स्थापना की अनुमति देने से मना कर दिया है.
भारत-तिब्बत सीमा पर उत्तराखंड के पिथौरागढ़ की घाटियों में बसा रंग समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची (List Of Scheduled Tribes) में शामिल किया गया है.
रंग समुदाय के लोगों का कहना है कि वे मूलत: प्रकृति के पूजारी हैं. उनकी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वे अपनी ज़मीन पर देवी-देवताओं की बनावटी मूर्ति स्थापित करने की अनुमति नहीं दे सकते हैं.
रंग कल्याण संस्था ने अपने क्षेत्र में बाहर से इन मूर्तियों को लाकर स्थापित करने का विरोध किया. इस विरोध के बाद स्थानीय प्रशासन ने हस्तक्षेप किया और फिलहाल शिवलिंग की स्थापना को रोक दिया है.
धारचुला (Dharcula Valley) सब डीविज़न मजिस्ट्रेट आशीष जोशी के हवाले से बताया गया है कि प्रशासन ने आदि कैलाश ट्रस्ट को यह बता दिया है कि जब तक ग्रामसभा अनुमति नहीं देती है तब तक उन्हें मूर्ति लगाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है.
रंग समुदाय की सामाजिक और धार्मिक आस्थाएं
रंग समुदाय की सामाजिक और धार्मिक बनावट बेहद अनूठी है, जो प्रकृति पूजा और जीववाद (Animism) में विश्वास करता है.
यहां की सामाजिक-धार्मिक आस्थाओं पर हिंदू और बौद्ध परंपराओं का कुछ प्रभाव भी नज़र आता है. यह समुदाय मुख्य रूप से तीन प्रमुख घाटियों—दारमा, व्यास और चौदांस—में बंटा हुआ है.
यह समुदाय मूलतः प्रकृति और पुरखों को पूजता है. वे हिमालय की चोटियों, नदियों, वनों और स्थानीय देवी-देवताओं (जैसे गबला देव और नमजंग) की पूजा करते हैं.
इस समुदाय के लोग अपने पुरखों को ही अपने रक्षक और समृद्धि के प्रदाता मानते हैं. इस समुदाय की जनसंख्या 10 से 15 हज़ार के बीच बताई जाती है.

