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आदिवासी की मूल पहचान और ईसाई आदिवासी का आरक्षण ख़त्म करने की माँग

भारत के संविधान में अनुसूचित जनजाति की परिभाषा को बदलने की तैयारी की जा रही है. अभी तक यह पहचान प्रकृति पूजा और उनके कस्टमरी लॉ रहे हैं. लेकिन अब इस पहचान की मुख्य शर्त हिंदू बनाने की तैयारी है.

24 मई 2026 यानी पिछले रविवार को दिल्ली के लाल किले पर हज़ारों आदिवासी जमा हुए. आरएसएस (RSS) के संगठन जनजाति सुरक्षा मंच के इस कार्यक्रम को ‘जनजाति सांस्कृतिक समागम’ नाम दिया गया था. 

गृहमंत्री अमित शाह इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे. इसके अलावा दिल्ली की मुख्यमंत्री और बीजेपी के कई बड़े नेता कार्यक्रम में शामिल थे. इस कार्यक्रम में अमित शाह ने भाषण देते हुए कहा कि आदिवासी समुदायों को समान नागरिक संहिता यानि UCC से बाहर रखा जाएगा.

अमित शाह इस कार्यक्रम के मुख्य मुद्दे यानी डीलिस्टिंग पर कुछ नहीं बोले.  उनके भाषण में आदिवासी इलाकों में धर्म परिवर्तन का मुद्दा ज़रूर शामिल था. लेकिन इस पर भी उन्होंने कोई ख़ास ज़ोर नहीं दिया. 

अमित शाह के भाषण से डीलिस्टिंग शब्द ग़ायब रहने से बेशक यहां मौजूद आदिवासी प्रतिनिधियों में थोड़ी बहुत निराशा हुई होगी. इसके बावजूद ये प्रतिनिधि यह जानते थे कि गृहमंत्री अमित शाह अगर इस कार्यक्रम में मौजूद हैं तो वे डीलिस्टिंग यानि ईसाई धर्म को अपनाने वाले आदिवासियों को आरक्षण से वंचित करने की मांग के समर्थन में हैं.

अब बीजेपी और RSS  से जुड़े एक और बड़े नेता राम माधव ने इस कार्यक्रम के हवाले से इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में एक लेख लिखा है. उन्होंने जनजाति सुरक्षा मंच के इस कार्यक्रम में संविधान संशोधन कर ईसाई आदिवासियों का आरक्षण ख़त्म करने की वकालत की है. 

इस लेख में राम माधव ने कोई नया तर्क या तथ्य पेश नहीं किया है. उन्होंने 1960 के दशक में कांग्रेस पार्टी के नेता कार्तिक उरांव के तर्कों और थ्योरी को ही अपनी बात का आधार बनाया है. 

राम माधव कार्तिक उरांव के हवाले से कहते हैं कि 10 प्रतिशत धर्मांतिरत आदिवासी (ईसाई) आरक्षण का 70 प्रतिशत लाभ प्राप्त करते हैं. उनकी नज़र में जब संविधान में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के की परिभाषा तय हो रही थी, उसी समय गड़बड़ी हो गई थी. 

इस सिलसिले में वह लिखते हैं कि अनुसूचित जाति के मामले में प्रावधान बिलकुल स्पष्ट था कि अगर कोई व्यक्ति हिंदू धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म का पालन करता है तो उसे अनुसूचित जाति नहीं माना जाएगा. जबकि अनुसूचित जनजाति के मामले में कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई. 

लालकिले पर मौजूद हज़ारों लोगों में से कई से जब हमने बात की तो उन सभी ने यह बात कही जो राम माधव ने लिखी है. उनका कहना था कि संविधान में संशोधन करते हुए ईसाई धर्म अपना चुके आदिवासियों का आरक्षण ख़त्म किया जाना चाहिए. 

इससे यह बात समझ में आती है कि पिछले करीब दो दशक में RSS ने जनजाति सुरक्षा मंच के ज़रिए आदिवासियों के एक बड़े हिस्से को ईसाई आदिवासियों को एक ऐसे समूह के तौर पर पेश करने में कामयाबी पाई है जो उनका आरक्षण लूट रहा है. 

राम माधव अपने लेख में कहते हैं कि डीलिस्टंग का मामला कई बार सुप्रीम कोर्ट के सामने आ चुका है. 

2004 सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले का ज़िक्र करते हुए वह कहते हैं कि हांलाकि कोर्ट ने यह माना था कि धर्म परिवर्तन किसी व्यक्ति को अनसूचित जनजाति की सूचि से बाहर करने का आधार नहीं हो सकता है, लेकिन कोर्ट ने यह कहा था कि हो सकता है कि धर्म परिवर्तन के बाद कोई व्यक्ति आदिवासी रीति रिवाजो या परंपराओं को मानना बंद कर दे. कोर्ट कहता है कि इस मामले में वयक्ति विशेष के मामले की जांच की जा सकती है.

राम माधव जो तर्क दे रहे हैं यह दरअसल एक पुरानी बहस का हिस्सा है. इस सिलसिले में प्रोफेसर वर्जिनियस खाखा ने EPW (7 October, 2017) एक लेख के ज़रिए कहा कि RSS के संगठनों ने यह धारणा फैलाई है कि ईसाई आदिवासी अन्य आदिवासियों की नौकरियां छीन रहे हैं. 

प्रो खाखा कहते हैं कि इस धारणा ने ईसाई आदिवासियों और अन्य आदिवासियों के बीच मन-मुटाव पैदा किया है. इसके बावजूद काफ़ी हद तक आदिवासी समूहों में एकता बनी रही है. इसकी वजह से दोनों ही समूहों को एक जैसे ही मुद्दों का सामना करना पड़ता है.

मसलन ईसाई और ग़ैर ईसाई आदिवासी, दोनों ही समुदायों को विस्थापन, ज़मीन और जंगल पर अधिकार के अलावा स्वशासन व्यवस्था जैसे मुद्दे को जोड़े रखते हैं. 

प्रोफेसल खाखा का तर्क है कि भारत में आदिवासियों की पहचान अन्य धर्मों मसलन हिन्दू, ईसाई या इस्लाम से बिलकुल अलग प्रकृति पूजा करने वाले लोगों के तौर पर की गई है. यही कारण है कि आज़ादी से पहले की सभी जनगणनाओं में आदिवासियों की पहचान प्रकृति पूजा करने वाले को तौर ही की जाती थी.

उनका तर्क है कि भारत की जनगणना में आदिवासियों को हिन्दू पहचान देना एक प्रशासनिक फ़ैसला था. इस फैसले के पीछे क्या समझ थी, आज तक यह स्पष्ट नहीं है. 

प्रोफेसर खाखा का एक और रोचक तर्क है, वे कहते हैं “ईसाई आदिवासी अपने अधिकारों पर बेहतर तरीके से लिख और बोल सकते हैं. क्योंकि उनको शिक्षा के अच्छे अवसर मिले हैं. इसके अलावा ईसाई आदिवासी कई आंदोलनों का नेतृत्व करते रहे हैं. इसलिए भी बीजेपी सरकारों को ईसाई आदिवासी चुभते हैं.”

भारत में ईसाई धर्म अपना चुके आदिवासियों के आरक्षण को ख़त्म करने के लिए केंद्र सरकार तुरंत कोई कदम उठाएगी, ऐसा ना तो जनजाति सांस्कृतिक समागम में अमित शाह के भाषण से लगता है और ना ही राम माधव के लेख से ही ऐसा प्रतीत होता है.

हाल ही में जनजाति सुरक्षा मंच के एक बड़े नेता ने अनऔपचारिक बातचीत में मुझे बताया था कि नॉर्थ ईस्ट के राज्यों की वजह से बीजेपी इस मुद्दे पर धीरे चलना चाहती है. 

लेकिन यह बात बिलकुल स्पष्ट है कि ईसाई आदिवासी आदिवासियों को आरक्षण के लाभ से वंचित करना RSS के एजेंडे में शामिल है और देर-सबेर वह बीजेपी को नीतिगत फ़ैसला लेने का आदेश देगी.

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