कोंडा आदिवासियों की ‘अम्बट मछली’ और मसलों का तड़का

आपको लग सकता है कि इस आर्टिकल की हेडलाइन में मसालों को ग़लती से मसले लिख दिया गया है. ऐसा नहीं है, क्योंकि ट्राइबल किचन में मसाले ही नहीं मसले भी होते हैं.

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आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम ज़िले की आरकु घाटी बेहद खूबसूरत है. इस घाटी की ख़ूबसूरती यहाँ पर लाखों सैलानियों को खींच लाती है. इसके अलावा इस घाटी की कुछ जगह हैं जो फ़िल्मों की स्थाई लोकेशन बन चुकी हैं.

कुल मिला कर लोग आरकु को इसकी ख़ूबसूरती, टूरिस्ट डेस्टिनेशन या फिर फ़िल्म लोकेशन के लिए ही ज़्यादा जानते हैं. आरकु का नाम आता है तो शायद ही लोग ये सोचते हैं कि यहाँ पर कई आदिवासी समुदाय रहते हैं.

इनमें से कई आदिवासी समुदाय तो आदिम जनजाति मानी जाती हैं. मैं भी भारत की टीम का आरकु घाटी आने का यह दूसरा मौक़ा था. हम एक बार फिर यहाँ के आदिवासियों से ही मिलने पहुँचे थे.

आरकु घाटी के कई गाँवों में जाना हुआ और यहाँ के लोगों से खूब बातचीत भी हुई. इसी सिलसिले में कोंडा दोरा आदिवासी औरतों के साथ उनके स्टाइल में मछली पकाने का अवसर भी आया.

इमली के साथ बनाई जाने वाली इस मछली को गाडेर मांस कहा जाता है. गाडेर मांस यानि नदी की मछली या मीठे पानी में पाई जाने वाली मछली. आप वीडियो में यह पूरा प्रोसेस देख सकते हैं.

मछली भी बनती रही और इन औरतों से इनकी ज़िंदगी के बारे में भी बात होती रही. इन औरतों ने बताया कि उनके पास ज़मीन नहीं है. वो दूसरों के खेतों में काम करती हैं. यानि उनका परिवार खेत मज़दूरी से ही चलता है.

इसके अलावा जंगल से लकड़ी और इमली जैसी चीजें भी मिलती हैं जिसे वो बाज़ार में बेच कर कुछ पैसा हासिल करती हैं. परिवार के मर्द दो-चार महीने के लिए मज़दूरी करने बाहर जाते हैं.

जिन लोगों के पास खेत के लिए ज़मीन है उनके खेतों में भी सीमित उत्पादन ही होता है. इसकी वजह कई हैं. पहली वजह है कि पहाड़ी ढलान के खेतों पर खेती आसान काम नहीं है. इसके अलावा इन आदिवासियों के पास ना तो आधुनिक खाद या बीज हैं और ना ही तकनीक.

हम क़रीब चार साल बाद आरकु घाटी लौटे थे. इन चार सालों में जो बदलाव दिखाई दिया उसमें सबसे पहले नोटिस हुआ कि यहाँ पर तेज़ी से पर्यटन का विकास हो रहा है. जिसकी कमाई का मोटा हिस्सा बाहरी और ग़ैर आदिवासियों के पास है.

आदिवासियों की ज़िंदगी की मुश्किलें और चुनौतियाँ अगर बढ़ी नहीं हैं तो कम भी नहीं हुई हैं.

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