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NEP के तहत बस्तर के बच्चों को अब आदिवासी भाषाओं में मिलेंगी किताबें

पढ़ाई पूरी तरह से बच्चे की घर की भाषा में शुरू होती है, जिससे वे तुरंत समझ पाते हैं और फिर धीरे-धीरे दूसरी भाषा के तौर पर हिंदी सिखाई जाती है.

कई दशकों तक बस्तर में शिक्षा के क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौती स्कूल बनाना और बच्चों को वहां तक ​​लाना थी. लेकिन अब प्राथमिकता बदल गई है, कि बच्चे क्लासरूम में बने रहें और स्थानीय आदिवासी भाषाओं में पढ़ाई करके पूरे आत्मविश्वास के साथ सीखें.

आदिवासी भाषाओं को ‘मल्टीलिंगुअल एजुकेशन’ (MLE) यानी बहुभाषी शिक्षा के ढांचे में शामिल किया गया है, जिससे स्कूल पहली पीढ़ी के सीखने वालों के लिए जाने-पहचाने और स्वागत करने वाले माहौल में बदल गए हैं.

शिक्षा में यह बदलाव एक आसान लेकिन सोच-समझकर बनाए गए पाठ्यपुस्तक डिज़ाइन की वजह से आया है. बस्तर के कई बच्चे ऐसे परिवारों से आते हैं जहां घर में हिंदी नहीं बोली जाती.

इस भाषा संबंधी कठिनाई को दूर करने के लिए राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT) ने ऐसी पाठ्यपुस्तकें तैयार की हैं जिनमें एक पेज पर हिंदी का पाठ और सामने वाले पेज पर उसी का बच्चों की स्थानीय आदिवासी भाषा में अनुवाद दिया गया है.

क्योंकि इनमें से कई स्थानीय भाषाओं की अपनी कोई अलग लिपि नहीं है इसलिए आदिवासी और क्षेत्रीय भाषाओं को देवनागरी लिपि में लिखा जाता है. इससे टीचर आसानी से टेक्स्ट पढ़ पाते हैं.

पढ़ाई पूरी तरह से बच्चे की घर की भाषा में शुरू होती है, जिससे वे तुरंत समझ पाते हैं और फिर धीरे-धीरे दूसरी भाषा के तौर पर हिंदी सिखाई जाती है.

SCERT का यह बहुभाषी शिक्षा कार्यक्रम वर्तमान में 6,937 प्राथमिक विद्यालयों के करीब 2.60 लाख विद्यार्थियों तक पहुंच चुका है. इस काम के लिए 7,650 विशेष रूप से प्रशिक्षित शिक्षकों को नियुक्त किया गया है.

फिलहाल कक्षा 1 और 2 के विद्यार्थियों को इस द्विभाषी पाठ्यक्रम का लाभ मिल रहा है. इसमें हिंदी के साथ नौ स्थानीय भाषाओं को शामिल किया गया है, जिनमें हल्बी, भतरी, धुरवी, छत्तीसगढ़ी, दोरली, माड़िया तथा गोंडी की तीन क्षेत्रीय बोलियाँ—कांकेर, बस्तर और दंतेवाड़ा शामिल हैं.

इस पहल के तहत समग्र शिक्षा छत्तीसगढ़, SCERT और लैंग्वेज एंड लर्निंग फाउंडेशन (LLF) ने मिलकर राज्य के 29,755 प्राथमिक विद्यालयों में कक्षा 1 के 4.12 लाख से अधिक छात्रों की मातृभाषाओं का व्यापक सर्वेक्षण किया.

सर्वेक्षण के नतीजे चौंकाने वाले थे. करीब 75 प्रतिशत बच्चों को केवल इसलिए पढ़ाई समझने में गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था क्योंकि घर में बोली जाने वाली भाषा और स्कूल की भाषा अलग-अलग थी.

सर्वे में राज्य भर की 23 स्थानीय भाषाओं का विवरण दिया गया है, जिनमें छत्तीसगढ़ी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा (65.83%) है. इसके बाद सरगुजिया (9.38%), हिंदी (5.65%), हल्बी (4.19%) और सादरी (3.97%) का स्थान है.

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा, “बहुभाषी शिक्षा की यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अनुरूप है और आदिवासी समुदायों की भाषाओं और संस्कृति के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. किसी भी बच्चे की पहली भाषा ही उसके जीवनभर की शैक्षणिक सफलता की सबसे मजबूत नींव होती है.”

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